विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८८ विनय-पत्रिका काको नाम धोखेहू सुमिरत पातकपुंज पराने। बिप्र-बधिक, गज-गीध कोटि खल कौनके पेट समाने ॥३॥ मेरु-से दोष दूरि करि जनके, रेनु-से गुन उर आने । तुलसिदास तेहि सकल आस तजि भजहि न अजहुँ अयाने ॥४॥ शब्दार्थ—सयाने = चतुरोंने, ज्ञानियोंने। बखाने = वर्णन किया है। पराने = भाग गये। विप्र = ब्राह्मण, अजामिल। समाने = घुस गये। अयाने = मूर्ख। भावार्थ—रे जीव ! यदि तूने श्रीजानकीनाथको न जाना, तो तेरे सब कर्म, धर्म केवल परिश्रम ही देनेवाले हैं,—बुद्धिमान लोग ऐसा ही कहते हैं ॥१॥ वेदों और पुराणोंका कथन है कि जितने देवता, सिद्ध, बड़े-बड़े मुनि और योगके मर्मज्ञ हैं, वे सब पूजा लेकर उसके बदलेमें हानि-लाभका अनुमान करके सुख देते हैं, अर्थात् पहले वे पूजा लेते हैं, उसके बाद अपना लाभ देखकर कुछ देते हैं—यों ही नहीं ॥२॥ भला ऐसा कौन है जिसके नामका धोखेसे भी स्मरण करनेसे पाप-समूह भाग गया ? अजामिल, व्याध, गजेन्द्र और गीध (जटायु) आदि करोड़ों दुष्ट किसके पेटमें समा गये ? ॥३॥ जिस प्रभुने अपने भक्तोंके पर्वतके समान दोषोंको दूर करके (भुलाकर), रज-कणके समान गुणपर ध्यान दिया है, ऐ मूर्ख तुलसीदास ! उस स्वामीको तू सब आशा छोड़कर अब भी क्यों नहीं भजता ? ॥४॥ विशेष १—‘जो पै······जाने’—महाकवि केशवदासने भी कहा है कि राम- भक्तिके बिना सबपर धिक्कार है:— धिक मंगन बिन गुनहि, गुनहु धिक सुनत न रीझै । रीझ सु धिक बिन साँच, साँच धिक देत जु खीझै ॥ देबो धिक बिन मौज मौज धिक धरम न भावै । धरम सु धिक बिन दया, दया धिक अरि पहँ आवै ॥ अरिधिक चित्त न सालहीं, चित धिक जहँ न उदार मति । मतिधिक ‘केसव’ ज्ञान बिन, ज्ञानहु धिक बिन हरि भगति ॥