विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ३८३ देखते ही पहचान लिया । कहा, रे ढोंगी ! अब तो आँखें खोल, मैं तेरे सामने खड़ी हूँ। मेहतरने आँखें खोलकर रानीको देखा। तुरन्त ही उसकी ज्ञान दृष्टि खुल गयी। सोचा, जिस मार्गपर ढोंग रचकर चलनेमें इतनी बड़ी शक्ति है कि राजरानी एक मेहतरका दर्शन करने आयी है, उस मार्गपर सच्चे दिलसे चलनेपर तो न-जाने कौनसा बड़ा फल मिल सकता है। फिर क्या था, उसने रानीको जवाब दे दिया और सच्चे दिलसे ईश्वर-भजन करके मुक्त हो गया। कुभावके साथ ईश्वर-मार्गपर चलनेमें भी कल्याण होनेका यह ज्वलन्त उदा- हरण है। [२३१] और मोहिं को है, काहि कहिहौं ? रंक-राज ज्यों मन को मनोरथ, केहि सुनाइ सुख लहिहौं ॥१॥ जम-जातना, जोनि-संकट सब सहे दुसह अरु सहिहौं । मो को अगम, सुगम तुम को प्रभु, तउ फल चारि न चहिहौं ॥२॥ खेलिबे को खग-मृग, तरु-किंकर ह्वै रावरो नाम हौं रहिहौं । यहि नाते नरकहुँ सचु, या बिनु परम-पदहुँ दुख दहिहौं ॥३॥ इतनी जिय लालसा दासके, कहत पानही गहिहौं । दीजै बचन कि हृदय आनिये 'तुलसीको पन निर्बहिहौं' ॥४॥ शब्दार्थ-सचु = सुख । परम पदहुँ = मोक्ष भी । पानही = पनही, जूता । भावार्थ-मेरे लिए और कौन है, किससे कहूँगा ? मेरा मनोरथ वैसे ही है जैसे गरीबकी राजा बननेकी इच्छा । सो यह मनोरथ किसे सुनाकर परमानन्द प्राप्त करूँगा ? ॥१॥ यम-यातना तथा अनेक योनियोंमें पैदा होनेका सब असह्य दुःख सह चुका हूँ और सहूँगा । किन्तु हे प्रभो ! यद्यपि मेरे लिए अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष इन चारों फलोंकी प्राप्ति दुर्लभ है और आपके लिए इनका दे डालना सहज है—तथापि मैं इन्हें कभी न चाहूँगा ॥२॥ मैं तो आपके खेलनेके लिए पक्षी, मृग, वृक्ष और नौकर होकर आपहीके नामसे रहना चाहता हूँ (अर्थात् मैं कुछ भी क्यों न रहूँ, पर कहाऊँ आपहीका) । इस नातेसे (आपका होकर) रहनेमें मुझे नरकमें भी सुखका अनुभव होगा; किन्तु यदि