विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंही हैं। आप सद्गुणोंके घर तथा अत्यन्त पवित्र हैं। आपका रुख सदा अच्छा रहता है। आप प्रसन्नमुख, एकरस एवं एकरूप रहते हैं। आपको विशेष रूपसे घट-घटका हाल ज्ञात है॥३॥ आपके समान शरणागत-पालक और कृपालु (स्वामी) तथा मुझसा कंगाल दूसरा कोई नहीं है। देव ! दयामें सब धर्मोंका निवास होता है (अतः आप मुझपर दया कीजिये)। आप कल्पवृक्ष हैं, और मेरा मन इसी कल्पवृक्षकी छाया (में मनोवाञ्छित फल प्राप्त करनेके लिए बैठना) चाहता है। बलिहारी ! तुलसीदास कलिके कुधर्मोंसे विकल हो रहा है॥४॥
विशेष १—'बलनि भरम'—कहीं-कहीं 'बल निभरम' पाठ है। ऐसा पाठ होनेपर 'बलपर निःशंक' अर्थ होगा।
[ २५० ] तौ हौं वार वार प्रभुहि पुकारि कै खिझावतो न, जो पै मोको होतो कहूँ ठाकुर-टहरु । आलसी-अभागे मोसे तैं कृपालु पाले-पोसे, राजा मेरें राजाराम, अवध सहरु ॥१॥ सेये न दिगीस, न दिनेस, न गनेस, गौरी, हित कै न माने विधि हरिउ न हरु । रामनाम ही सों जोग-छेम, नेम, प्रेम-पन, सुधा सो भरोसो एहु, दूसरो जहरु ॥२॥ समाचार साथ के अनाथ-नाथ ! कासों कहौं, नाथ ही के हाथ सब चोरऊ पहरु । निज काज, सुरकाज, आरतके काज, राज ! बूझिये विलम्ब कहा कहूँ न गहरु ॥३॥ रीति सुनि रावरी प्रतीति-प्रीति रावरे सों, डरत हौं देखि कलिकाल को कहुरु ! कहे ही बनैगी कै कहाये, बलि जाऊँ, राम, 'तुलसी ! तू मेरो, हारि हिये न हहरु' ॥४॥