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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

पृष्ठ 420, कुल 475 में से

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पृष्ठ 420

विनय-पत्रिका ४०९ दिया और कहा'—'जबतक मैं लौटकर यहाँ न आऊँ, तबतक तू यहाँ इसी प्रकार पड़ा रह।' उसके बाद अगस्त्यजी नहीं लौटे, अतः विन्ध्याचल पर्वत ज्योंका त्यों पड़ा रह गया । यह रामनामकी महिमा है। ७—'सोख्यो सिंधु'—पद १२ के विशेषमें देखिये। यह कथा इस प्रकार भी पायी जाती है कि अगस्त्यमुनि शामके वक्त समुद्रके किनारे बैठे पूजा कर रहे थे। पूर्णमासी होनेके कारण समुद्रका ज्वार प्रतिक्षण बढ़ रहा था । उसकी लहरोंमें अगस्त्य मुनिकी पूजाकी सामग्री बह गयी । इससे वह बहुत क्रुद्ध हुए और 'ॐ राम' कहकर तीन आचमनमें समुद्रका सब जल पी गये। पीछे देव- ताओंके विशेष आग्रह करनेपर अगस्त्य ऋषिने पेशाबके रास्ते उसे बाहर निकाल दिया । [ २४८ ] पाहि, पाहि राम ! पाहि, रामभद्र, रामचन्द्र ! सुजस श्रवन सुनि आयो हों सरन। दीनबन्धु ! दीनता-दरिद्र-दाह-दोष-दुख दारुन दुसह दर-दुरति-हरन ॥१॥ जब जब जग-जाल ब्याकुल करम काल, सब खल भूप भये भूतल भरन । तब तब तनु धरि, भूमि-भार दूरि करि थापे मुनि, सुर, साधु, आश्रम, वरन ॥२॥ बेद, लोक, सब साखी, काहू की रती न राखी, रावन की वन्दि लागे अमर मरन। ओक दै विसोक किये लोकपति लोकनाथ, राम राज भयो धरम चारिहु चरन ॥३॥ सिला, गुह, गीध, कपि, भील, भालु, रातिचर, ख्याल ही कृपालु कीन्हे तारन-तरन। पील-उद्धरन ! सीलसिंधु ! ढील देखियतु, तुलसी पै चाहत गलानि ही गरन ॥४॥

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