विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनामका स्मरण करना चाहिये। यही उत्तम यज्ञ है ॥२॥ रामका नाम स्वार्थका साधनेवाला तथा परमार्थ देनेवाला है। रामनामके समान हितू और कोई भी नहीं है। यदि यह बात तुलसीदासने स्वभावसे कही है, तो सचमुच ही इसपर सही पड़ेगी। हे सीतानाथ ! आपका नाम नित्य है और चित्तका भी चित्त है ॥३॥ विशेष १—'सुभाव'—इसका अर्थ 'अच्छा भाव' भी किया जाता है। २—'नामको भरोसो बल चारि हू फल को फल'—तभी तो श्रीमद्भाग- बतमें देवी देवहूतिने भगवान् कपिलदेवसे कहा है— अहो बत् श्वपचोऽतोगरीयान् यंजिह्वाग्रे वर्तते नामतुभ्यम् । तेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुरार्या ब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये ते ॥ (३।३३।७) 'अहो, जिसकी जबानपर तुम्हारा पवित्र नाम रहता है, वह चाण्डाल भी सर्वश्रेष्ठ है; क्योंकि जो तुम्हारे नामका कीर्तन करते हैं उन श्रेष्ठ पुरुषोंने तप, यज्ञ, तीर्थस्नान, वेदाध्ययन सब-कुछ कर लिये। ३—'चित्त'— वेदान्तशास्त्रका कथन है— “अनुसन्धानात्मिकान्तःकरणवृत्तिः ।” [ २५५ ] राम ! रावरो नाम साधु-सुरतरु है। सुमिरे त्रिबिध घाम हरत, पूरत काम, सकल सुकृत सरसिजको सरु है ॥१॥ लाभ हू को लाभ, सुख हू को सुख, सरबस, पतित-पावन, डर हू को डरु है। नीचे हू को, ऊँचे हू को, रंक हू को राव हू को सुलभ, सुखद आपनो-सो घरु है ॥२॥