भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 392

विनय-पत्रिका ३८१ वर्तमान, भविष्य) में मैं आपके जोड़का सुहृद् नहीं देखता । आपके साथ कपट करनेसे मैं कल्प-कल्पान्ततक घोर नरकका कमि होकर रहूँगा ॥२॥ क्या हुआ, यदि कलियुगने मेरे मनसे मिलकर उसे भँवरका भौंतुवा बना दिया ? तुलसीदास इसी बलपर प्रसन्न रहता है कि वह बड़े ठौर-ठिकानेका रहनेवाला है अर्थात् श्रीरामजीके दरबारका सेवक है। कलियुग उसका एक बाल भी बाँका नहीं कर सकता ॥३॥ विशेष १—'तीनि लोक ..... हौं'—वास्तवमें दशरथके लला प्रत्येक बातमें अद्वितीय हैं। जो बातें उनमें हैं, वे तीनों लोकमें दिखाई नहीं पड़तीं । देखिये न, भिखारीदास भी कहते हैं— ब्याल, मृनाल सुडाल कराकृति, भावते जू की भुजान मैं देख्यौ । आरसी सारसी सूर सरसी दुति आनन आनंदखान मैं देख्यौ ॥ मैं मृगमीन मृनालन की छबि 'दास' उन्हीं अँखियान मैं देख्यौ । जो रस ऊख मयूख पियूष मैं सो हरि की बतियान मैं देख्यौ ॥ सारसी = कमलिनी । [ २३० ] अकारन को हितू और को है । बिरद 'गरीब-निवाज' कौन को, भौंह जासु जन जोहैं॥१॥ छोटो बड़ो चहत सब स्वारथ, जो विरंचि बिरचो है । कोल कुटिल, कपि-भालु पालिवो कौन कृपालुहि सोहै ॥२॥ काको नाम अनख आलस कहैं अघ अवगुननि बिछोहै । को तुलसीसे कुसेवक संग्रह्यो, सठ सब दिन साईं द्रोहै ॥३॥ शब्दार्थ—जोहैं=देखे। अनख = क्रोध। अघ = पाप । संग्रह्यो = संग्रह किया है। सठ= दुष्ट । भावार्थ—बिना कारणके हित करनेवाला और कौन है ? गरीबोंको निहाल करनेका बाना किसका है जिसकी भृकुटी यह दास विलोकता रहे ॥१॥ छोटे- बड़े जिन्हें ब्रह्माने बनाया है, वे सब अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहते हैं।