विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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सुक-सनकादि, प्रह्लाद-नारदादि कहैं, राम की भगति बड़ी बिरति-निरत । जाने बिनु भगति न, जानिवो तिहारे हाथ, समुझि सयाने नाथ ! पगनि परत ॥३॥
छ-मत बिमत, न पुरान मत, एक मत, नेति-नेति-नेति नित निगम करत । औरनि को कहा चली ? एक बात भलै भली, राम-नाम लिये तुलसी हू से तरत ॥४॥
शब्दार्थ—बिरति = वैराग्य । निरत = रत, अनुरक्त । छ-मत = छ शास्त्रोंका मत । बिमत = विरुद्धमत । निगम = वेद ।
भावार्थ—हे राम ! आपके स्वभाव, गुण, शील, महिमा और प्रभावको शिवजी, हनुमान्जी, लक्ष्मणजी तथा भरतजीने ही जाना है—जिनके हृदयरूपी सुन्दर थाल्हेमें राम-प्रेमका कल्पवृक्ष सुशोभित हो रहा है जो सुख-रूपी सरस फूल फूलता और वैसा ही फल फलता है ॥१॥ आप अपने स्वाभावानुसार (शिव- जीको) स्वामी, (हनुमान्जीको) सखा, (लक्ष्मण और भरतको) प्रिय भाई समझते हैं, किन्तु वे आपको अपना स्वामी समझते एवं प्रेममें सावधान और डरते रहते हैं (कि कोई चूक न हो जाय) । स्वामी और सेवककी रीति, प्रीति, परिमिति (प्रमाण), नीति और नेमका निर्वाह करनेमें अपनी टेकसे नहीं टलते; अर्थात् न तो आप ही लापरवाही करते हैं और न शिव, हनुमान् , लक्ष्मण एवं भरतजी ही चूकते हैं ॥२॥ शुकदेव, सनक-सनन्दन-सनातन-सनत्कुमार, प्रह्लाद, नारद प्रभृतिका कथन है कि रामजीकी भक्ति, वैराग्यमें अत्यन्त अनुरक्त होनेसे ही प्राप्त होती है। किन्तु बिना जाने अर्थात् बिना सामान्य ज्ञानके भक्ति नहीं होती, और वह जानना, आपके हाथमें है। हे नाथ ! इसे समझकर ही चतुर लोग आपके चरणोंपर पड़ते हैं ॥३॥ छ शास्त्रोंके मत परस्पर विरुद्ध हैं, पुराणोंके मत भी एकसे नहीं हैं; और वेद तो नित्य ही 'नेति-नेति-नेति' करते रहते हैं (अर्थात् परमात्माके स्वरूपका ठीक-ठीक बोध वेदों, शास्त्रों या पुराणोंसे भी नहीं होता) । इसलिए अच्छीसे अच्छी बात एक ही है (यानी रामनामका जप करना : क्योंकि