विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ३८७ 'बालस्तावत्क्रीडासक्तस्तरुणस्तावत्तरुणीरक्तः । वृद्धस्तावच्चिन्तामग्नः पारे ब्रह्मणि कोऽपि न लग्नः ॥' [२३५] ऐसेहि जनम-समूह सिराने । प्राननाथ रघुनाथ-से प्रभु तजि सेवत चरन बिराने ॥१॥ जे जड़ जीव कुटिल, कायर, खल, केवल कलिमल-साने । सूखत बदन प्रसंसत तिन्ह कहँ, हरि तें अधिक करि माने ॥२॥ सुख हित कोटि उपाय निरन्तर करत न पायँ पिराने । सदा मलीन पन्थके जल ज्यों, कबहुँ न हृदय थिराने ॥३॥ यह दीनता दूर करिबेको अमित जतन उर आने । तुलसी चित-चिन्ता न मिटै बिनु चिन्तामनि पहिचाने ॥४॥ शब्दार्थ—बिराने = दूसरेके। मल = पाप। थिराने = स्थिर, स्वच्छ। अमित = अगणित। भावार्थ—ऐसे ही अनेक जन्म बीत गये। प्राणनाथ श्रीरघुनाथजीके समान स्वामीके चरणोंको छोड़कर दूसरोंके चरणोंकी सेवा करता रहा ॥१॥ जो मूर्ख जीव हैं, कुटिल, कायर, दुष्ट और केवल कलिके पापोंमें लिप्त हैं, उनकी प्रशंसा करते मुँह सूख गया और उन्हींको भगवान्से बड़ा माना ॥२॥ सुखके लिए निरन्तर करोड़ों उपाय करते-करते पैर भी नहीं दुखे। मेरा हृदय रास्तेके जलकी तरह सदा मैला ही बना रहा, कभी स्वच्छ न हुआ ॥३॥ यह दीनता दूर करनेके लिए मैंने अगणित उपाय सोचे, किन्तु तुलसीके चित्तकी चिन्ता, बिना चिन्तामणिको पहचाने (ईश्वर-ज्ञान हुए बिना) नहीं मिट सकती ॥४॥ [२३६] जो पै जिय जानकी-नाथ न जाने । तौ सब करम-धरम श्रमदायक ऐसेइ कहत सयाने ॥१॥ जे सुर, सिद्ध, मुनीस, जोगविद वेद-पुरान बखाने । पूजा लेत, देत पलटे सुख हानि-लाभ अनुमाने ॥२॥