विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०४ विनय-पत्रिका ॥२॥ दिलमें जान-बूझकर भी कुटिल (दुष्ट) मैं कर्मके कीचड़में चित्तको सान- कर मलसे ही मलको धोना चाहता हूँ। मैं ऐसा दुष्ट प्यासा हूँ कि गंगाजीको छोड़कर व्याकुल हो बारम्बार आकाश दुहता रहा (सच्चे सुखके लिए दुःखरूप विषयोंमें उलझा रहा) ॥३॥ हे प्रभो ! अब तुलसीदासपर कृपा कीजिये, क्योंकि मैंने अपना दोष तनिक भी आपसे नहीं छिपाया है। हे नाथ! मुझे बिछौना बिछाते-बिछाते ही सारी रात बीत गयी (उपाय ही करते-करते जिन्दगी खतम हो गयी), कभी भी नींद भर न सोया (आत्मसुख नहीं प्राप्त कर सका ) ॥४॥ विशेष १—‘डासत······सोयो’—यहाँ जीवनको ‘निसा’ इसलिए कहा है कि यह जीवन अज्ञानमय है, और अज्ञान अन्धकाररूप है। [ २४६ ] लोक-बेद हूँ विदित बात सुनि-समुझि मोह-मोहित बिकल मति थिति न लहति । छोटे-बड़े, खोटे-खरे, मोटेऊ दूबरे, राम ! रावरे निबाहे सबहीकी निबहति ॥१॥ होती जो आपने बस, रहती एक ही रस, दुनी न हरष-सोक-साँसति सहति । चहतो जो जोई जोई, लहतो सो सोई सोई, केहू भाँति काहू की न लालसा रहति ॥२॥ करम, काल, सुभाउ गुन-दोष जीव जग माया तें, सो सबै भौंह चकित चहति । ईसनि-दिगीसनि, जोगीसनि-मुनीसनि हूँ, छोड़ति छोड़ाये तें, गहायै तें गहति ॥३॥ सतरंज को सो राज, काठ को सबै समाज, महाराज बाजी रची, प्रथम न हति । तुलसी प्रभुके हाथ हारिबो-जीतिबो नाथ ! बहु बेष, बहु मुख सारदा कहति ॥४॥