भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 421, कुल 475 में से

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पृष्ठ 421

४१० विनय-पत्रिका शब्दार्थ—दर = डर । दुरित = पाप । रती = तेज । बन्दि = जेल । अमर = देवता । ओक = आश्रय । पील = हाथी । शब्दार्थ—हे रामजी ! रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये ! हे कल्याण-स्वरूप रामचन्द्र ! रक्षा कीजिये ! आपका सुयश सुनकर मैं शरणमें आया हूँ। हे दीन- बन्धु ! आप दीनता, दरिद्रता, जलन, दोष, दुःख, भयंकर और असह्य डर एवं पापोंका नाश करनेवाले हैं ॥१॥ जब-जब संसार-जालसे तथा कर्म और कालसे व्याकुल होकर सब राजा दुष्ट हो गये और उनसे पृथिवी भर गयी, तब-तब आपने शरीर धारण करके (अवतार लेकर) पृथिवीका भार दूर किया एवं मुनियों, देवताओं, संतों, (चारों) आश्रमों एवं (चारों) वर्णोंकी स्थापना की ॥२॥ लोक और चारों वेद साक्षी हैं कि जब रावणने किसीका तेज न रहने दिया और उसके कैदखानेमें अमर देवता भी मरने लगे, तब हे त्रिलोकीनाथ ! आपहीने लोक-पतियों-(इन्द्र, कुबेर आदि) को आश्रय देकर शोक-रहित किया । (आपकी कृपासे) आपका राज्य (रामराज्य) हो गया और धर्मके चारों चरण हो गये यानी सत्य, तप, दया और दान पनप उठे ॥३॥ हे कृपालु ! अहल्या, निषाद, जटायु, बन्दर, भील, भालु और राक्षसोंको आपके ख्यालने ही तारन-तरन कर दिया अर्थात् आपके ध्यान देनेसे ही ये लोग स्वयं तरकर दूसरोंको तारनेवाले हो गये । हे गजेन्द्रका उद्धार करनेवाले ! हे शीलसागर ! यह तुलसी अपनेपर आपकी ओरसे ढिलाई देखकर ग्लानिसे ही गला चाहता है ॥४॥ विशेष १—'दुरित'—बहुतसी प्रतियों में 'दरप' पाठ है । यह पाठ होनेपर यहाँ इसका अर्थ होगा 'गर्व' । २—'आश्रम'—चार हैं; ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास । ३—'बरन'—वर्ण भी चार हैं; ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र । ४—'सिला'—अहल्या; ४३ पदके विशेषमें देखिये । ५—'गुह'—निषाद; १०६ पदके विशेषमें देखिये । ६—'गीध'—जटायु; २१५ पदके विशेषमें देखिये । ७—'पील—गजेन्द्र; ८३ पदके विशेषमें देखिये ।

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