भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

पृष्ठ 395, कुल 475 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 395

३८४ विनय-पत्रिका यह नाता न रहेगा तो मोक्ष-पद प्राप्त करनेपर भी मैं दुःखसे जलता रहूँगा ॥३॥ मैं आपकी जूती पकड़कर (छूकर) कहता हूँ कि इस दासके हृदयमें इतनी ही लालसा है। अब या तो आप यह बचन दे दीजिये, और या इसे अपने हृदयमें रखे रहिये कि 'मैं तुलसीका प्रण पूरा कर दूँगा' ॥४॥ विशेष १—'खेलिबे को......रहिहौं'—इसपर भक्तवर ललितकिशोरीजीकी भी सुन्दर रचना है ! 'जमुना पुलिन कुंज गहवर की, कोकिल ह्वै द्रुम कूक मचाऊँ । पद पंकज प्रिय लाल मधुप ह्वै, मधुरे मधुरे गुंज सुनाऊँ ॥ कूकर ह्वै बन बीथिन डोलों, बचे सीत रसिकन के पाऊँ । ललित किसोरी आस यही, ब्रज-रज तजि छिन अनत न जाऊँ ॥' २—'किंकर'—इसकी जगह कुछ प्रतियोंमें कंकर पाठ भी है। किन्तु अधिकांश प्रतियोंमें 'किंकर' होनेके कारण यही पाठ लिया गया है। 'कंकर' होनेपर कंकड़ अर्थ समझना चाहिये। [२३२] दीनबन्धु दूसरो कहँ पावौं ? को तुम बिनु पर-पीर पाइहै ? केहि दीनता सुनावौं ॥१॥ प्रभु अकृपालु, कृपालु अलायक, जहँ-जहँ चितहिं डोलावौं । रहै समुझि सुनि रहौं मौन ही, कहि भ्रम कहा गवावौं ॥२॥ गोपद बुड़िबे जोग करम करौं बातनि जलधि थहावौं । अति लालची, काम-किंकर मन, मुख रावरो कहावौं ॥३॥ तुलसी प्रभु जिय की जानत सब, अपनौ कछुक जनावौं । सो कीजै, जेहि भाँति छाँड़ि छल द्वार परो गुन गावौं ॥४॥ शब्दार्थ—मौन = चुप। गोपद = गोखुर। थहावों = थाह लगाता हूँ। किंकर = दास। परो = पड़े रहकर। भावार्थ—मैं (आपको छोड़कर) दूसरा दीनबन्धु कहाँ पाऊँगा ? मैं किसे अपनी दीनता सुनाऊँ ? आपके सिवा और कौन दूसरेके दुःखसे दुःखी

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस) · पृष्ठ 395, कुल 475 में से · BharatKosha