भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 427

४१६ विनय-पत्रिका इन्हमें न एकौ भयो, बूझि न जूझ्यो न जयो, ताहि ते त्रिताप-तयो, लुनियत बई ॥३॥ स्वाँग सूधो साधुको, कुचालि कलि तें अधिक, परलोक फीकी मति, लोक रंग-रई। बड़े कुसमाज राज ! आजु लौं जो पाये दिन, महाराज ! केहू भाँति नाम ओट लई ॥४॥ राम ! नाम को प्रताप जानियत नीके आप, मोको गति दूसरी न विधि निरमई । खीझिबे लायक करतब कोटि कोटि कटु, रीझिबे लायक तुलसी की निलजई ॥५॥ शब्दार्थ—घनी = बहुत। अपवाद = निन्दा। हई = नष्ट हो गयी है। जयो = जीता । लुनियत = काट रहा हूँ। बई = बोया। रंग-रई = रँगी हुई। ओट = आड़। निरमई = बनायी। भावार्थ—हे पिताजी ! मैंने अपनी ही करनीसे अपना बहुत बिगाड़ डाला। बलिहारी ! इस लालची और झूठेकी बात एक बार सुधार दीजिये, क्योंकि आप- हीके भलाई करनेसे सबका भला हुआ है ॥१॥ शरीर रुग्ण है और मन बुरी- बुरी कामनाओंसे मलिन हो गया है; वाणी दूसरेकी निन्दा करने और झूठ बोलनेसे मलिन हो गयी है। साधनकी भी ऐसी विधि है कि बिना साधनाके सिद्धि नहीं हो सकती; किन्तु हे कृपानिधे ! आपकी कृपा हमेशा बिगड़ी बातोंको बनाया करती है ॥२॥ आप पतित-पावन हैं, दीन-दुखियों और अनाथोंकी भलाई करनेवाले हैं। हे दीनबन्धु ! आपने निराधारको आधार दिया है। किन्तु मैं तो इनमें एक भी न हुआ (अभिमानके कारण मैंने अपनेको कभी पतित, दुखी, अनाथ और निराधार समझा ही नहीं); न तो मैंने विवेकसे सांसारिक विकारोंके साथ युद्ध किया और न उन्हें जीता ही। इसीसे (दैहिक, दैविक और भौतिक) तीनों तापोंसे तप रहा हूँ; जो बोया सो काट रहा हूँ ॥३॥ स्वाँग तो मैंने सीधे साधुका बना रखा है, पर कुचाली हूँ कलियुगसे भी अधिक। परलोककी ओर मेरी बुद्धि फीकी है, पर सांसारिक रंगमें खूब रँगी हुई है। हे राजराजेश्वर ! इस बड़े भारी दुष्ट समाजमें अबतक इतने दिन व्यर्थ बिताकर

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