विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
३८४ विनय-पत्रिका यह नाता न रहेगा तो मोक्ष-पद प्राप्त करनेपर भी मैं दुःखसे जलता रहूँगा ॥३॥ मैं आपकी जूती पकड़कर (छूकर) कहता हूँ कि इस दासके हृदयमें इतनी ही लालसा है। अब या तो आप यह बचन दे दीजिये, और या इसे अपने हृदयमें रखे रहिये कि 'मैं तुलसीका प्रण पूरा कर दूँगा' ॥४॥ विशेष १—'खेलिबे को......रहिहौं'—इसपर भक्तवर ललितकिशोरीजीकी भी सुन्दर रचना है ! 'जमुना पुलिन कुंज गहवर की, कोकिल ह्वै द्रुम कूक मचाऊँ । पद पंकज प्रिय लाल मधुप ह्वै, मधुरे मधुरे गुंज सुनाऊँ ॥ कूकर ह्वै बन बीथिन डोलों, बचे सीत रसिकन के पाऊँ । ललित किसोरी आस यही, ब्रज-रज तजि छिन अनत न जाऊँ ॥' २—'किंकर'—इसकी जगह कुछ प्रतियोंमें कंकर पाठ भी है। किन्तु अधिकांश प्रतियोंमें 'किंकर' होनेके कारण यही पाठ लिया गया है। 'कंकर' होनेपर कंकड़ अर्थ समझना चाहिये। [२३२] दीनबन्धु दूसरो कहँ पावौं ? को तुम बिनु पर-पीर पाइहै ? केहि दीनता सुनावौं ॥१॥ प्रभु अकृपालु, कृपालु अलायक, जहँ-जहँ चितहिं डोलावौं । रहै समुझि सुनि रहौं मौन ही, कहि भ्रम कहा गवावौं ॥२॥ गोपद बुड़िबे जोग करम करौं बातनि जलधि थहावौं । अति लालची, काम-किंकर मन, मुख रावरो कहावौं ॥३॥ तुलसी प्रभु जिय की जानत सब, अपनौ कछुक जनावौं । सो कीजै, जेहि भाँति छाँड़ि छल द्वार परो गुन गावौं ॥४॥ शब्दार्थ—मौन = चुप। गोपद = गोखुर। थहावों = थाह लगाता हूँ। किंकर = दास। परो = पड़े रहकर। भावार्थ—मैं (आपको छोड़कर) दूसरा दीनबन्धु कहाँ पाऊँगा ? मैं किसे अपनी दीनता सुनाऊँ ? आपके सिवा और कौन दूसरेके दुःखसे दुःखी
विनय-पत्रिका ३८५ होगा ? ॥१॥ मैं जहाँ-जहाँ अपना चित्त दौड़ाता हूँ, सब स्वामी मुझे अकृपालु ही जान पड़ते हैं; और जो लोग कृपालु भी हैं, वे अयोग्य (असमर्थ) हैं। यही सुन और समझकर मैं मौन ही रहता हूँ, क्यों किसीसे कुछ कहकर अपना भरम खोऊँ ॥२॥ काम तो करता हूँ गोखुरके पानीमें (चुल्लूभर पानीमें) डूब मरनेका, और बातोंसे समुद्र थहाता हूँ। मेरा मन तो अत्यन्त लालची और कामुकताका दास है, पर मुखसे आपका (दास) कहलाता हूँ ॥३॥ हे प्रभो ! यद्यपि आप तुलसीके हृदयकी सब बात जानते हैं, तथापि मैं अपना कुछ हाल आपको जनाता हूँ। (मेरी यही लालसा है कि) आप ऐसा कीजिये, जिससे मैं छल छोड़कर आपके द्वारपर पड़ा आपहीके गुण गाता रहूँ ॥४॥ [२३३] मनोरथ मनको एकै भाँति । चाहत मुनि-मन-अगम सुकृत-फल, मनसा अघ न अघांति ॥१॥ करमभूमि कलि जनम, कुसंगति, मति बिमोह-मद-माति । करत कुजोग कोटि, क्यों पैयत परमारथ-पद साँति ॥२॥ सेइ साधु-गुरु, सुनि पुरान-स्रुति बूझ्यो राग बाजी ताँति । तुलसी प्रभु सुभाउ सुरतरु-सो, ज्यों दरपन मुख-काँति ॥३॥ शब्दार्थ - अघाति = तृप्ति । करमभूमि = भारतवर्ष साँति = शान्ति । ताँति = सारंगी । काँति = कान्ति, सौन्दर्य । भावार्थ- मनका मनोरथ भी एक ही तरहका है। मेरा मन ऐसे पुण्यका फल चाहता है जो मुनियोंके मनके लिए दुर्लभ है; किन्तु पाप करनेसे उसकी तृप्ति ही नहीं होती ॥१॥ इस कर्मभूमि भारतवर्षमें जन्म तो हुआ, पर कलियुगमें; कुसंगति, मोह-मदसे मतवाली बुद्धि एवं करोड़ों बुरे कर्म करनेके कारण परमपद और शान्ति कैसे मिल सकती है ? ॥२॥ साधु-महात्माओं तथा गुरुओंकी सेवा करने एवं वेद-पुराण सुननेसे सारंगी बजते ही रागका ज्ञान होनेकी तरह यह मालूम हो गया है कि तुलसीके प्रभु श्रीरामजीका स्वभाव कल्पवृक्षके समान तथा दर्पणमें मुखकी कान्ति या शोभाके सदृश है। भाव यह कि जिस प्रकार शीशेमें वैसा ही प्रतिबिम्ब दिखाई पड़ता है जैसा मुँहका आकार रहता है, उसी २५
३८६ विनय-पत्रिका प्रकार भगवान् मनोकामना पूर्ण करनेवाले कल्पवृक्ष तो अवश्य हैं, पर कल्पवृक्षके नीचे बैठनेपर मनोभावोंके अनुसार ही फल मिलेगा ॥३॥ [२३४] जनम गयो बादिहिं बर बीति । परमारथ पाले न पर्यो कछु, अनुदिन अधिक अनीति ॥१॥ खेलत खात लरिकपन गो चलि, जौबन जुवतिन लियो जीति । रोग-बियोग-सोग-श्रम-संकुल बड़ि बय वृथहि अतीति ॥२॥ राग-रोष-इरिषा-बिमोह-बस रुची न साधु समीति । कहे न सुने गुनगन रघुबर के, भइ न रामपद-प्रीति ॥३॥ हृदय दहत पछिताय-अनल अब, सुनत दुसह भवभीति । तुलसी प्रभु तें होइ सो कीजिय समुझि बिरदकी रीति ॥४॥ शब्दार्थ- बादिहिं = व्यर्थ ही । अनुदिन = प्रतिदिन । संकुल = परिपूर्ण । बय = अवस्था । समीति = समिति, सभा । भावार्थ- ऐसा उत्तम (मनुष्य) जन्म व्यर्थ ही बीत गया । परमार्थ तो कुछ भी पल्ले न पड़ा, उलटा नित्य-प्रति अनीति ही बढ़ती गयी ॥१॥ लड़कपन तो खेलने-खानेमें चला गया और यौवनको युवतियोंने जीत लिया। रोग, वियोग, शोक और परिश्रमसे परिपूर्ण बुढ़ापा भी व्यर्थ ही बीता जा रहा है ॥२॥ राग, क्रोध, ईर्ष्या और अज्ञानके वशीभूत होनेके कारण साधु-सभा नहीं रुची । न तो कभी रामजीकी गुणावली ही कही और सुनी, और न रामजीके चरणोंमें प्रेम ही हुआ ॥३॥ अब दुःसह संसार-भय सुनकर मेरा हृदय पश्चात्तापकी आगसे जल रहा है । अतः हे प्रभो ! इस तुलसीके लिए आप अपने बानेकी रीतिको समझ- कर जो कुछ हो सके, सो कीजिये ॥४॥ विशेष १—'खेलत......अतीति'—इसपर नीचे लिखा श्लोक याद आ जाता है— 'बाल्यं मया केलिकला-कलापकैर्नीतं च नारीनिरतेन यौवनम् । वृद्धोऽधुना किंनु करोति साधनं मुक्तेर्वृथा मे खलु जीवितं गतम् ॥' भगवान् शंकराचार्य भी कहते हैं—
विनय-पत्रिका ३८७ 'बालस्तावत्क्रीडासक्तस्तरुणस्तावत्तरुणीरक्तः । वृद्धस्तावच्चिन्तामग्नः पारे ब्रह्मणि कोऽपि न लग्नः ॥' [२३५] ऐसेहि जनम-समूह सिराने । प्राननाथ रघुनाथ-से प्रभु तजि सेवत चरन बिराने ॥१॥ जे जड़ जीव कुटिल, कायर, खल, केवल कलिमल-साने । सूखत बदन प्रसंसत तिन्ह कहँ, हरि तें अधिक करि माने ॥२॥ सुख हित कोटि उपाय निरन्तर करत न पायँ पिराने । सदा मलीन पन्थके जल ज्यों, कबहुँ न हृदय थिराने ॥३॥ यह दीनता दूर करिबेको अमित जतन उर आने । तुलसी चित-चिन्ता न मिटै बिनु चिन्तामनि पहिचाने ॥४॥ शब्दार्थ—बिराने = दूसरेके। मल = पाप। थिराने = स्थिर, स्वच्छ। अमित = अगणित। भावार्थ—ऐसे ही अनेक जन्म बीत गये। प्राणनाथ श्रीरघुनाथजीके समान स्वामीके चरणोंको छोड़कर दूसरोंके चरणोंकी सेवा करता रहा ॥१॥ जो मूर्ख जीव हैं, कुटिल, कायर, दुष्ट और केवल कलिके पापोंमें लिप्त हैं, उनकी प्रशंसा करते मुँह सूख गया और उन्हींको भगवान्से बड़ा माना ॥२॥ सुखके लिए निरन्तर करोड़ों उपाय करते-करते पैर भी नहीं दुखे। मेरा हृदय रास्तेके जलकी तरह सदा मैला ही बना रहा, कभी स्वच्छ न हुआ ॥३॥ यह दीनता दूर करनेके लिए मैंने अगणित उपाय सोचे, किन्तु तुलसीके चित्तकी चिन्ता, बिना चिन्तामणिको पहचाने (ईश्वर-ज्ञान हुए बिना) नहीं मिट सकती ॥४॥ [२३६] जो पै जिय जानकी-नाथ न जाने । तौ सब करम-धरम श्रमदायक ऐसेइ कहत सयाने ॥१॥ जे सुर, सिद्ध, मुनीस, जोगविद वेद-पुरान बखाने । पूजा लेत, देत पलटे सुख हानि-लाभ अनुमाने ॥२॥
३८८ विनय-पत्रिका काको नाम धोखेहू सुमिरत पातकपुंज पराने। बिप्र-बधिक, गज-गीध कोटि खल कौनके पेट समाने ॥३॥ मेरु-से दोष दूरि करि जनके, रेनु-से गुन उर आने । तुलसिदास तेहि सकल आस तजि भजहि न अजहुँ अयाने ॥४॥ शब्दार्थ—सयाने = चतुरोंने, ज्ञानियोंने। बखाने = वर्णन किया है। पराने = भाग गये। विप्र = ब्राह्मण, अजामिल। समाने = घुस गये। अयाने = मूर्ख। भावार्थ—रे जीव ! यदि तूने श्रीजानकीनाथको न जाना, तो तेरे सब कर्म, धर्म केवल परिश्रम ही देनेवाले हैं,—बुद्धिमान लोग ऐसा ही कहते हैं ॥१॥ वेदों और पुराणोंका कथन है कि जितने देवता, सिद्ध, बड़े-बड़े मुनि और योगके मर्मज्ञ हैं, वे सब पूजा लेकर उसके बदलेमें हानि-लाभका अनुमान करके सुख देते हैं, अर्थात् पहले वे पूजा लेते हैं, उसके बाद अपना लाभ देखकर कुछ देते हैं—यों ही नहीं ॥२॥ भला ऐसा कौन है जिसके नामका धोखेसे भी स्मरण करनेसे पाप-समूह भाग गया ? अजामिल, व्याध, गजेन्द्र और गीध (जटायु) आदि करोड़ों दुष्ट किसके पेटमें समा गये ? ॥३॥ जिस प्रभुने अपने भक्तोंके पर्वतके समान दोषोंको दूर करके (भुलाकर), रज-कणके समान गुणपर ध्यान दिया है, ऐ मूर्ख तुलसीदास ! उस स्वामीको तू सब आशा छोड़कर अब भी क्यों नहीं भजता ? ॥४॥ विशेष १—‘जो पै······जाने’—महाकवि केशवदासने भी कहा है कि राम- भक्तिके बिना सबपर धिक्कार है:— धिक मंगन बिन गुनहि, गुनहु धिक सुनत न रीझै । रीझ सु धिक बिन साँच, साँच धिक देत जु खीझै ॥ देबो धिक बिन मौज मौज धिक धरम न भावै । धरम सु धिक बिन दया, दया धिक अरि पहँ आवै ॥ अरिधिक चित्त न सालहीं, चित धिक जहँ न उदार मति । मतिधिक ‘केसव’ ज्ञान बिन, ज्ञानहु धिक बिन हरि भगति ॥
विनय-पत्रिका ३८९ गोस्वाम़ीजीने कवितावलीमें भी लिखा है— कलु कामसे रूप प्रताप दिनेससे सोमसे सील गनेससे माने । हरिचंदसे साँचे बड़े विधिसे मघवासे महीप विषै सुख साने । सुकसे मुनि सारदासे बकता चिर जीवन लोमसतें अधिकाने । तउ ऐसे भये तो कहा तुलसी जो पै राजिवलोचन राम न जाने ॥ २—'बिप'-अजामिल; ५७ पदके 'विशेष'में देखिये । ३—'बधिक'—व्याध, ९४ पदके विशेषमें देखिये । ४--'गज'-८३ पदके विशेषमें देखिये । ५—'गीध' -२१५ पदके विशेषमें देखिये । ६—'मेरुसे•••••आने'— श्रीरामजीके स्वभावका चित्र पृष्ठ संख्या १५२ में देखिये । 'सुनि सीतापत्ति-सीलसुभाउ' । [ २३७ ] काहे न रसना, रामहि गावहि ? निसिदिन पर-अपवाद वृथा कत रटि-रटि राग बढ़ावहि ॥१॥ नरमुख सुन्दर मन्दिर-पावन बसि जनि ताहि लजावहि । ससि समीप रहि त्यागि सुधा कत रविकर-जल कहँ धावहि ॥२॥ काम-कथा कलि-कैरव-चंदिनि, सुनत श्रवन दै भावहि । तिनहि हटकि कहि हरि-कल-कीरति, करन कलंक नसावहि ॥३॥ जातरूप मति, जुगुति रुचिर मनि रचि-रचि हार बनावहि । सरन-सुखद रविकुल-सरोज-रबि राम-नृपहि-पहिरावहि ॥४॥ बाद-विवाद, स्वाद तजि भजि हरि, सरस चरित चित लावहि । तुलसिदास भव तरहि, तिहूँ पुर तू पुनीत जस पावहि ॥५॥ शब्दार्थ—ससि = चन्द्रमा । कैरव = कुमुदिनी । भावहि = भाता है । हटकि = रोककर । करन = कर्ण, कान । जातरूप = सुवर्ण । भावार्थ—जीभ ! तू श्रीरामजीका गुण-गान क्यों नहीं करती ? क्यों रात- दिन दूसरोंकी निन्दा कर-करके व्यर्थ ही राग-द्वेष बढ़ा रही है ? ॥१॥ मनुष्यके मुखरूपी सुन्दर और पवित्र मन्दिरमें रहकर उसे लज्जित न कर । चन्द्रमाके पास
३९० विनय-पत्रिका रहनेपर भी अमृतको छोड़कर मृगजलके लिए क्यों दौड़ रही है ? (यहाँ सद्ग्रंथ ही चन्द्रमा हैं, ईश्वर-गुणानुवाद अमृत है और विषय-वार्ता ही मृगजल है) ॥२॥ काम-कथाएँ कलियुगरूपी कुमुदिनीके (विकसित करनेके) लिए चाँदनीके सदृश हैं, उन्हें कान लगाकर सुनना तुझे खूब भाता है। तू उन्हें (विषय-चर्चाको) रोककर भगवान्के सुन्दर यशका वर्णन करके कानोंका कलंक दूर कर ॥३॥ बुद्धिरूपी सुवर्ण और मुक्तिरूपी सुन्दर मणियोंको रच-रचकर हार बना, और उसे शरणागतोंको सुख देनेवाले रविकुल-कमल-दिवाकर महाराज रामचन्द्रजीको पहना ॥४॥ वाद-विवाद और स्वादको छोड़कर ईश्वर-भजन कर तथा उनके सरस चरित्रमें चित्त लगा; ताकि तुलसीदास संसार-सागरसे पार हो जाय और तुझे भी तीनों लोकमें पवित्र यश प्राप्त हो ॥५॥ विशेष १—‘भव तरहिं’—भवसागरसे पार होनेकी ही आकांक्षा सब भक्तोंकी दिखलाई पड़ती है। देखिये महात्मा सूरदास भी कहते हैं— अबके माधव ! मोहि उधारि । मगन हौं भव-अम्बुनिधि मैं कृपासिंधु मुरारि ! ॥ नीर अति गंभीर माया, लोभ लहरि तरंग । लिये जात अगाध जल मैं गहे ग्राह-अनंग ॥ मीन इन्द्रिय अतिहि काटत मोट-अघ सिर भार ! पग न इत उत धरन पावत उरझि मोह सेवार ॥ काम-क्रोध-समेत तृष्णा पवन अति झकझोर । नाहिं चितवन देत तिय सुत नाम-नौका-ओर ॥ थक्यो बीच बेहाल बिह्वल सुनहु करुना-मूल । स्याम ! भुज गहि काढ़ि डारहु ‘सूर’ ब्रजके कूल ॥ [ २३८ ] आपनो हित रावरे सों जो पै सूझै । तौ जनु तनुपर अछत सीस सुधि क्यों कबन्ध ज्यों जूझै ॥१॥
विनय-पत्रिका ३९१ निज अवगुन, गुन राम ! रावरे लखि-सुनि मति-मन रूझै। रहनि-कहनि-समुझनि तुलसीकी को कृपालु बिनु वूझै ॥२॥ शब्दार्थ-अछत = अक्षत, रहते हुए। कबन्ध = धड़, बिना सिरका शरीर, कबन्ध नामक राक्षस। जूझे = लड़े। रूझै = उलझ जाता है। भावार्थ-हे नाथ ! यदि यह सूझे कि इस जीवका हित आपमें (प्रीति करनेमें) है, तो यह जीव शरीरपर सिर रहते तथा सुध रहते, कबन्धकी तरह . क्यों लड़े ? (तात्पर्य यह कि यदि यह जीव ऐसा जानता कि रामके बिना कल्याण नहीं हो सकता तो दंडका भय रहते ऐसा निर्द्वन्द्व कभी न रहता जैसे वीर पुरुषका बिना मस्तकका शरीर सिर कटनेका भय न रहनेके कारण आवेश- में निर्भीक होकर लड़ता है।) ॥१॥ हे रामजी ! अपने दुर्गुण और आपके गुण देख-सुनकर मेरी बुद्धि और मन दोनों ही उलझ जाते हैं। अर्थात् जब अपने दुर्गुणोंको देखता हूँ तो मन मुड़ जाता है, और जब आपके कोमल चित्तका हाल सुनता हूँ, तो चरणारविन्दकी शरण लेनेकी इच्छा हो जाती है। हे कृपालु ! इस तुलसीकी रहन-सहन, कथन और समझको आपके बिना दूसरा कौन समझ सकता है ? ॥२॥ विशेष १-'कबन्ध'-महा बलवान् राक्षस था। इन्द्रके मारनेपर इसका मस्तक पेटमें चला गया था। फिर भी इसने बहुतसे वीरोंको मारा था। इसके सम्बन्धमें लिखा है- कबन्धाश्छिन्नशिरसः खड्गशक्त्यृष्टिपणयः । देवीमाहात्म्यम् । और भी लिखा है- नागानामयुतं तुरङ्गनियुतं सार्द्धं रथानां शतं पत्तीनां दशकोटयो निपतिता एकः कबन्धो रणे। तादृक्कोटि कबन्धनर्त्तनविधौ खेलञ्चलत् खे शिर- स्तेषां कोटिनिपातने रघुपतेः कोदण्डघण्टारवः ॥ इति प्राचीनाः ।
३१२ विनय-पत्रिका [ २३१ ] जाको हरि दृढ़ करि अंग करयो। सोइ सुसील, पुनीत, बेदबिद, विद्या-गुननि भरयो ॥१॥ उतपति पाण्डु-सुतनकी करनी सुनि सतपन्थ डर्यो। ते त्रैलोक्य-पूज्य, पावन जस, सुनि-सुनि लोक तर्यो ॥२॥ जो निज धरम बेद-बोधित सो करत न कछु बिसर्यो। बिनु अवगुन कृकलास कूप मज्जित कर गहि उधर्यो ॥३॥ ब्रह्म-बिसिख ब्रह्माण्ड-दहन-छम गर्भ न नृपति जरयो। अजर-अमर, कुलिसहुँ नाहिंन वध, सो पुनि फेन मर्यो ॥४॥ बिप्र अजामिल अरु सुरपति तें कहा जो नहिं बिगर्यो। उनको कियो सहाय बहुत, उर को सन्ताप हर्यो ॥५॥ गनिका अरु कन्दर्पर्ते जग महँ अघ न करत उबर्यो। तिनको चरित पवित्र जानि हरि निज हृदि-भवन धर्यो ॥६॥ केहि आचरन भलो मानें प्रभु सो तौ न जानि पर्यो। तुलसिदास रघुनाथ - कृपाको जोवत पन्थ खर्यो ॥७॥ शब्दार्थ-अंग करयो = अपना लिया। बेद-बोधित = वेद-विहित। कृकलास = गिर- गिट। बिसिख = बाण। छम = (क्षम) समर्थ। कन्दर्पर्ते = (कन्दर्प से) कामदेव से। उबरयो = बचा। खरयो = खड़ा है। भावार्थ- जिसे भगवान्ने दृढ़तापूर्वक अपना लिया, वही सुशील, पवित्र, वेदज्ञ हो गया तथा विद्या एवं गुणोंसे परिपूर्ण हो गया ॥१॥ पाण्डु-पुत्रोंकी उत्पत्ति और उनकी करनी सुनकर सन्मार्ग डर गया था; किन्तु (परमात्माकी कृपासे) वे ही पाण्डव त्रैलोक्य-पूज्य हो गये और उनकी पवित्र कीर्ति सुन-सुनकर संसार तर गया ॥२॥ जिस राजा नृगने वेद-विहित अपने धर्मका पालन करनेमें जरा भी भूल नहीं की, वह बिना दोषके ही गिरगिट बनकर कुएँमें जा पड़ा; किन्तु (जब) आपने उसका हाथ पकड़कर उद्धार कर दिया (तब उसका इतिहास अमर हो गया) ॥३॥ समूचे ब्रह्माण्डको भस्म कर डालनेमें समर्थ ब्रह्मास्त्रसे राजा परीक्षित गर्भमें नहीं जले; किन्तु जो अजर, अमर एवं वज्रसे भी न मरनेवाला था, वही
विनय-पत्रिका ३९३ (नमुचि नामक दैत्य देवासुर-संग्राममें) फेनसे मर गया ॥४॥ ब्राह्मण अजा- मिल और इन्द्रसे ऐसी कौनसी बात थी जो नहीं बिगड़ी थी ? (दोनोंने ही घोर पाप किये थे) किन्तु परमात्माने उन दोनोंकी बड़ी सहायता की, उनके हृदयका सन्ताप दूर कर दिया ॥५॥ गणिका और कामदेवसे, संसारमें कोई भी पाप करनेसे नहीं बचा था; किन्तु उनके चरित्रको पवित्र जानकर भगवान्ने उन्हें अपने हृदय-मन्दिरमें स्थान दिया ॥६॥ प्रभुजी किस आचरणसे प्रसन्न होते हैं, यह तो नहीं जान पड़ा; किन्तु तुलसीदास श्रीरघुनाथजीके अनुग्रहकी बाट जोहता खड़ा है ॥७॥
विशेष १—'उतपति······डरयो'—पाण्डवोंकी उत्पत्ति भिन्न-भिन्न देवताओंसे हुई थी । जैसे, धर्मराजसे युधिष्ठिरकी, पवनसे भीमकी, इन्द्रसे अर्जुनकी तथा अश्विनीकुमारसे नकुल और सहदेवकी उत्पत्ति हुई थी । वे जुआ खेलकर सर्वस्व हार गये, यहाँतक कि द्रौपदीको भी दाँवपर रखकर खो बैठे थे; अथवा पाँचों भाइयोंने मिलकर द्रौपदीको भार्या बनाया । यही सब उनकी करनी थी । २—'जो निज······कर गहि उधस्यो'—२१३ पदके विशेषमें देखिये । ३—'गर्भ न नृपति जस्यो'—अश्वत्थामाने पाण्डवोंका निर्वंश करनेके इरादेसे परीक्षितको गर्भमें ही मार डालनेके लिए ब्रह्मास्त्रका प्रयोग किया था । किन्तु कृष्ण भगवान्ने चक्र-सुदर्शनके द्वारा गर्भस्थ शिशु परीक्षितकी रक्षा की थी । ४—'फेन मर्यो'—नमुचि दैत्यने तपस्या करके ब्रह्मासे वर प्राप्त किया था कि 'न तो मैं किसी अस्त्र-शस्त्रसे मारा जाऊँ और न शुष्क या आर्द्र पदार्थसे ही मरूँ ।' देवासुर-संग्राममें इसने घोर उपद्रव किया । इन्द्रने क्रुद्ध होकर इसे मारनेके लिए वज्रका प्रयोग किया, पर उससे भी इसका बाल बाँका न हुआ । अन्तमें आकाशवाणी हुई कि 'यह दैत्य अस्त्र-शस्त्रसे नहीं मर सकता, इसे समुद्रके फेनसे मारो ।' क्योंकि फेन न तो शुष्क है और न आर्द्र । फिर क्या था, नमुचि दैत्य समुद्रके फेनसे ही मारा गया । ५—'बिप्र अजामिल'—५७ पदके विशेषमें देखिये ।
३९४ विनय-पत्रिका ६—‘सुरपति’—इन्द्रके नाना प्रकारके घोर पापोंकी कथाएँ पुराणोंमें लिखी हुई हैं। यथा—इन्द्रने मदान्ध होकर ऋषि-पत्नी अहल्याके साथ प्रसङ्ग किया था आदि। ७—‘गनिका’—९४ पदके विशेषमें देखिये। ८—‘कन्दर्प’—कृष्णभगवान्के पुत्र प्रद्युम्न कामदेवके अवतार थे। ९—इसी भावका पद सूरदासका भी देखिये:— जाको मनमोहन अङ्ग कस्यो। ताको केस खस्यो नहिं सिर तें, जो जग बैर पर्यो ॥ हिरनकसिपु परिहारि थक्यो प्रहलाद न नेकु डर्यो। अजहूँ तौ उत्तानपाद-सुत राज करत न मर्यो॥ राखी लाज द्रुपद-तनया की कोपित चीर हर्यो। दूरजोधनको मान भंग करि बसन प्रवाह भर्यो ॥ विप्र भक्त नृग अन्धकूप दिप बलि पढ़ि वेद छर्यो। दीनदयालु कृपानिधि की गति कापै कह्यो पर्यो ॥ जा सुरपति कोप्यो ब्रज उपर कहिधौं कछु न सर्यो। राखे ब्रजजन नंदके लाला गिरिधर विरद धर्यो ॥ जाको विरद है गर्व प्रहारी सो कैसे बिसर्यो। सूरदास भगवन्त भजन करि सरन गहे उधर्यो ॥ महात्मा सूरदास। [२४०] सोइ सुकृती, सुचि साँचो जाहि राम! तुम रीझे। गनिका, गीध, बधिक हरिपुर गये, लै करसी प्रयाग कब सीझे ॥१॥ कबहुँ न डिग्यो निगम-मग तें पग, नृग जग जानि जिते दुख पाये। गजधौं कौन दिछित, जाके सुमिरत लै सुनाम बाहन तजि धाये ॥२॥
सुर-मुनि बिप्र बिहाय बड़े कुल, गोकुल जनम गोपगृह लीन्हो। बायौं दियो विभव कुरुपतिको, भोजन जाइ विदुर-घर कीन्हो ॥३॥ मानत भलहि भलो भगतनि तें, कछुक रीति पारथहि जनाई। तुलसी सहज सनेह राम बस, और सबै जलकी चिकनाई ॥४॥ शब्दार्थ—निगम = वेद। दिक्षित = दीक्षित। सुनाभ = चक्र। कुरुपति = दुर्योधन। पारथहि = अर्जुनको। भावार्थ—हे रामजी ! जिसपर आप रीझ गये, वही सच्चा पुण्यात्मा और पवित्र है। गणिका, गीध और व्याध जो वैकुण्ठमें गये, वे कब प्रयागमें कण्डेकी (आग) से सीझे थे ? (अर्थात् उन लोगोंने कब तीर्थराज प्रयागमें कल्पवास किया था ?) ॥१॥ राजा नृगका पैर वेद-मार्गसे कभी नहीं डिगा था; किन्तु उन्हें जितना कष्ट भोगना पड़ा, उसे संसार जानता है। गजेन्द्र ही कौनसा दीक्षित हुआ था जिसके स्मरण करते ही आप गरुड़की सवारी छोड़कर (पैदल ही) चक्र सुदर्शन लेकर दौड़े थे ? ॥२॥ देवता, मुनि, ब्राह्मण आदि उच्च कुलोंको छोड़कर आपने गोकुलमें एक गोपके घरमें जन्म लिया। आपने महाराज दुर्योधनके वैभवको ठुकराकर विदुरके घर जाकर भोजन किया ॥३॥ आप अपने अनन्य भक्तोंकी भलाई करना ही अच्छा समझते हैं, आपने यह रीति कुछ-कुछ अर्जुनको बतायी थी। तुलसीदास कहते हैं कि श्रीरामजी स्वाभाविक स्नेहके अधीन हैं और सब साधन जलकी चिकनाईके समान हैं। भाव यह है कि पानी पड़ते ही थोड़ी देरके लिए तो शरीर चिकना हो जाता है, पर कुछ ही देरमें पानी सूख जानेके बाद रूखा हो जाता है। इसी प्रकार अन्य साधनों द्वारा क्षणिक सुख- शान्ति मिलती है, किन्तु जरा भी कामना-रूपी हवाके लगते ही वह सुख-शान्ति हवा हो जाती है ॥४॥ विशेष १—'गनिका'—९४ पदके विशेषमें देखिये।
३९६ विनय-पत्रिका २—'गीध'—२१५ पदके विशेषमें देखिये। ३—'बधिक'—व्याध; ९४ पदके विशेषमें देखिये। ४—'करसी'—कुछ प्रतियोंमें 'कासी' पाठ भी है। यह होनेसे इस प्रकार अर्थ होगा—गणिका, गिद्ध, व्याधको बैकुण्ठमें तो ले गये, पर इन लोगोंने काशी और प्रयागमें कब तपस्या की थी ? ५—'नृग'—२१३ पदके विशेषमें देखिये। ६—'गज'—८३ पदके विशेषमें देखिये। इसी चरणके आशयका एक पद यह भी है— हे गोविन्द राखु सरन अब तो जीवन हारे। नीर पिवन हेतु गयो सिन्धुके किनारे॥ सिन्धु बीच बसत ग्राह चरन गहि पछारे। लड़त लड़त साँझ भई ले गयो मँझधारे॥ नासिका लौं बूडन लाग्यो कृष्णको पुकारे। द्वारिकामें शब्द भयो गरुड़ छोड़ि धाये॥ ग्राहको तो मारिकै गजराजको उबारे। सूरश्याम मगन भये नन्दके दुलारे॥ मेरो तेरो न्याय होय धर्मराजके दुआरे। ७—'बायौँ.....कीन्हो'—एक बार अभिमानी दुर्योधनने भगवान्को आमन्त्रित किया। अन्तर्यामी कृष्णजी उसका कपट-भाव जानकर उसके यहाँ नहीं गये बल्कि विदुरके घर गये। उन्होंने विदुरकी स्त्रीसे भोजन माँगा। विदुर- की स्त्री थोड़ा साग, कुछ केले ले आयी और प्रेमानन्दमें विभोर हो जानेके कारण केलेके छिलके उतारकर भगवान्को देने लगी तथा खानेवाला पदार्थ गूदा ज़मीनपर फेंकने लगी। भगवान् बड़े प्रेमके साथ उन छिलकोंको खाने लगे। उसी समय विदुर भी वहाँ आ गये। उन्होंने अपनी स्त्रीका कार्य देखकर बड़ा क्रोध किया और उसका हाथ पकड़कर वहाँसे उठा दिया। पश्चात् उन्होंने अपने हाथसे एक केला छीलकर सार पदार्थ भगवान्को दिया। भावके भूखे
भगवान्ने उसे खाकर कहा, जो माधुर्य उन छिलकोंमें था, वह इसमें नहीं है; अतः मैं न खाऊँगा। इसी भावपर सूरदासजीने भी लिखा है— 'दुर्योधन-घर मेवा त्याग्यो, साग विदुर घर खायो'
२४१ ] तब तुम मोहूँसे सठनि कौ हठि गति न देते' । कैसेहु नाम लेइ कोउ पामर, सुनि सादर आगे है लेते ॥१॥ पाप-खानि जिय जानि अजामिल, जमगन तमकि तये ताको भेते । लियो छुड़ाइ, चले कर माँजत, पीसत दाँत गये रिस-रेते ॥२॥ गौतम-तिय, गज, गीध, विटप, कपि, हैं नाथहिं नीके मालुम जेते । तिन्ह-तिन्ह काजनि साधु-सभा २ तजि कृपासिंधु तब-तब उठिगे ते।३। अजहुँ अधिक आदर येहि द्वारे, पतित पुनीत होत नहिं केते । मेरे पासंगहु न पूजिहैं, है गये, हैं, होने खल जेते ॥४॥ हौं अब लौं करतूति तिहारिय चितवत हुतो न रावरे चेतै । अब तुलसी पतरौ बाँधिहै, सहि न जात मोपै परिहास एते ॥५॥
शब्दार्थ—पामर = पापी । तमकि = तमककर । तये = लाल हो उठे । रिस-रेते = क्रोधसे भरे हुए, क्रोधित । उठिगे ते = उठकर गये थे । हुतो = था । चेते = ध्यान दिया ।
भावार्थ—तब आप मुझ जैसे दुष्टोंको जबरदस्ती मोक्ष न देते । कोई पापी किसी प्रकार भी आपका नाम क्यों न ले, सुनते ही आप आदरके साथ उसे आगे होकर (बढ़कर) लेते हैं ॥१॥ यमराजके दूतोंने अपने जीमें अजामिलको पापोंकी खानि समझकर उसे डाँटा-फटकारा और (क्रोधसे) लाल हो उठे; किन्तु आपने उसे (उनके हाथसे) छुड़ा लिया । (वे यमदूत बेचारे) क्रोधित होकर हाथ मलते हुए और दाँत पीसते हुए चले गये ॥२॥ गौतमको स्त्री (अहिल्या), गजेन्द्र, गीध (जटायु), वृक्ष (यमलार्जुन), बन्दर तथा इस प्रकारके जो जो आपको प्रिय हैं, उन्हें (सब लोग) जानते हैं। उन सबका जब-जब काम पड़ा था, तब-तब आप साधुसमाजको छोड़कर उठकर चले गये थे ॥३॥ इस दरवाजे-
१. पाठान्तर 'तौ तुम मोहूसे सठनिको हठि गति देते ।' २. 'तिन्हके काज साधु-समाज ।'
३१८ विनय-पत्रिका पर अब भी पापियोंका आदर है। (मैं आपसे पूछता हूँ कि) यहाँ कितने पापी पवित्र नहीं होते ? किन्तु संसारमें जितने खल या पापी हो चुके हैं, हैं, और होंगे, वे सब मेरे पासंगमें भी नहीं पूजेंगे ॥४॥ अबतक मैं आपकी करतूत देख रहा था (कि देखूँ आप मुझे कब शरणमें लेते हैं), पर आपने मेरी ओर ध्यान नहीं दिया। इसलिए अब यह तुलसीदास (आपके नामका) पुतला बाँधेगा; क्योंकि मुझसे इतनी हँसी सहन नहीं हो सकती ॥५॥ विशेष १—इस पदमें गोस्वामीके रूठनेका बड़ा ही सुन्दर चित्र है। प्रारम्भमें जो 'तब' शब्द आया है, वह बड़ा ही अपूर्व है। कविका आशय यह है कि यदि आपको मुझे तारना स्वीकार नहीं था, तो फिर मेरे समान अन्यान्य दुष्टोंको भी न तारे होते। इसमें कविने रूठकर भगवान्को उलाहना दिया है। यहाँ 'तब' शब्द काल-वाचक नहीं है। कविने इस 'तब'का मेल 'अब'के साथ मिलाया है; 'अब तुलसी पूतरो बाँधिहै।' खूब ! इस पदमें रूठनेका भाव है, उलाहना है, स्वामीकी दयालुता है और अन्तमें है धमकी। इस पदको मननपूर्वक पढ़नेसे ही पाठकगण इसका ठीक-ठीक रसास्वादन कर सकेंगे। २—'अजामिल'—५७ पदके विशेषमें देखिये। ३—'गौतम-तिय'—४३ पदके विशेषमें देखिये। ४—'गज'—८३ पदके विशेषमें देखिये। ५—'गीध'—२१५ पदके विशेषमें देखिये। ६—'बिटप', यमलार्जुन;—७८ पदके विशेषमें देखिये। ७—'हौं अब लौं करतूति तिहारिय'—इस पंक्तिमें कविका स्वाभिमान-पूर्ण कथन है। वास्तवमें भक्तको सब-कुछ कहनेका अधिकार है। देखिये न, एक कविने तो यहाँतक कह डाला है— तुम करतार जगरच्छाके करनहार पूरत मनोरथ हौ सब चित चाहे के। यह जिय जानि 'सेनापति' हू सरन आयो हूजिये दयालु ताप मेटो दुख दाहे के ॥ जो यौं कहौ तेरे हैं रे करम अनैंसे हम गाहक हैं सुकृति भगति रस लाहे के। आपने करम करि उतरौंगो पार तौ पै हम करतार करतार तुम काहे के ? ॥
विनय-पत्रिका ३९९ ८—'पूतरो बाँधिहै'—खेल दिखानेके बाद नट कपड़ेका बनाया हुआ पुतला बाँसपर लटकाकर चारों ओर घुमाता है और कहता फिरता है कि देखो यह सूम है। इससे पैसा न देनेवाले सूम उसे कुछ-न-कुछ दे देते हैं। इसी प्रकार मैं भी पुतला बाँधकर कहता फिरूँगा कि यह सूमराज रामचन्द्रजी हैं। [ २४२ ] तुम सम दीनबंधु, न दीन कोउ मो सम, सुनहु नृपति रघुराई। मो सम कुटिल-मौलिमनि नहिं जग, तुम सम हरि ! न हरन कुटिलाई ॥१॥ हौं मन बचन-करम पातक-रत, तुम कृपालु पतितन-गति दाई। हौं अनाथ, प्रभु ! तुम अनाथ-हित, चित यहि सुरति कबहुँ नहिं जाई ॥२॥ हौं आरत, आरति-नासक तुम, कीरति निगम-पुराननि गाई। हौं सभीत तुम हरन सकल भय, कारन कवन कृपा बिसराई ॥३॥ तुम सुखधाम राम श्रम-भंजन, हौं अति दुखित त्रिबिध श्रम पाई। यह जिय जानि दास तुलसी कहँ, राखहु सरन समुझि प्रभुताई ॥४॥ शब्दार्थ—मौलिमनि = शिरोमणि । सुरभि = सुध । आरति = दुःख । स्रम = श्रम, त्रिविध श्रम, दैहिक, दैविक और भौतिक । भावार्थ—हे रामजी, सुनिये ! आपके समान दीनबन्धु और मेरे समान दीन दूसरा कोई नहीं है। हे प्रभो ! न तो संसारमें मेरे समान कोई दुष्ट-शिरोमणि है, और न आपके समान कोई दुष्टताका हरण करनेवाला है ॥१॥ मैं मन, वचन और कर्मसे पाप-रत हूँ, और आप कृपालु हैं, पापियोंको सद्गति देनेवाले
४०० विनय-पत्रिका हैं। हे प्रभो ! मेरे चित्तसे इस बातका ध्यान कभी नहीं जा सकता कि मैं अनाथ हूँ और आप अनाथोंका हित करनेवाले हैं ॥२॥ मैं दुखी हूँ, और आप दुःख- भंजन हैं। आपका यह यश वेदों और पुराणोंने गाया है। मैं भयभीत हूँ, और आप सब भयको हरनेवाले हैं। फिर क्या कारण है कि आप मुझपर कृपा करना भूल गये हैं ? ॥३॥ हे रामजी ! आप आनन्द-राशि तथा श्रमके नाश करनेवाले हैं, और मैं दुःखित हूँ तथा तीनों प्रकारका दैहिक, दैविक, भौतिक श्रम पा चुका हूँ। तात्पर्य यह कि आप सुख-धाम हैं, और मैं दुःखित हूँ—अतः मुझे सुख दीजिये। आप श्रम-भंजन हैं और मैं दैहिक, दैविक, भौतिक तीनों प्रकारके श्रमसे श्रमित हूँ—अतः मेरा श्रम दूर कीजिये। यह सब अपने दिलमें विचारकर तथा अपनी प्रभुताको समझकर इस तुलसीदासको अपनी शरणमें रख लीजिये ॥४॥ [ २४३ ] इहै जानि चरनन्हि चित लायो। नाहिन नाथ ! अकारन को हितु, तुम समान पुरान-श्रुति गायो ॥१॥ जननि-जनक, सुत-दार, बंधु जन, भये बहुत जहँ-जहँ हौं जायो। सब स्वारथहित प्रीति, कपट चित, काहू नहिं हरि भजन सिखायो ॥२॥ सुर-मुनि, मनुज-दनुज अहि-किन्नर, मैं तनु धरि सिर काहि न नायो। जरत फिरत त्रय ताप पाप बस, काहु न हरि ! करि कृपा जुड़ायो ॥३॥ जतन अनेक किये सुख-कारन, हरिपद-विमुख सदा दुख पायो। अब थाक्यो जलहीन नाव ज्यों, देखत बिपति-जाल जग छायो ॥४॥
मों कहँ नाथ ! बूझिये, यह गति, सुख-निधान निज पति बिसरायो । अब तजि रोष करहु करुना हरि ! तुलसिदास सरनागत आयो ॥५॥ शब्दार्थ—जनक = पिता । सुत = पुत्र । दार = स्त्री । अहि = सर्प । जुड़ायो = ठण्डा किया; शीतल किया । बूझिये = खबर लीजिये । भावार्थ—हे नाथ ! यही समझकर मैंने आपके चरणोंमें चित्त लगाया कि वेदों और पुराणोंके कथनानुसार आपके समान अकारण ही हित करनेवाला दूसरा कोई नहीं है ॥१॥ मैं जहाँ-जहाँ पैदा हुआ, (सब मिलाकर) मेरे बहुतसे पिता, माता, पुत्र, स्त्री, भाई और स्वजन हुए; किन्तु सबका प्रेम स्वार्थवश था और सभी कपटी हृदयके थे; क्योंकि किसीने भी मुझे भगवद्भजन करनेका उप- देश नहीं दिया ॥२॥ मैंने शरीर धारण करके देवता, मुनि, मनुष्य, राक्षस, सर्प, किन्नर आदि किसके आगे सिर नहीं झुकाया ? हे हरे ! मैं अपने पापोंके कारण तीनों पापोंसे जलता फिरा, पर किसीने भी कृपा करके मुझे शीतल नहीं किया ॥३॥ सुखके लिए मैंने अनेक यत्न किये, किन्तु भगवच्चरणारविन्दोंसे विमुख रहनेके कारण मुझे सदैव दुःख ही मिला। संसारमें विपत्तियोंका जाल छाया हुआ देखकर अब मैं (समस्त साधनोंसे) उसी प्रकार थक गया हूँ जैसे पानीमें न रहनेके कारण नौका (अचल हो जाती है) ॥४॥ हे नाथ ! मेरी खबर लीजिये। मैंने अपने आनन्द-निधान स्वामीको भुला दिया, इसीसे मेरी यह दशा हो रही है। हे प्रभो ! अब आप क्रोधको छोड़कर शरणागत तुलसीदास- पर दया कीजिये; क्योंकि (अब तो) यह दास आपकी शरणमें आ गया ॥५॥ [ २४४ ] याहि ते मैं हरि ग्यान गँवायो । परिहरि हृदय-कमल रघुनाथहि, बाहर फिरत विकल भयो धायो ॥१। ज्यों कुरंग निज अंग रुचिर मद अति मतिहीन मरम नहिं पायो । खोजत गिरि, तरु, लता, भूमि, बिल परम सुगंध कहाँ तें आयो ॥२॥ २६
४०२ विनय-पत्रिका ज्यों सर विमल बारि परिपूरन, ऊपर कछु सिवार तृन छायो। जारत हियो ताहि तजि हौं सठ, चाहत यहि बिधि तृषा बुझायो ॥३॥ ब्यापत त्रिविध ताप तनु दारुन, तापर दुसह दरिद्र सतायो । अपनेहि धाम नाम-सुरतरु तजि विषय-बबूर-बाग मन लायो ॥४॥ तुम-सम ग्यान-निधान, मोहिं सम मूढ़ न आन पुराननि गायो । तुलसिदास प्रभु ! यह विचारि जिय कीजै नाथ उचित मन भायो ॥५॥ शब्दार्थ—कुरंग = हरिन । मद = यहाँ 'मद' शब्द कस्तूरीके लिए आया है । मरम = भेद, हाल । वारि = जल । भावार्थ—हे हरे ! मैं इसीलिए ज्ञानसे हाथ धो बैठा कि अपने हृदय-कमल- में स्थित रघुनाथजीको छोड़कर व्याकुल हुआ बाहर-बाहर दौड़ता फिरा ॥१॥ (किस प्रकार दौड़ता फिरा ?) जैसे अत्यन्त बुद्धिहीन मृग अपने अंगके सुन्दर मद-(कस्तूरी) का मर्म नहीं समझ पाता और पर्वत, वृक्ष, लता, पृथिवी, बिल आदिमें ढूँढ़ता फिरता है कि इतनी अधिक सुगन्ध कहाँसे आ रही है ॥२॥ (अथवा) जैसे निर्मल जलसे परिपूर्ण तालाबमें (पानीके) ऊपर सिवार और तृण छाया हुआ है (किन्तु न जाननेके कारण) उस तालाबके स्वच्छ जलको छोड़कर मैं दुष्ट अपना हृदय जला रहा हूँ और इस प्रकार अपनी प्यास बुझाना चाहता हूँ । (भाव यह कि हृदय-सरोवरमें परमात्मारूपी निर्मल जल भरा हुआ है, परन्तु अज्ञानका पर्दा पड़ा रहनेके कारण मैं आत्मानन्दसे प्यास न बुझाकर मृगजलरूपी सांसारिक भोगोंसे तृष्णाको मिटाना चाहता हूँ; परिणाम यह हो रहा है कि त्रितापसे जल रहा हूँ) ॥३॥ एक तो शरीरमें असह्य त्रिविध ताप व्याप रहे हैं, तिसपर दुस्सह दरिद्रता सता रही है। मैं अपने घरमें (शरीरमें स्थित) राम- नामरूपी कल्पवृक्षको छोड़कर विषयरूपी बबूरके बागमें मन लगा रहा हूँ ॥४॥ आपके समान ज्ञानका भण्डार और मेरे समान मूढ़ दूसरा कोई नहीं है, यह बात पुराणोंने कही है। अतः हे तुलसीदासके प्रभु रामजी ! इसपर आप अपने हृदयमें विचार करके जो अच्छा लगे, वही कीजिये ॥५॥ विशेष १—'ज्यों कुरङ्ग......आयो'—जब हरिनके अण्डकोषमें कस्तूरी पैदा हो
विनय-पत्रिका ४०३ जाती है, तो उसकी सुगन्ध बहुत दूरतक उड़ने लगती है। किन्तु उस हरिन- को यह बात नहीं मालूम होती कि सुगन्ध उसीके शरीरसे निकल रही है। परिणाम यह होता है कि वह हरिन उस सुगन्धकी तलाशमें चारों ओर दौड़ता फिरता है। [ २४५ ] मोहिं मूढ़ मन बहुत बिगोयो। याके लिये सुनहु करुनामय, मैं जग जनमि-जनमि दुख रोयो ॥१॥ सीतल मधुर पियूष सहज सुख निकटहिं रहत दूरि जनु खोयो। बहु भाँतिन श्रम करत मोह बस, बृथहि मंदमति वारि विलोयो ॥२॥ करम-कीच जिय जानि, सानि चित, चाहत कुटिल मलहि मल धोयो। तृषावंत सुरसरि विहाय सठ, फिरि-फिरि विकल अकास निचोयो ॥३॥ तुलसिदास प्रभु ! कृपा करहु अब, मैं निज दोष कछू नहिं गोयो। डासत ही गइ बीति निसा सब, कवहूँ न नाथ ! नींद भरि सोयो ॥४॥ शब्दार्थ—विगोयो = बिगाड़ा, सत्यानाश किया। पियूष = अमृत। सहज सुख = परमानन्द। बिलोयो = मंथन किया। निचोयो = निचोड़ना, दुहना। डासत = बिछौना बिछाते। भावार्थ—इस मूर्ख मनने मुझे खूब सत्यानाश किया। हे करुणामय ! सुनिये, इसके लिए मैं संसारमें जन्म ले-लेकर दुःखड़ा रोता रहा ॥१॥ शीतल और मधुर अमृतवत् परमानन्दके निकट रहते हुए भी मैंने मानो उसे बहुत दूर खो दिया। मोहवश नाना प्रकारका श्रम करके व्यर्थ ही मुझ मूढ़ बुद्धिने जल- मंथन किया (विषयरूपी जलको मथकर परमानन्दरूपी घी निकालना चाहा)