विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 428, कुल 475 में से
संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ४१७ किसी प्रकार मैंने आपके नामकी शरण ली है ॥४॥ हे रामजी ! आप अपने नामका प्रताप जानते हैं। विधाताने मेरे लिए (आपके नामके सिवा) दूसरी गति बनायी ही नहीं। आपके क्रोध करने योग्य मेरे करोड़ों बुरे कर्म हैं; किन्तु आपके प्रसन्न होने योग्य तुलसीदासकी केवल निर्लज्जता ही है ॥५॥ विशेष १—'दई'—कुछ टीकाकारोंने इस शब्दका 'दयालु' अर्थ भी लिखा है। [ २५३ ] राम ! राखिये सरन, राखि आये सब दिन । बिदित त्रैलोक तिहुँ काल न दयालु दूजो, आरत-प्रनत-पाल को है प्रभु बिन ? ॥१॥ लाले पाले, पोषे तोषे आलसी-अभागी-अघी, नाथ ! पै अनाथनि सों भये न उरिन । स्वामी समरथ ऐसो, हौं तिहारो जैसे-तैसो काल-चाल हेरि होति हिये घनी घिन ॥२॥ खीझि-रीझि-बिहँसि-अनख, क्यों हूँ एक बार 'तुलसी तू मेरो', बलि कहियत किन ? जाहि सूल निरमूल, होहिं सुख अनुकूल, महाराज राम ! रावरी सौं, तेहि छिन ॥३॥ शब्दार्थ—तोषे = सन्तुष्ट कर दिया। अघी = पापी। हेरि = देखकर। अनख = त्यौरी चढ़ाकर। सौं = शपथ। भावार्थ—हे रामजी ! मुझे अपनी शरणमें रखिये, क्योंकि आप सदासे (दीनोंको शरणमें) रखते आये हैं। यह प्रकट है कि तीनों लोक और तीनों काल- में आपके समान कोई दयालु नहीं है। हे प्रभो ! आपको छोड़कर शरणागत दीन-दुखियोंका पालन करनेवाला दूसरा कौन है ? ॥१॥ आपने आलसी, अभागे और पापियोंका लालन-पालन किया, पोषण किया और उन्हें सन्तुष्ट कर दिया। फिर भी हे नाथ ! (इतना करनेपर भी) आप उनसे उऋण नहीं हुए। स्वामी ! २७