भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 391

३८० विनय-पत्रिका नाम जपनेका सार है और हिंसा करना या बध करना उलटे नामका जप है। अथवा 'उलटे पलटे' का अर्थ अनाप-शनाप भी हो सकता है। २—गुसाईंजीने रामचरितमानसमें नाम और नामीका वर्णन विस्तृत रूप- से किया है :— निर्गुन ते इहि भाँति बड़, नाम प्रभाउ अपार। कहउँ नाम बड़ राम तें, निज बिचार अनुसार ॥ × × × राम एक तापस तिय तारी । नाम कोटि खल कुमति सुधारी ॥ × × × राम सुकण्ठ विभीषण दोऊ । राखे सरन जान सब कोऊ । नाम अनेक गरीब निवाजे । लोक बेद वर विरद विराजे ॥ राम भालु कपि कटक बटोरा । सेतु हेतु श्रम कीन न थोरा ॥ नाम लेत भव-सिन्धु सुखाहीं । करहु बिचार सुजन मन माहीं ॥ —रामचरितमानस [२२९] गरैगी जीह जो कहौं और को हौं। जानकी-जीवन ! जनम-जनम जग ज्यायो तिहारेहि कौर को हौं ॥१॥ तीनि लोक, तिहुँ काल न देखत सुहृद रावरे जोर को हौं। तुमसों कपट करि कलप-कलप कृमि है हौं नरक घोर को हौं ॥२॥ कहा भयो जो मन मिलि कलिकालहिं कियौ भौंतुआ भौर को हौं। तुलसिदास सीतल नित यहि बल, बड़े ठेकाने ठौर को हौं ॥३॥ शब्दार्थ—गरैगी = गल जायगी। जोरको = जोड़का, बराबरीका । कृमि = कीड़ा । भौंतुआ = जलमें रहनेवाला काले रंगका छोटा कीड़ा। ये कीड़े नौकाओंके पास विशेष रूपसे रहते हैं और बड़े तेज तैराक होते हैं। इन्हें पौड़किया और भौंरा भी कहते हैं। भौर = भँवर । भावार्थ—मेरी जीभ गल जायगी यदि मैं यह कहूँगा कि मैं दूसरेका हूँ । हे जानकी-जीवन ! मैं तो इस संसारमें जन्म-जन्मसे आपहीके कौरेका जिलाया हुआ हूँ ॥१॥ तीनों लोक (आकाश, पाताल, मर्त्य) और तीनों काल-(भूत,