भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 424

विनय-पत्रिका ४१३ शब्दार्थ—ठहरु = स्थान। . सहरु = शहर, नगर। गहरु = देर। कहरु = जुर्म, अनीति। इहरु = जी छोटा करना, हार मान लेना। भावार्थ—हे नाथ ! यदि मुझे कहीं भी कोई स्वामी और ठिकाना होता, तो मैं बारम्बार आपको पुकार-पुकार कर न खिझाता। मुझ सरीखे आलसी और अभागेको आप ही कृपालुने पाला-पोसा है, अतः (मेरे लिए) रामचन्द्रजी ही मेरे राजा (स्वामी) हैं और अयोध्या ही नगर (ठिकाना) है ॥१॥ न तो मैंने दिग्पाल, सूर्य, गणेश और पार्वतीजीकी सेवा ही की और न ब्रह्मा, विष्णु, महेशको ही अपना हितू करके माना। मेरा तो योग, क्षेम, नेम, प्रेम और प्रण एक रामनामसे ही है। मेरे लिए उसका भरोसा अमृतके समान है और दूसरे साधन जहरके समान हैं ॥२॥ हे अनाथोंके नाथ ! मैं अपने साथवालों-(काम, क्रोधादि) का समाचार किससे कहूँ? क्योंकि चोर (कामादि) और पहरेदार (जीव) सब आपहीके हाथमें हैं। राजराजेश्वर ! आपने अपने कामोंमें, देवताओंके कामोंमें तथा दीन-दुखियोंके कामोंमें क्या कभी देर की है ? तो फिर मेरे लिए क्यों इतना विलम्ब हो रहा है? ॥३॥ आपकी रीति (पतित-पावनता आदि) सुनकर आपहीपर मेरा विश्वास और प्रेम हुआ है; किन्तु कलिकालका जुर्म देखकर मैं डर रहा हूँ (कि कहीं वह मुझे भगवत्प्रीतिसे हटाकर विषयोंमें न फँसा दे)। हे रामजी ! मैं आपकी बलैया लेता हूँ! आपके कहनेसे बनेगी या किसीके द्वारा कहलानेसे ? बस, इतना कह दीजिये कि 'ऐ तुलसी ! तू मेरा है, हृदयमें हार मानकर अपना जी छोटा न कर' ॥४॥ [ २५१ ] राम ! रावरो सुभाउ, गुन सील महिमा प्रभाउ, जान्यो हर, हनुमान, लखन, भरत । जिन्हके हिये-सुथरु राम-प्रेम-सुरतरु, लसत सरस सुख फूलत फरत ॥१॥ आप माने स्वामी कै सखा सुभाइ भाइ पति ते सनेह-सावधान रहत डरत । साहिब-सेवक-रीति, प्रीति, परिमिति, नीति, नेम को निवाहु एक टेक न टरत ॥२॥