भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 419

४०८ विनय-पत्रिका पापोंसे छूट जाता है। जैसे सूर्य पर्वतकी गुफाके अन्धकारको भी नाश कर देता है, और जैसे प्रचण्ड वायु बादलोंको छिन्न-भिन्न करके लुप्त कर देता है, इसी प्रकार अनन्त भगवान्का नाम कीर्त्तन हृदयमें प्रवेश करके समस्त पापोंको धो डालता है।' ३—'पूजियत गनराउ'—एक बार देवताओंमें होड़ लगी कि जो ब्रह्माण्ड- की प्रदक्षिणा करके सबसे पहले आ जायगा, उसीकी पूजा सर्वप्रथम हुआ करेगी। फिर क्या था, सब देवता अपनी-अपनी सवारीपर बैठकर प्रदक्षिणा करने लगे। बेचारे गणेशजी चूहेपर बैठकर बड़े फेरमें पड़े। भला चूहेपर बैठकर वह कितनी शीघ्रता करते ? अचानक नारदजी मिले। उन्होंने गणेशजीके उदास रहनेका कारण जानकर कहा, आप राम-नाम लिखकर उसीकी प्रदक्षिणा कर डालें। क्योंकि रामनाममें समूचा ब्रह्मांड निहित है। गणेशजीने ऐसा ही किया। परिणाम यह हुआ कि सब देवताओंको हार माननी पड़ी, और उसी समयसे प्रत्येक कार्यमें सर्वप्रथम पूजा गणेशजीकी होने लगी। गुसाईंजीने रामचरित मानसमें लिखा है— महिमा जासु जान गन राउ। प्रथम पूजियत नाम प्रभाऊ ॥ ४—'कहाँ आपकी करनि'—पुराणमें यह कथा भी पायी जाती है कि पहले गणेशजी बड़े उपद्रवी थे। इन्होंने सैकड़ों मुनियोंको मार डाला था। शिवजीने इनके उपद्रवसे दुःखित होकर रामजीका स्मरण किया। रामजीने प्रकट होकर 'राम सहस्र नाम' जपनेका उपदेश दिया। उस जपसे गणेशजी मंगलमूर्ति हो गये। ब्रह्मांड पुराणमें गणेशजीने कहा है— 'ततस्तद्ग्रहणादेव निष्पापोऽस्मि तदैव हि। तदादि सर्वदेवानां पूज्योऽस्मि मुनिरुत्तम ॥' ५—'बालमीकि'—९४ पदके विशेषमें देखिये। ६—'रोक्यो बिन्ध्य'—विन्ध्याचल पहाड़ बहुत ऊँचा था। सूर्यकी प्रखर किरणोंसे अपने पेड़ोंको बचानेके लिए वह अपना शरीर बढ़ाने लगा। इससे देवलोक व्याकुल हो उठा। समस्त देवताओंने आकर अगस्त्य ऋषिसे प्रार्थना की। अगस्त्य ऋषिने रामनामका स्मरणकर उक्त पर्वतके मस्तकपर हाथ रख