भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 418

विनय-पत्रिका ४०७ (ताकि अगस्त्य-ऋषि या और अन्य तपस्वी ब्राह्मण उसे खारा मानकर आचमन न कर सकें) ॥३॥ शेष, शुकदेवजी, पण्डित तथा वेदोंने अपनी-अपनी बुद्धिके अनुसार इसका वर्णन करते हुए कहा है कि रामनामकी महिमा अपार है। रामनाममें प्रेम होना तुलसीके लिए कामधेनु और कल्पवृक्ष है। यह राम- नाम अज्ञानान्धकारको दूर करनेके लिए सूर्य है ॥४॥ विशेष १—'राम जपु······जवनि'—भगवान्ने स्वयं कहा है— ता ये शृण्वन्ति गायन्ति ह्यनुमोदन्ति चादृताः । मत्पराः श्रद्दधानाश्च भक्तिं विन्दन्ति ते मयि ॥ भक्तिं लब्धवतः साधोः किमन्यदवशिष्यते । मय्यनन्तगुणे ब्रह्मण्यानन्दानुभवात्मनि ॥ . —श्रीमद्भागवत (११।२६ श्लोक । २९,३०) अर्थात् 'जो लोग मुझमें मन लगाकर श्रद्धा और आदरके साथ मेरी नाम- गुण-लीला-कथाको सुनते, गाते और चिन्तन करते हैं उनकी मुझमें अनन्य भक्ति हो जाती है। मुझ अनन्त-गुण-सम्पन्न सच्चिदानन्दघन—ब्रह्ममें भक्ति हो जाने- पर फिर उस साधु पुरुषको और कौनसी वस्तु प्राप्त करनी बाकी रह जाती है ?' २—'कुटिल कलिमल···हरनि'— पतितः स्खलितश्चार्तः क्षुत्त्वा वा विवशोऽब्रुवन् । हरये नम इत्युच्चैर्मुच्यते सर्वपातकात् ॥ सङ्कीर्त्यमानो भगवाननन्तः श्रुतानुभावो व्यसनं हि पुंसाम् । प्रविश्य चित्तं विधुनोत्यशेषं यथा तमोऽर्कोऽभ्रमिवातिवातः ॥ —श्रीमद्भागवत (१२।१२। श्लो. ४६-४७) अर्थात् 'कोई भी मनुष्य गिरते, पड़ते, छींकते और दुःखसे पीड़ित होते समय परवश होकर भी ऊँचे स्वरमें 'हरये नमः' पुकार उठता है तो वह सब