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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

विनय-पत्रिका ४०३ जाती है, तो उसकी सुगन्ध बहुत दूरतक उड़ने लगती है। किन्तु उस हरिन- को यह बात नहीं मालूम होती कि सुगन्ध उसीके शरीरसे निकल रही है। परिणाम यह होता है कि वह हरिन उस सुगन्धकी तलाशमें चारों ओर दौड़ता फिरता है। [ २४५ ] मोहिं मूढ़ मन बहुत बिगोयो। याके लिये सुनहु करुनामय, मैं जग जनमि-जनमि दुख रोयो ॥१॥ सीतल मधुर पियूष सहज सुख निकटहिं रहत दूरि जनु खोयो। बहु भाँतिन श्रम करत मोह बस, बृथहि मंदमति वारि विलोयो ॥२॥ करम-कीच जिय जानि, सानि चित, चाहत कुटिल मलहि मल धोयो। तृषावंत सुरसरि विहाय सठ, फिरि-फिरि विकल अकास निचोयो ॥३॥ तुलसिदास प्रभु ! कृपा करहु अब, मैं निज दोष कछू नहिं गोयो। डासत ही गइ बीति निसा सब, कवहूँ न नाथ ! नींद भरि सोयो ॥४॥ शब्दार्थ—विगोयो = बिगाड़ा, सत्यानाश किया। पियूष = अमृत। सहज सुख = परमानन्द। बिलोयो = मंथन किया। निचोयो = निचोड़ना, दुहना। डासत = बिछौना बिछाते। भावार्थ—इस मूर्ख मनने मुझे खूब सत्यानाश किया। हे करुणामय ! सुनिये, इसके लिए मैं संसारमें जन्म ले-लेकर दुःखड़ा रोता रहा ॥१॥ शीतल और मधुर अमृतवत् परमानन्दके निकट रहते हुए भी मैंने मानो उसे बहुत दूर खो दिया। मोहवश नाना प्रकारका श्रम करके व्यर्थ ही मुझ मूढ़ बुद्धिने जल- मंथन किया (विषयरूपी जलको मथकर परमानन्दरूपी घी निकालना चाहा)

४०४ विनय-पत्रिका ॥२॥ दिलमें जान-बूझकर भी कुटिल (दुष्ट) मैं कर्मके कीचड़में चित्तको सान- कर मलसे ही मलको धोना चाहता हूँ। मैं ऐसा दुष्ट प्यासा हूँ कि गंगाजीको छोड़कर व्याकुल हो बारम्बार आकाश दुहता रहा (सच्चे सुखके लिए दुःखरूप विषयोंमें उलझा रहा) ॥३॥ हे प्रभो ! अब तुलसीदासपर कृपा कीजिये, क्योंकि मैंने अपना दोष तनिक भी आपसे नहीं छिपाया है। हे नाथ! मुझे बिछौना बिछाते-बिछाते ही सारी रात बीत गयी (उपाय ही करते-करते जिन्दगी खतम हो गयी), कभी भी नींद भर न सोया (आत्मसुख नहीं प्राप्त कर सका ) ॥४॥ विशेष १—‘डासत······सोयो’—यहाँ जीवनको ‘निसा’ इसलिए कहा है कि यह जीवन अज्ञानमय है, और अज्ञान अन्धकाररूप है। [ २४६ ] लोक-बेद हूँ विदित बात सुनि-समुझि मोह-मोहित बिकल मति थिति न लहति । छोटे-बड़े, खोटे-खरे, मोटेऊ दूबरे, राम ! रावरे निबाहे सबहीकी निबहति ॥१॥ होती जो आपने बस, रहती एक ही रस, दुनी न हरष-सोक-साँसति सहति । चहतो जो जोई जोई, लहतो सो सोई सोई, केहू भाँति काहू की न लालसा रहति ॥२॥ करम, काल, सुभाउ गुन-दोष जीव जग माया तें, सो सबै भौंह चकित चहति । ईसनि-दिगीसनि, जोगीसनि-मुनीसनि हूँ, छोड़ति छोड़ाये तें, गहायै तें गहति ॥३॥ सतरंज को सो राज, काठ को सबै समाज, महाराज बाजी रची, प्रथम न हति । तुलसी प्रभुके हाथ हारिबो-जीतिबो नाथ ! बहु बेष, बहु मुख सारदा कहति ॥४॥

विनय-पत्रिका ४०५ शब्दार्थ—थिति = (स्थिति) स्थिरता । सबै = भयभीत । ईसनि = ब्रह्मा-विष्णु और शिव । गहति = पकड़ती हैं । हति = थी । सारदा = सरस्वती । भावार्थ—यह बात संसार और वेदोंमें विदित है, तथा सुनने-समझनेसे भी (यही) ज्ञात होता है कि अज्ञान-लिप्त व्याकुल बुद्धि कभी स्थिर नहीं होती । हे रामजी ! छोटे-बड़े, बुरे-भले, मोटे-दुबले, सबका निर्वाह आपहीके निभानेसे हो रहा है ॥१॥ यदि (यह बुद्धि) अपने वशमें होती, तो सदा एकरस रहती, दुनियामें हर्ष और शोकका कष्ट न सहती । सबको मनोवांछित वस्तु प्राप्त हुआ करती, किसीकी भी किसी तरहकी लालसा (अपूर्ण) न रह जाती ॥२॥ कर्म, काल, स्वभाव, गुण, दोष, जीव, जगत् सब आपहीकी मायासे हैं और वह माया भयभीत होकर चकित भावसे आपकी भृकुटि निहारा करती है । यह माया शिव, ब्रह्मा आदिको, दिक्पालों-(इन्द्रादि लोकपालों) को, योगेश्वरोंको (मार्कण्डेय आदिको) और मुनीश्वरों-(वशिष्ठ आदि) तकको आपहीके छुड़ानेसे छोड़ती एवं पकड़ानेसे पकड़ती है ॥३॥ इस मायाका राज्य शतरंजकी तरह है, जिसका समाज (बादशाहसे लेकर प्यादेतक सब मोहरा) काठका (बना हुआ) है (यथार्थतः न कोई राजा है, न प्यादा) । हे महाराज ! शतरंजकी यह बाजी आपहीकी रची हुई है; पहले यह नहीं थी । तुलसीका कथन है कि हे नाथ ! इस बाजीका हारना-जीतना दोनों आपहीके हाथमें है (अर्थात् यदि आप चाहें तो हरा दें अथवा जिता दें) । यह बात सरस्वतीने अनेक वेष धारण करके अनन्त मुखसे कही है (अर्थात् बन्धन और मोक्ष सब ईश्वराधीन है) ॥४॥ विशेष १—'माया'—११६ पदके विशेषमें देखिये । २—'छोड़ति······गहति'—१३३ पदके विशेषमें देखिये । [ २४७ ] राम जपु जीह ! जानि, प्रीति सों प्रतीति मानि, राम नाम जपे जैहै जियकी जरनि । राम नाम सों रहनि, राम नाम की कहनि, कुटिल कलि-मल-सोक-संकट हरनि ॥१॥

४०६ विनय-पत्रिका राम नाम को प्रभाउ पूजियत गनराउ, कियो न दुराउ, कही अपनी करनि। भवसागर-सेतु, कासी हू गति हेतु, जपत सादर संभु सहित घरनि ॥२॥ बाल्मीकि व्याध हे अगाध-अपराध-निधि, 'मरा' 'मरा' जपे पूजे मुनि अमरनि। रोक्यो बिन्ध्य, सोख्यो सिन्धु घटजहुँ नाम-बल, हार्यो हिय खारो भयो भूसुर-डरनि ॥३॥ नाम-महिमा अपार, सेष-सुक बार बार, मति-अनुसार बुध बेद हू वरनि। नामरति कामधेनु तुलसीको कामतरु, रामनाम है बिमोह-तिमिर-तरनि ॥४॥ शब्दार्थ-दुराउ = छिपाव । घरनि = स्त्री । हे = थे । अमरनि = देवताओं । घटजहुँ = कुम्भज ऋषि ने भी । भूसुर = देवता । विमोह = अज्ञान । तरनि = सूर्य । भावार्थ-हे जीभ ! तू यह जानकर और विश्वास मानकर प्रेमसे राम- नामका जप कर कि रामका नाम जपनेसे ही हृदयकी दाह मिटेगी। रामनाममें ही रहन-सहन रखना अर्थात् उठते-बैठते रामका नाम जपना एवं रामनामका ही उच्चारण करना दुष्ट कलिकालके पापों और शोक-संकटको हरनेवाला है ॥१॥ रामनामका ही प्रभाव है कि गणेशजी (सर्वप्रथम) पूजे जाते हैं। अपनी करनीको गणेशजीने स्वयं कहा है, कुछ भी नहीं छिपाया है। यह नाम संसार-समुद्रका पुल है तथा काशीमें मुक्ति देनेका मूल कारण है। (क्योंकि शिवजी 'रामतारक' मन्त्रके उपदेश द्वारा ही जीवोंको मुक्त किया करते हैं) इसे भगवान् शंकर अपनी पत्नी पार्वतीके सहित बड़े आदरपूर्वक जपा करते हैं ॥२॥ वाल्मीकि (पहले) बहेलिया थे, अपराधोंके अगाध-समुद्र थे। किन्तु 'मरा-मरा' जपनेके प्रभावसे वह मुनियों और देवताओं द्वारा पूजे गये। अगस्त्य-ऋषि भी रामनामके ही बलसे विन्ध्यगिरिको रोकने एवं समुद्रको सोखनेमें समर्थ हुए थे। पश्चात् ब्राह्मण (अगस्त्य-ऋषि) के डरसे समुद्र अपने हृदयमें हार मानकर खारा हो गया

विनय-पत्रिका ४०७ (ताकि अगस्त्य-ऋषि या और अन्य तपस्वी ब्राह्मण उसे खारा मानकर आचमन न कर सकें) ॥३॥ शेष, शुकदेवजी, पण्डित तथा वेदोंने अपनी-अपनी बुद्धिके अनुसार इसका वर्णन करते हुए कहा है कि रामनामकी महिमा अपार है। रामनाममें प्रेम होना तुलसीके लिए कामधेनु और कल्पवृक्ष है। यह राम- नाम अज्ञानान्धकारको दूर करनेके लिए सूर्य है ॥४॥ विशेष १—'राम जपु······जवनि'—भगवान्ने स्वयं कहा है— ता ये शृण्वन्ति गायन्ति ह्यनुमोदन्ति चादृताः । मत्पराः श्रद्दधानाश्च भक्तिं विन्दन्ति ते मयि ॥ भक्तिं लब्धवतः साधोः किमन्यदवशिष्यते । मय्यनन्तगुणे ब्रह्मण्यानन्दानुभवात्मनि ॥ . —श्रीमद्भागवत (११।२६ श्लोक । २९,३०) अर्थात् 'जो लोग मुझमें मन लगाकर श्रद्धा और आदरके साथ मेरी नाम- गुण-लीला-कथाको सुनते, गाते और चिन्तन करते हैं उनकी मुझमें अनन्य भक्ति हो जाती है। मुझ अनन्त-गुण-सम्पन्न सच्चिदानन्दघन—ब्रह्ममें भक्ति हो जाने- पर फिर उस साधु पुरुषको और कौनसी वस्तु प्राप्त करनी बाकी रह जाती है ?' २—'कुटिल कलिमल···हरनि'— पतितः स्खलितश्चार्तः क्षुत्त्वा वा विवशोऽब्रुवन् । हरये नम इत्युच्चैर्मुच्यते सर्वपातकात् ॥ सङ्कीर्त्यमानो भगवाननन्तः श्रुतानुभावो व्यसनं हि पुंसाम् । प्रविश्य चित्तं विधुनोत्यशेषं यथा तमोऽर्कोऽभ्रमिवातिवातः ॥ —श्रीमद्भागवत (१२।१२। श्लो. ४६-४७) अर्थात् 'कोई भी मनुष्य गिरते, पड़ते, छींकते और दुःखसे पीड़ित होते समय परवश होकर भी ऊँचे स्वरमें 'हरये नमः' पुकार उठता है तो वह सब

४०८ विनय-पत्रिका पापोंसे छूट जाता है। जैसे सूर्य पर्वतकी गुफाके अन्धकारको भी नाश कर देता है, और जैसे प्रचण्ड वायु बादलोंको छिन्न-भिन्न करके लुप्त कर देता है, इसी प्रकार अनन्त भगवान्का नाम कीर्त्तन हृदयमें प्रवेश करके समस्त पापोंको धो डालता है।' ३—'पूजियत गनराउ'—एक बार देवताओंमें होड़ लगी कि जो ब्रह्माण्ड- की प्रदक्षिणा करके सबसे पहले आ जायगा, उसीकी पूजा सर्वप्रथम हुआ करेगी। फिर क्या था, सब देवता अपनी-अपनी सवारीपर बैठकर प्रदक्षिणा करने लगे। बेचारे गणेशजी चूहेपर बैठकर बड़े फेरमें पड़े। भला चूहेपर बैठकर वह कितनी शीघ्रता करते ? अचानक नारदजी मिले। उन्होंने गणेशजीके उदास रहनेका कारण जानकर कहा, आप राम-नाम लिखकर उसीकी प्रदक्षिणा कर डालें। क्योंकि रामनाममें समूचा ब्रह्मांड निहित है। गणेशजीने ऐसा ही किया। परिणाम यह हुआ कि सब देवताओंको हार माननी पड़ी, और उसी समयसे प्रत्येक कार्यमें सर्वप्रथम पूजा गणेशजीकी होने लगी। गुसाईंजीने रामचरित मानसमें लिखा है— महिमा जासु जान गन राउ। प्रथम पूजियत नाम प्रभाऊ ॥ ४—'कहाँ आपकी करनि'—पुराणमें यह कथा भी पायी जाती है कि पहले गणेशजी बड़े उपद्रवी थे। इन्होंने सैकड़ों मुनियोंको मार डाला था। शिवजीने इनके उपद्रवसे दुःखित होकर रामजीका स्मरण किया। रामजीने प्रकट होकर 'राम सहस्र नाम' जपनेका उपदेश दिया। उस जपसे गणेशजी मंगलमूर्ति हो गये। ब्रह्मांड पुराणमें गणेशजीने कहा है— 'ततस्तद्ग्रहणादेव निष्पापोऽस्मि तदैव हि। तदादि सर्वदेवानां पूज्योऽस्मि मुनिरुत्तम ॥' ५—'बालमीकि'—९४ पदके विशेषमें देखिये। ६—'रोक्यो बिन्ध्य'—विन्ध्याचल पहाड़ बहुत ऊँचा था। सूर्यकी प्रखर किरणोंसे अपने पेड़ोंको बचानेके लिए वह अपना शरीर बढ़ाने लगा। इससे देवलोक व्याकुल हो उठा। समस्त देवताओंने आकर अगस्त्य ऋषिसे प्रार्थना की। अगस्त्य ऋषिने रामनामका स्मरणकर उक्त पर्वतके मस्तकपर हाथ रख

विनय-पत्रिका ४०९ दिया और कहा'—'जबतक मैं लौटकर यहाँ न आऊँ, तबतक तू यहाँ इसी प्रकार पड़ा रह।' उसके बाद अगस्त्यजी नहीं लौटे, अतः विन्ध्याचल पर्वत ज्योंका त्यों पड़ा रह गया । यह रामनामकी महिमा है। ७—'सोख्यो सिंधु'—पद १२ के विशेषमें देखिये। यह कथा इस प्रकार भी पायी जाती है कि अगस्त्यमुनि शामके वक्त समुद्रके किनारे बैठे पूजा कर रहे थे। पूर्णमासी होनेके कारण समुद्रका ज्वार प्रतिक्षण बढ़ रहा था । उसकी लहरोंमें अगस्त्य मुनिकी पूजाकी सामग्री बह गयी । इससे वह बहुत क्रुद्ध हुए और 'ॐ राम' कहकर तीन आचमनमें समुद्रका सब जल पी गये। पीछे देव- ताओंके विशेष आग्रह करनेपर अगस्त्य ऋषिने पेशाबके रास्ते उसे बाहर निकाल दिया । [ २४८ ] पाहि, पाहि राम ! पाहि, रामभद्र, रामचन्द्र ! सुजस श्रवन सुनि आयो हों सरन। दीनबन्धु ! दीनता-दरिद्र-दाह-दोष-दुख दारुन दुसह दर-दुरति-हरन ॥१॥ जब जब जग-जाल ब्याकुल करम काल, सब खल भूप भये भूतल भरन । तब तब तनु धरि, भूमि-भार दूरि करि थापे मुनि, सुर, साधु, आश्रम, वरन ॥२॥ बेद, लोक, सब साखी, काहू की रती न राखी, रावन की वन्दि लागे अमर मरन। ओक दै विसोक किये लोकपति लोकनाथ, राम राज भयो धरम चारिहु चरन ॥३॥ सिला, गुह, गीध, कपि, भील, भालु, रातिचर, ख्याल ही कृपालु कीन्हे तारन-तरन। पील-उद्धरन ! सीलसिंधु ! ढील देखियतु, तुलसी पै चाहत गलानि ही गरन ॥४॥

८. अन्तिम विनय व आत्म-समर्पण (पद २५१-२७९)

४१० विनय-पत्रिका शब्दार्थ—दर = डर । दुरित = पाप । रती = तेज । बन्दि = जेल । अमर = देवता । ओक = आश्रय । पील = हाथी । शब्दार्थ—हे रामजी ! रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये ! हे कल्याण-स्वरूप रामचन्द्र ! रक्षा कीजिये ! आपका सुयश सुनकर मैं शरणमें आया हूँ। हे दीन- बन्धु ! आप दीनता, दरिद्रता, जलन, दोष, दुःख, भयंकर और असह्य डर एवं पापोंका नाश करनेवाले हैं ॥१॥ जब-जब संसार-जालसे तथा कर्म और कालसे व्याकुल होकर सब राजा दुष्ट हो गये और उनसे पृथिवी भर गयी, तब-तब आपने शरीर धारण करके (अवतार लेकर) पृथिवीका भार दूर किया एवं मुनियों, देवताओं, संतों, (चारों) आश्रमों एवं (चारों) वर्णोंकी स्थापना की ॥२॥ लोक और चारों वेद साक्षी हैं कि जब रावणने किसीका तेज न रहने दिया और उसके कैदखानेमें अमर देवता भी मरने लगे, तब हे त्रिलोकीनाथ ! आपहीने लोक-पतियों-(इन्द्र, कुबेर आदि) को आश्रय देकर शोक-रहित किया । (आपकी कृपासे) आपका राज्य (रामराज्य) हो गया और धर्मके चारों चरण हो गये यानी सत्य, तप, दया और दान पनप उठे ॥३॥ हे कृपालु ! अहल्या, निषाद, जटायु, बन्दर, भील, भालु और राक्षसोंको आपके ख्यालने ही तारन-तरन कर दिया अर्थात् आपके ध्यान देनेसे ही ये लोग स्वयं तरकर दूसरोंको तारनेवाले हो गये । हे गजेन्द्रका उद्धार करनेवाले ! हे शीलसागर ! यह तुलसी अपनेपर आपकी ओरसे ढिलाई देखकर ग्लानिसे ही गला चाहता है ॥४॥ विशेष १—'दुरित'—बहुतसी प्रतियों में 'दरप' पाठ है । यह पाठ होनेपर यहाँ इसका अर्थ होगा 'गर्व' । २—'आश्रम'—चार हैं; ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास । ३—'बरन'—वर्ण भी चार हैं; ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र । ४—'सिला'—अहल्या; ४३ पदके विशेषमें देखिये । ५—'गुह'—निषाद; १०६ पदके विशेषमें देखिये । ६—'गीध'—जटायु; २१५ पदके विशेषमें देखिये । ७—'पील—गजेन्द्र; ८३ पदके विशेषमें देखिये ।

विनय-पत्रिका ४११ [ २४१ ] भली भाँति पहिचाने-जाने साहिब जहाँ लौं जग, जूड़े होत थोरे, थोरे ही गरम । प्रीति न प्रवीन, नीति हीन, रीति के मलीन, मायाधीन सब किये कालहू करम ॥१॥ दानव-दनुज बड़े महामूढ़ मूँड़ चढ़े, जीते लोकनाथ नाथ बलनि भरम । रीझि-रीझि दिये बर, खीझि-खीझि घाले घर, आपने निवाजे की न काहूको सरम ॥२॥ सेवा-सावधान तू सुजान समरथ साँचो, सदगुन-धाम राम ! पावन परम । सुरुख, सुमुख, एकरस, एकरूप, तोहि, बिदित बिसेषि घट घट के मरम ॥३॥ तो सौं नतपाल न कृपाल, न कँगाल मो-सौँ दया में बसत देव सकल धरम । राम कामतरु-छाँह चाहै रुचि मन माँह, तुलसी विकल, बलि, कलि-कुधरम ॥४॥ शब्दार्थ—जूड़े = शीतल, प्रसन्न । मूँड़े = सिर । घाले = नष्ट किये । मरम = मर्म । भावार्थ—संसारमें जहाँतक (जितने) स्वामी हैं, (सबको) मैंने अच्छी तरह पहचान लिया और जान लिया है । वे थोड़ेमें ही प्रसन्न हो जाते हैं और थोड़ेमें क्रुद्ध । वे प्रेममें निपुण नहीं हैं, नीतिहीन हैं और रीतिमें मलिन हैं, क्योंकि काल, कर्म एवं मायाने उन्हें अपने अधीन कर रखा है ॥१॥ अपने स्वामियोंके बलके भ्रममें महामूर्ख बड़े-बड़े दैत्य-दानव सिरचढ़े हो गये थे और लोकपालोंको भी जीतनेमें समर्थ हुए थे । उनके स्वामियोंने पहले तो प्रसन्न हो-होकर वर दिये और पीछे चिढ़कर इनके घरोंका सत्यानाश कर दिया । अपने कृपा करनेकी किसीको भी शर्म नहीं है (अर्थात्, किसीको यह ज्ञान नहीं कि लगाये हुए आमको काटना बहुत बुरा है) ॥२॥ हे राम जी ! सेवासे सावधान, सच्चे समर्थ एवं चतुर आप

ही हैं। आप सद्गुणोंके घर तथा अत्यन्त पवित्र हैं। आपका रुख सदा अच्छा रहता है। आप प्रसन्नमुख, एकरस एवं एकरूप रहते हैं। आपको विशेष रूपसे घट-घटका हाल ज्ञात है॥३॥ आपके समान शरणागत-पालक और कृपालु (स्वामी) तथा मुझसा कंगाल दूसरा कोई नहीं है। देव ! दयामें सब धर्मोंका निवास होता है (अतः आप मुझपर दया कीजिये)। आप कल्पवृक्ष हैं, और मेरा मन इसी कल्पवृक्षकी छाया (में मनोवाञ्छित फल प्राप्त करनेके लिए बैठना) चाहता है। बलिहारी ! तुलसीदास कलिके कुधर्मोंसे विकल हो रहा है॥४॥

विशेष १—'बलनि भरम'—कहीं-कहीं 'बल निभरम' पाठ है। ऐसा पाठ होनेपर 'बलपर निःशंक' अर्थ होगा।

[ २५० ] तौ हौं वार वार प्रभुहि पुकारि कै खिझावतो न, जो पै मोको होतो कहूँ ठाकुर-टहरु । आलसी-अभागे मोसे तैं कृपालु पाले-पोसे, राजा मेरें राजाराम, अवध सहरु ॥१॥ सेये न दिगीस, न दिनेस, न गनेस, गौरी, हित कै न माने विधि हरिउ न हरु । रामनाम ही सों जोग-छेम, नेम, प्रेम-पन, सुधा सो भरोसो एहु, दूसरो जहरु ॥२॥ समाचार साथ के अनाथ-नाथ ! कासों कहौं, नाथ ही के हाथ सब चोरऊ पहरु । निज काज, सुरकाज, आरतके काज, राज ! बूझिये विलम्ब कहा कहूँ न गहरु ॥३॥ रीति सुनि रावरी प्रतीति-प्रीति रावरे सों, डरत हौं देखि कलिकाल को कहुरु ! कहे ही बनैगी कै कहाये, बलि जाऊँ, राम, 'तुलसी ! तू मेरो, हारि हिये न हहरु' ॥४॥

विनय-पत्रिका ४१३ शब्दार्थ—ठहरु = स्थान। . सहरु = शहर, नगर। गहरु = देर। कहरु = जुर्म, अनीति। इहरु = जी छोटा करना, हार मान लेना। भावार्थ—हे नाथ ! यदि मुझे कहीं भी कोई स्वामी और ठिकाना होता, तो मैं बारम्बार आपको पुकार-पुकार कर न खिझाता। मुझ सरीखे आलसी और अभागेको आप ही कृपालुने पाला-पोसा है, अतः (मेरे लिए) रामचन्द्रजी ही मेरे राजा (स्वामी) हैं और अयोध्या ही नगर (ठिकाना) है ॥१॥ न तो मैंने दिग्पाल, सूर्य, गणेश और पार्वतीजीकी सेवा ही की और न ब्रह्मा, विष्णु, महेशको ही अपना हितू करके माना। मेरा तो योग, क्षेम, नेम, प्रेम और प्रण एक रामनामसे ही है। मेरे लिए उसका भरोसा अमृतके समान है और दूसरे साधन जहरके समान हैं ॥२॥ हे अनाथोंके नाथ ! मैं अपने साथवालों-(काम, क्रोधादि) का समाचार किससे कहूँ? क्योंकि चोर (कामादि) और पहरेदार (जीव) सब आपहीके हाथमें हैं। राजराजेश्वर ! आपने अपने कामोंमें, देवताओंके कामोंमें तथा दीन-दुखियोंके कामोंमें क्या कभी देर की है ? तो फिर मेरे लिए क्यों इतना विलम्ब हो रहा है? ॥३॥ आपकी रीति (पतित-पावनता आदि) सुनकर आपहीपर मेरा विश्वास और प्रेम हुआ है; किन्तु कलिकालका जुर्म देखकर मैं डर रहा हूँ (कि कहीं वह मुझे भगवत्प्रीतिसे हटाकर विषयोंमें न फँसा दे)। हे रामजी ! मैं आपकी बलैया लेता हूँ! आपके कहनेसे बनेगी या किसीके द्वारा कहलानेसे ? बस, इतना कह दीजिये कि 'ऐ तुलसी ! तू मेरा है, हृदयमें हार मानकर अपना जी छोटा न कर' ॥४॥ [ २५१ ] राम ! रावरो सुभाउ, गुन सील महिमा प्रभाउ, जान्यो हर, हनुमान, लखन, भरत । जिन्हके हिये-सुथरु राम-प्रेम-सुरतरु, लसत सरस सुख फूलत फरत ॥१॥ आप माने स्वामी कै सखा सुभाइ भाइ पति ते सनेह-सावधान रहत डरत । साहिब-सेवक-रीति, प्रीति, परिमिति, नीति, नेम को निवाहु एक टेक न टरत ॥२॥

४१४ विनय-पत्रिका

सुक-सनकादि, प्रह्लाद-नारदादि कहैं, राम की भगति बड़ी बिरति-निरत । जाने बिनु भगति न, जानिवो तिहारे हाथ, समुझि सयाने नाथ ! पगनि परत ॥३॥

छ-मत बिमत, न पुरान मत, एक मत, नेति-नेति-नेति नित निगम करत । औरनि को कहा चली ? एक बात भलै भली, राम-नाम लिये तुलसी हू से तरत ॥४॥

शब्दार्थ—बिरति = वैराग्य । निरत = रत, अनुरक्त । छ-मत = छ शास्त्रोंका मत । बिमत = विरुद्धमत । निगम = वेद ।

भावार्थ—हे राम ! आपके स्वभाव, गुण, शील, महिमा और प्रभावको शिवजी, हनुमान्‌जी, लक्ष्मणजी तथा भरतजीने ही जाना है—जिनके हृदयरूपी सुन्दर थाल्हेमें राम-प्रेमका कल्पवृक्ष सुशोभित हो रहा है जो सुख-रूपी सरस फूल फूलता और वैसा ही फल फलता है ॥१॥ आप अपने स्वाभावानुसार (शिव- जीको) स्वामी, (हनुमान्‌जीको) सखा, (लक्ष्मण और भरतको) प्रिय भाई समझते हैं, किन्तु वे आपको अपना स्वामी समझते एवं प्रेममें सावधान और डरते रहते हैं (कि कोई चूक न हो जाय) । स्वामी और सेवककी रीति, प्रीति, परिमिति (प्रमाण), नीति और नेमका निर्वाह करनेमें अपनी टेकसे नहीं टलते; अर्थात् न तो आप ही लापरवाही करते हैं और न शिव, हनुमान् , लक्ष्मण एवं भरतजी ही चूकते हैं ॥२॥ शुकदेव, सनक-सनन्दन-सनातन-सनत्कुमार, प्रह्लाद, नारद प्रभृतिका कथन है कि रामजीकी भक्ति, वैराग्यमें अत्यन्त अनुरक्त होनेसे ही प्राप्त होती है। किन्तु बिना जाने अर्थात् बिना सामान्य ज्ञानके भक्ति नहीं होती, और वह जानना, आपके हाथमें है। हे नाथ ! इसे समझकर ही चतुर लोग आपके चरणोंपर पड़ते हैं ॥३॥ छ शास्त्रोंके मत परस्पर विरुद्ध हैं, पुराणोंके मत भी एकसे नहीं हैं; और वेद तो नित्य ही 'नेति-नेति-नेति' करते रहते हैं (अर्थात् परमात्माके स्वरूपका ठीक-ठीक बोध वेदों, शास्त्रों या पुराणोंसे भी नहीं होता) । इसलिए अच्छीसे अच्छी बात एक ही है (यानी रामनामका जप करना : क्योंकि

विनय-पत्रिका ४१५ रामका नाम लेनेसे) औरोंकी तो बात ही क्या, तुलसी-सरीखे (पामर) भी तर जाते हैं ॥४॥ विशेष १—'जानिबो तिहारे हाथ'—गुसाईंजीने रामचरितमानसमें भी यही बात लिखी है:— ‘सो जानै जेहि देहु जनाई । जानत तुम्हहि तुम्है है जाई ॥’ २—'छ-मत'—छ शास्त्र; वैशेषिक, न्याय, सांख्य, योग, पूर्वमीमांसा और उत्तरमीमांसा । १. वैशेषिकके प्रतिपादक कणाद हैं। २. न्यायके प्रतिपादक गौतम हैं। ३. सांख्यके प्रतिपादक कपिल हैं। यथा— ‘कणादेन च संप्रोक्तं शास्त्रं वैशेषिकं महत् । गौतमेन तथा न्यायं सांख्यन्तु कपिलेन तु ॥ ४. योगके प्रतिपादक पतंजलि हैं। ५. पूर्वमीमांसाके प्रतिपादक जैमिनि हैं। ६. उत्तरमीमांसाके प्रतिपादक व्यास हैं। [ २५२ ] बाप ! आपने करत मेरी घनी घटि गई। लालची लबार की सुधारिये बारक बलि, रावरी भलाई सब ही की भली भई ॥१॥ रोगबस तनु, कुमनोरथ मलिन मन, पर-अपवाद मिथ्या-बाद वानी हई। साधन की ऐसी बिधि, साधन बिना न सिधि, विगरी बनावैं कृपानिधि की कृपा नई ॥२॥ पतित-पावन, हित आरत-अनाथनि को, निराधार को अधार दीनबन्धु दई।

४१६ विनय-पत्रिका इन्हमें न एकौ भयो, बूझि न जूझ्यो न जयो, ताहि ते त्रिताप-तयो, लुनियत बई ॥३॥ स्वाँग सूधो साधुको, कुचालि कलि तें अधिक, परलोक फीकी मति, लोक रंग-रई। बड़े कुसमाज राज ! आजु लौं जो पाये दिन, महाराज ! केहू भाँति नाम ओट लई ॥४॥ राम ! नाम को प्रताप जानियत नीके आप, मोको गति दूसरी न विधि निरमई । खीझिबे लायक करतब कोटि कोटि कटु, रीझिबे लायक तुलसी की निलजई ॥५॥ शब्दार्थ—घनी = बहुत। अपवाद = निन्दा। हई = नष्ट हो गयी है। जयो = जीता । लुनियत = काट रहा हूँ। बई = बोया। रंग-रई = रँगी हुई। ओट = आड़। निरमई = बनायी। भावार्थ—हे पिताजी ! मैंने अपनी ही करनीसे अपना बहुत बिगाड़ डाला। बलिहारी ! इस लालची और झूठेकी बात एक बार सुधार दीजिये, क्योंकि आप- हीके भलाई करनेसे सबका भला हुआ है ॥१॥ शरीर रुग्ण है और मन बुरी- बुरी कामनाओंसे मलिन हो गया है; वाणी दूसरेकी निन्दा करने और झूठ बोलनेसे मलिन हो गयी है। साधनकी भी ऐसी विधि है कि बिना साधनाके सिद्धि नहीं हो सकती; किन्तु हे कृपानिधे ! आपकी कृपा हमेशा बिगड़ी बातोंको बनाया करती है ॥२॥ आप पतित-पावन हैं, दीन-दुखियों और अनाथोंकी भलाई करनेवाले हैं। हे दीनबन्धु ! आपने निराधारको आधार दिया है। किन्तु मैं तो इनमें एक भी न हुआ (अभिमानके कारण मैंने अपनेको कभी पतित, दुखी, अनाथ और निराधार समझा ही नहीं); न तो मैंने विवेकसे सांसारिक विकारोंके साथ युद्ध किया और न उन्हें जीता ही। इसीसे (दैहिक, दैविक और भौतिक) तीनों तापोंसे तप रहा हूँ; जो बोया सो काट रहा हूँ ॥३॥ स्वाँग तो मैंने सीधे साधुका बना रखा है, पर कुचाली हूँ कलियुगसे भी अधिक। परलोककी ओर मेरी बुद्धि फीकी है, पर सांसारिक रंगमें खूब रँगी हुई है। हे राजराजेश्वर ! इस बड़े भारी दुष्ट समाजमें अबतक इतने दिन व्यर्थ बिताकर

विनय-पत्रिका ४१७ किसी प्रकार मैंने आपके नामकी शरण ली है ॥४॥ हे रामजी ! आप अपने नामका प्रताप जानते हैं। विधाताने मेरे लिए (आपके नामके सिवा) दूसरी गति बनायी ही नहीं। आपके क्रोध करने योग्य मेरे करोड़ों बुरे कर्म हैं; किन्तु आपके प्रसन्न होने योग्य तुलसीदासकी केवल निर्लज्जता ही है ॥५॥ विशेष १—'दई'—कुछ टीकाकारोंने इस शब्दका 'दयालु' अर्थ भी लिखा है। [ २५३ ] राम ! राखिये सरन, राखि आये सब दिन । बिदित त्रैलोक तिहुँ काल न दयालु दूजो, आरत-प्रनत-पाल को है प्रभु बिन ? ॥१॥ लाले पाले, पोषे तोषे आलसी-अभागी-अघी, नाथ ! पै अनाथनि सों भये न उरिन । स्वामी समरथ ऐसो, हौं तिहारो जैसे-तैसो काल-चाल हेरि होति हिये घनी घिन ॥२॥ खीझि-रीझि-बिहँसि-अनख, क्यों हूँ एक बार 'तुलसी तू मेरो', बलि कहियत किन ? जाहि सूल निरमूल, होहिं सुख अनुकूल, महाराज राम ! रावरी सौं, तेहि छिन ॥३॥ शब्दार्थ—तोषे = सन्तुष्ट कर दिया। अघी = पापी। हेरि = देखकर। अनख = त्यौरी चढ़ाकर। सौं = शपथ। भावार्थ—हे रामजी ! मुझे अपनी शरणमें रखिये, क्योंकि आप सदासे (दीनोंको शरणमें) रखते आये हैं। यह प्रकट है कि तीनों लोक और तीनों काल- में आपके समान कोई दयालु नहीं है। हे प्रभो ! आपको छोड़कर शरणागत दीन-दुखियोंका पालन करनेवाला दूसरा कौन है ? ॥१॥ आपने आलसी, अभागे और पापियोंका लालन-पालन किया, पोषण किया और उन्हें सन्तुष्ट कर दिया। फिर भी हे नाथ ! (इतना करनेपर भी) आप उनसे उऋण नहीं हुए। स्वामी ! २७

४१८ विनय-पत्रिका आप ऐसे समर्थ हैं, और मैं जैसा भी हूँ तैसा आपहीका हूँ; कलिकालकी चाल देखकर मेरे हृदयमें गहरी घृणा पैदा हो रही है ॥२॥ बलिहारी ! एकबार आप झल्लाकर, प्रसन्न होकर, हँसकर अथवा अनखाकर किसी भी तरह सही, इतना क्यों नहीं देते कि 'तुलसी, तू मेरा है' । हे महाराज रामचन्द्र ! आपकी सौगन्ध, (आपके इतना कहते ही) उसी क्षण मेरा सब दुःख जड़से नष्ट हो जायगा और सब सुख मेरे अनुकूल हो जायँगे ॥३॥ विशेष —'तोषे'—'पोषे तोषे'का अर्थ कई टीकाकारोंने 'पाला-पोसा' लिखा है। [ २५४ ] राम ! रावरो नाम मेरो मातु-पितु है । सुजन, सनेही, गुरु-साहिब, सखा-सुह्रद, राम-नाम प्रेम-पन अविचल बितु है ॥१॥ सतकोटि चरित अपार दधिनिधि मथि, लियो काढ़ि बामदेव नाम-घृतु है । नामको भरोसो-बल चारि हू फल को फल, सुमिरिये छाँड़ि छल, भलो क्रतु है ॥२॥ स्वारथ-साधक, परमारथ-दायक नाम, राम-नाम सारिखो न और हितु है । तुलसी सुभाव कही साँचिये परैगी सही, सीतानाथ-नाम नित चित हू को चितु है ॥३॥ शब्दार्थ—अविचल = विचलित न होनेवाला। बितु = धन। बामदेव = महादेवजी। क्रतु = कर्म, यज्ञ। चितु = चित्त। भावार्थ—हे रामजी ! आपका नाम ही मेरा माता-पिता, स्वजन, सनेही, गुरु, स्वामी, मित्र और सुहृद है। आपके नाममें जो प्रेमका मेरा प्रण है, वही मेरा स्थायी धन है ॥१॥ शिवजीने सैकड़ों करोड़ आपके चरित्ररूपी अगाध दधिसमुद्र- को मथकर नाम-रूपी घी निकाल लिया है। नामका बल-भरोसा चारों फलोंका फल यानी अर्थ, धर्म, काम, मोक्षका सार-रूप है। इसलिए छल छोड़कर राम-

नामका स्मरण करना चाहिये। यही उत्तम यज्ञ है ॥२॥ रामका नाम स्वार्थका साधनेवाला तथा परमार्थ देनेवाला है। रामनामके समान हितू और कोई भी नहीं है। यदि यह बात तुलसीदासने स्वभावसे कही है, तो सचमुच ही इसपर सही पड़ेगी। हे सीतानाथ ! आपका नाम नित्य है और चित्तका भी चित्त है ॥३॥ विशेष १—'सुभाव'—इसका अर्थ 'अच्छा भाव' भी किया जाता है। २—'नामको भरोसो बल चारि हू फल को फल'—तभी तो श्रीमद्भाग- बतमें देवी देवहूतिने भगवान् कपिलदेवसे कहा है— अहो बत् श्वपचोऽतोगरीयान् यंजिह्वाग्रे वर्तते नामतुभ्यम् । तेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुरार्या ब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये ते ॥ (३।३३।७) 'अहो, जिसकी जबानपर तुम्हारा पवित्र नाम रहता है, वह चाण्डाल भी सर्वश्रेष्ठ है; क्योंकि जो तुम्हारे नामका कीर्तन करते हैं उन श्रेष्ठ पुरुषोंने तप, यज्ञ, तीर्थस्नान, वेदाध्ययन सब-कुछ कर लिये। ३—'चित्त'— वेदान्तशास्त्रका कथन है— “अनुसन्धानात्मिकान्तःकरणवृत्तिः ।” [ २५५ ] राम ! रावरो नाम साधु-सुरतरु है। सुमिरे त्रिबिध घाम हरत, पूरत काम, सकल सुकृत सरसिजको सरु है ॥१॥ लाभ हू को लाभ, सुख हू को सुख, सरबस, पतित-पावन, डर हू को डरु है। नीचे हू को, ऊँचे हू को, रंक हू को राव हू को सुलभ, सुखद आपनो-सो घरु है ॥२॥

४२० विनय-पत्रिका बेद हू, पुरान हू, पुरारि हू पुकारि कह्यो, नाम-प्रेम चारि फल हू को फरु है। ऐसे राम-नाम सों न प्रीति, न प्रतीति मन, मेरे जान, जानिबो सोई नर खरु है ॥३॥ नाम-सों न मातु-पितु, मीत-हित, बन्धु-गुरु, साहिब, सुधी, सुसील, सुधाकरु है। नाम सों निबाह नेहु, दीन को दयालु ! देहु, दास तुलसी को, बलि, बड़ो बरु है ॥४॥ शब्दार्थ—सुरतरु = कल्पवृक्ष। घाम = धूप, ताप। सरसिज = कमल। सरु = तालाब। खरु = गधा। सुधी = सुन्दर बुद्धिवाला, बुद्धिमान्। बरु = वरदान। भावार्थ—हे राम ! आपका नाम साधुओंके लिए कल्पवृक्ष है, स्मरण करते ही तीनों तापोंको हर लेता है और सब मनोरथ पूरा कर देता है। वह समस्त सुकृतरूपी कमलोंका सरोवर है ॥१॥ वह लाभका भी लाभ, सुखका भी सुख, सर्वस्व, पतितोंको पवित्र करनेवाला तथा डरका भी डर है अर्थात् कालका भी काल है। वह नीच, ऊँच, रंक (गरीब), राव (अमीर) सबके लिए सुलभ है, और अपने घरके समान सुख देनेवाला है ॥२॥ वेदोंने, पुराणोंने तथा शिवजीने भी पुकारकर कहा है कि राम-रामका प्रेम चारों फलों (अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष) का सारस्वरूप है। ऐसे रामनामपर जिसके मनमें प्रेम और विश्वास नहीं है, मेरी समझसे उसी आदमीको (असली) गधा समझना चाहिये ॥३॥ नामके समान माता, पिता, मित्र, हितकारी, बन्धु, गुरु और स्वामी कोई नहीं है। वह (नाम) बुद्धिमान्, सुशील और चन्द्रमाके समान सुन्दर है। हे दीनोंपर दया करनेवाले रामजी ! मुझे बस यही दीजिये कि आपके नामके साथ मेरा जो प्रेम है, वह निभ जाय। बलिहारी ! इस सेवक तुलसीके लिए (आपका इतना देना ही) सबसे बड़ा वरदान है। विशेष १—'राम-नाम सों न प्रीति'—किन्तु गोस्वामीजी महाराज ! 'प्रीति' के सम्बन्धमें सूरदासजीकी उक्ति भी तो देखनी है:—

विनय-पत्रिका ४२१ प्रीति करि काहूने सुख न लह्यो । अलिसुत प्रीति करी जलसुत सों सम्पुट माँहिं रह्यो ॥ प्रीति पतंग करीजु दीपक सों आपुन प्रान दह्यो । सारँग प्रीति करीजु नाद सों सनमुख बान सह्यो ॥ हम जो प्रीति करी माधव सों चलत कछू ना कह्यो । सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस बिनु नैनन नीर बह्यो ॥ २—'सोई नर खरु है'—ईश्वर-विमुख प्राणीको गधेकी उपाधि देना मामूली बात है । श्रीमद्भागवतमें तो यह लिखा है:— श्वविड्वराहोष्ट्रखरैः संस्तुतः पुरुषः पशुः । न यत्कर्णपथोपेतो जातुनाम गदाग्रजः ॥ बिले बतोरुक्रमविक्रमान्ये नशृण्वतः कर्णपुटे नरस्य । जिह्वासती दार्दुरिकेव सूत न चोपगायत्युरुगायगाथाः ॥ (२।३।१९-२०) अर्थात् 'जिसके कर्णपथमें भगवान्‌के नाम-गुणोंने कभी प्रवेश नहीं किया, वह मनुष्यरूपी पशु कुत्ते, विष्ठाभोजी सूअर, ऊँट और गधेकी अपेक्षा भी अधिक निन्दनीय है। हे सूतजी ! जो कान भगवान्‌की लीलाका श्रवण नहीं करते वे साँपकी बिलके समान हैं और जो दुष्ट जिह्वा भगवान्‌की लीला-कथाका गान नहीं करती वह मेढककी जीभके समान व्यर्थ बकवाद करनेवाली है । इस श्लोकका अनुवाद गोस्वामीजीने रामचरितमानसमें इस प्रकार किया है— जिन्ह हरिकथा सुनी नहिं काना । श्रवनरन्ध्र अहि-भवन समाना ॥ जो नहिं करहि राम-गुन-गाना । जीह सो दादुर-जीह समाना ॥ ३—'नाम सों निबाह......बरु है'--इसका अर्थ वियोगी हरिजीने लिखा है—बलिहारी—तुलसीदासको वही बड़ा बल दीजिये, जिससे आपके नामके

साथ उस दीनका प्रेम निभ जाय (बीचमें कोई बाधक न हो) । 'वरु' का अर्थ 'जल' करनेके कारण ही साधु अर्थ गुम हो गया है। [२५६] कहे बिनु रह्यो न परत, कहे राम ! रस न रहत। तुम से सुसाहिब की ओट जन खोटो-खरो, काल की, करमकी कुसाँसति सहत ॥१॥ करत बिचार सार पैयत न कहूँ कछु, सकल बड़ाई सब कहाँ ते लहत ? नाथ की महिमा सुनि, समुझि अपनी ओर, हेरि हारि कै हहरि हृदय दहत ॥२॥ सखा न, सुसेवक न, सुतिय न, प्रभु आप, माय-बाप तुही साँचो तुलसी कहत । मेरी तौ थोरी है, सुधरैगी बिगरियौ, बलि, राम ! रावरी सौं रही रावरी चहत ॥३॥ शब्दार्थ—कुसाँसति = बुरी तरह कष्ट ! हेरि = देखकर । हहरि = हताश होकर । बिगरियौ = बिगड़ी हुई भी । भावार्थ—हे रामजी ! कहे बिना रहा नहीं जाता और कहनेसे मजा जाता रहता है। आप-सरीखे सुन्दर स्वामीकी आड़ पाकर भी यह खरा-खोटा सेवक काल और कर्मकी बुरी तरह तकलीफ सह रहा है ॥१॥ (आपका यह सेवक) विचार किया करता है, पर कहीं कुछ सार नहीं पाता । सब लोग नाना प्रकार- की बड़ाई कहाँसे पाते हैं ? हे नाथ ! आपकी महिमा सुन-समझकर तथा अपनी ओर (अपनी करनीकी ओर) देखकर हार मान लेता और जी छोटा कर लेता हूँ; इससे मेरा हृदय जलने लगता है ॥२॥ न तो मेरा कोई मित्र है, न अच्छा सेवक है और न अच्छी स्त्री है । हे प्रभो ! तुलसी तो सच्ची बात कहता है कि उसके माता-पिता बस आप ही हैं। मेरी तो थोड़ी-सी बात है, बिगड़नेपर भी सुधर जायगी; किन्तु हे रामजी, बलिहारी ! आपकी कसम, मैं तो केवल आपकी बात रखना चाहता हूँ ॥३॥