भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 397

३८६ विनय-पत्रिका प्रकार भगवान् मनोकामना पूर्ण करनेवाले कल्पवृक्ष तो अवश्य हैं, पर कल्पवृक्षके नीचे बैठनेपर मनोभावोंके अनुसार ही फल मिलेगा ॥३॥ [२३४] जनम गयो बादिहिं बर बीति । परमारथ पाले न पर्‍यो कछु, अनुदिन अधिक अनीति ॥१॥ खेलत खात लरिकपन गो चलि, जौबन जुवतिन लियो जीति । रोग-बियोग-सोग-श्रम-संकुल बड़ि बय वृथहि अतीति ॥२॥ राग-रोष-इरिषा-बिमोह-बस रुची न साधु समीति । कहे न सुने गुनगन रघुबर के, भइ न रामपद-प्रीति ॥३॥ हृदय दहत पछिताय-अनल अब, सुनत दुसह भवभीति । तुलसी प्रभु तें होइ सो कीजिय समुझि बिरदकी रीति ॥४॥ शब्दार्थ- बादिहिं = व्यर्थ ही । अनुदिन = प्रतिदिन । संकुल = परिपूर्ण । बय = अवस्था । समीति = समिति, सभा । भावार्थ- ऐसा उत्तम (मनुष्य) जन्म व्यर्थ ही बीत गया । परमार्थ तो कुछ भी पल्ले न पड़ा, उलटा नित्य-प्रति अनीति ही बढ़ती गयी ॥१॥ लड़कपन तो खेलने-खानेमें चला गया और यौवनको युवतियोंने जीत लिया। रोग, वियोग, शोक और परिश्रमसे परिपूर्ण बुढ़ापा भी व्यर्थ ही बीता जा रहा है ॥२॥ राग, क्रोध, ईर्ष्या और अज्ञानके वशीभूत होनेके कारण साधु-सभा नहीं रुची । न तो कभी रामजीकी गुणावली ही कही और सुनी, और न रामजीके चरणोंमें प्रेम ही हुआ ॥३॥ अब दुःसह संसार-भय सुनकर मेरा हृदय पश्चात्तापकी आगसे जल रहा है । अतः हे प्रभो ! इस तुलसीके लिए आप अपने बानेकी रीतिको समझ- कर जो कुछ हो सके, सो कीजिये ॥४॥ विशेष १—'खेलत......अतीति'—इसपर नीचे लिखा श्लोक याद आ जाता है— 'बाल्यं मया केलिकला-कलापकैर्नीतं च नारीनिरतेन यौवनम् । वृद्धोऽधुना किंनु करोति साधनं मुक्तेर्वृथा मे खलु जीवितं गतम् ॥' भगवान् शंकराचार्य भी कहते हैं—