विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकुटिल कोल-भील, बन्दर और रीछ आदिका पालन करना और किस कृपालुको शोभा देता है ? ॥२॥ क्रोध और आलस्यके साथ भी किसका नाम लेनेसे पाप और दुर्गुण दूर हो जाते हैं ? किसने तुलसी-सरीखे बुरे सेवकका संग्रह किया है (अपनाया है), जो दुष्ट सदा अपने स्वामीसे द्रोह किया करता है ? ॥३॥ विशेष १—'चहत सब स्वारथ'—इसपर और भी कहा है :— 'स्वारथके सब ही सगे, बिनु स्वारथ कोउ नाहिं । सेवैं पंछी सरस तरु, निरस भये उड़ि जाहिं ॥' २—'काको······बिछोहै'—यही बात गुसांईजीने रामचरितमानसमें भी कही है— 'भाव कुभाव अनख आलसहू । नाम जपत मंगल दिसि दसहू ॥' ईश्वराराधन किसी भी भावसे क्यों न किया जाय, हर हालतमें वह कल्याणकारी ही होता है । बुरे भावसे साधन करना भी कल्याणप्रद हो जाता है । महाभारतमें एक कथा है जो कि इस प्रकार है—एक मेहतर था जो किसी राजाके यहाँ पाखाना साफ करता था । एक दिन उसकी नजर रानीपर पड़ गयी । परिणाम यह हुआ कि वह रानीको पानेके लिए बीमार पड़ गया । रानी भी उसका भाव ताड़ गयी । कई दिनोंके बाद रानीने मेहतरकी स्त्रीसे पूछा, आजकल तेरा पति क्यों नहीं दिखाई पड़ता ? उसने कहा, बीमार है । रानीने बीमारी- का हाल पूछा और आश्वासन देकर सच बात बतानेके लिए कहा । मेहतरानीने सब हाल कह सुनाया । रानीने कहा, उससे कहो कि वह जंगलमें जाकर खूब साधना करे । जब वह ऐसा अभ्यास करके यहाँ आवे कि महीनों बिना अन्न- जलके एक आसनसे रह सके, तब उसकी ख्याति सुनकर मैं भी उसका दर्शन करने जाऊँगी । उसी समय उससे भेंट हो सकेगी । मेहतर अपनी स्त्रीसे यह समाचार पाकर स्वस्थ हो गया और रानीसे मिलनेकी आशासे तप करनेके लिए जङ्गलमें चला गया । कुछ दिनोंके बाद अभ्यास बढ़ाकर वह राजाकी पुरीमें आया । उसकी अपूर्व साधनाका हाल सुनकर राजा भी उसका दर्शन करने गये और पीछे उन्होंने अपनी रानीको भी उसके पास दर्शनार्थ भेजा । रानीने उसे