विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४१८ विनय-पत्रिका आप ऐसे समर्थ हैं, और मैं जैसा भी हूँ तैसा आपहीका हूँ; कलिकालकी चाल देखकर मेरे हृदयमें गहरी घृणा पैदा हो रही है ॥२॥ बलिहारी ! एकबार आप झल्लाकर, प्रसन्न होकर, हँसकर अथवा अनखाकर किसी भी तरह सही, इतना क्यों नहीं देते कि 'तुलसी, तू मेरा है' । हे महाराज रामचन्द्र ! आपकी सौगन्ध, (आपके इतना कहते ही) उसी क्षण मेरा सब दुःख जड़से नष्ट हो जायगा और सब सुख मेरे अनुकूल हो जायँगे ॥३॥ विशेष —'तोषे'—'पोषे तोषे'का अर्थ कई टीकाकारोंने 'पाला-पोसा' लिखा है। [ २५४ ] राम ! रावरो नाम मेरो मातु-पितु है । सुजन, सनेही, गुरु-साहिब, सखा-सुह्रद, राम-नाम प्रेम-पन अविचल बितु है ॥१॥ सतकोटि चरित अपार दधिनिधि मथि, लियो काढ़ि बामदेव नाम-घृतु है । नामको भरोसो-बल चारि हू फल को फल, सुमिरिये छाँड़ि छल, भलो क्रतु है ॥२॥ स्वारथ-साधक, परमारथ-दायक नाम, राम-नाम सारिखो न और हितु है । तुलसी सुभाव कही साँचिये परैगी सही, सीतानाथ-नाम नित चित हू को चितु है ॥३॥ शब्दार्थ—अविचल = विचलित न होनेवाला। बितु = धन। बामदेव = महादेवजी। क्रतु = कर्म, यज्ञ। चितु = चित्त। भावार्थ—हे रामजी ! आपका नाम ही मेरा माता-पिता, स्वजन, सनेही, गुरु, स्वामी, मित्र और सुहृद है। आपके नाममें जो प्रेमका मेरा प्रण है, वही मेरा स्थायी धन है ॥१॥ शिवजीने सैकड़ों करोड़ आपके चरित्ररूपी अगाध दधिसमुद्र- को मथकर नाम-रूपी घी निकाल लिया है। नामका बल-भरोसा चारों फलोंका फल यानी अर्थ, धर्म, काम, मोक्षका सार-रूप है। इसलिए छल छोड़कर राम-