विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 396, कुल 475 में से
संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ३८५ होगा ? ॥१॥ मैं जहाँ-जहाँ अपना चित्त दौड़ाता हूँ, सब स्वामी मुझे अकृपालु ही जान पड़ते हैं; और जो लोग कृपालु भी हैं, वे अयोग्य (असमर्थ) हैं। यही सुन और समझकर मैं मौन ही रहता हूँ, क्यों किसीसे कुछ कहकर अपना भरम खोऊँ ॥२॥ काम तो करता हूँ गोखुरके पानीमें (चुल्लूभर पानीमें) डूब मरनेका, और बातोंसे समुद्र थहाता हूँ। मेरा मन तो अत्यन्त लालची और कामुकताका दास है, पर मुखसे आपका (दास) कहलाता हूँ ॥३॥ हे प्रभो ! यद्यपि आप तुलसीके हृदयकी सब बात जानते हैं, तथापि मैं अपना कुछ हाल आपको जनाता हूँ। (मेरी यही लालसा है कि) आप ऐसा कीजिये, जिससे मैं छल छोड़कर आपके द्वारपर पड़ा आपहीके गुण गाता रहूँ ॥४॥ [२३३] मनोरथ मनको एकै भाँति । चाहत मुनि-मन-अगम सुकृत-फल, मनसा अघ न अघांति ॥१॥ करमभूमि कलि जनम, कुसंगति, मति बिमोह-मद-माति । करत कुजोग कोटि, क्यों पैयत परमारथ-पद साँति ॥२॥ सेइ साधु-गुरु, सुनि पुरान-स्रुति बूझ्यो राग बाजी ताँति । तुलसी प्रभु सुभाउ सुरतरु-सो, ज्यों दरपन मुख-काँति ॥३॥ शब्दार्थ - अघाति = तृप्ति । करमभूमि = भारतवर्ष साँति = शान्ति । ताँति = सारंगी । काँति = कान्ति, सौन्दर्य । भावार्थ- मनका मनोरथ भी एक ही तरहका है। मेरा मन ऐसे पुण्यका फल चाहता है जो मुनियोंके मनके लिए दुर्लभ है; किन्तु पाप करनेसे उसकी तृप्ति ही नहीं होती ॥१॥ इस कर्मभूमि भारतवर्षमें जन्म तो हुआ, पर कलियुगमें; कुसंगति, मोह-मदसे मतवाली बुद्धि एवं करोड़ों बुरे कर्म करनेके कारण परमपद और शान्ति कैसे मिल सकती है ? ॥२॥ साधु-महात्माओं तथा गुरुओंकी सेवा करने एवं वेद-पुराण सुननेसे सारंगी बजते ही रागका ज्ञान होनेकी तरह यह मालूम हो गया है कि तुलसीके प्रभु श्रीरामजीका स्वभाव कल्पवृक्षके समान तथा दर्पणमें मुखकी कान्ति या शोभाके सदृश है। भाव यह कि जिस प्रकार शीशेमें वैसा ही प्रतिबिम्ब दिखाई पड़ता है जैसा मुँहका आकार रहता है, उसी २५