विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०६ विनय-पत्रिका राम नाम को प्रभाउ पूजियत गनराउ, कियो न दुराउ, कही अपनी करनि। भवसागर-सेतु, कासी हू गति हेतु, जपत सादर संभु सहित घरनि ॥२॥ बाल्मीकि व्याध हे अगाध-अपराध-निधि, 'मरा' 'मरा' जपे पूजे मुनि अमरनि। रोक्यो बिन्ध्य, सोख्यो सिन्धु घटजहुँ नाम-बल, हार्यो हिय खारो भयो भूसुर-डरनि ॥३॥ नाम-महिमा अपार, सेष-सुक बार बार, मति-अनुसार बुध बेद हू वरनि। नामरति कामधेनु तुलसीको कामतरु, रामनाम है बिमोह-तिमिर-तरनि ॥४॥ शब्दार्थ-दुराउ = छिपाव । घरनि = स्त्री । हे = थे । अमरनि = देवताओं । घटजहुँ = कुम्भज ऋषि ने भी । भूसुर = देवता । विमोह = अज्ञान । तरनि = सूर्य । भावार्थ-हे जीभ ! तू यह जानकर और विश्वास मानकर प्रेमसे राम- नामका जप कर कि रामका नाम जपनेसे ही हृदयकी दाह मिटेगी। रामनाममें ही रहन-सहन रखना अर्थात् उठते-बैठते रामका नाम जपना एवं रामनामका ही उच्चारण करना दुष्ट कलिकालके पापों और शोक-संकटको हरनेवाला है ॥१॥ रामनामका ही प्रभाव है कि गणेशजी (सर्वप्रथम) पूजे जाते हैं। अपनी करनीको गणेशजीने स्वयं कहा है, कुछ भी नहीं छिपाया है। यह नाम संसार-समुद्रका पुल है तथा काशीमें मुक्ति देनेका मूल कारण है। (क्योंकि शिवजी 'रामतारक' मन्त्रके उपदेश द्वारा ही जीवोंको मुक्त किया करते हैं) इसे भगवान् शंकर अपनी पत्नी पार्वतीके सहित बड़े आदरपूर्वक जपा करते हैं ॥२॥ वाल्मीकि (पहले) बहेलिया थे, अपराधोंके अगाध-समुद्र थे। किन्तु 'मरा-मरा' जपनेके प्रभावसे वह मुनियों और देवताओं द्वारा पूजे गये। अगस्त्य-ऋषि भी रामनामके ही बलसे विन्ध्यगिरिको रोकने एवं समुद्रको सोखनेमें समर्थ हुए थे। पश्चात् ब्राह्मण (अगस्त्य-ऋषि) के डरसे समुद्र अपने हृदयमें हार मानकर खारा हो गया