भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 390

विनय-पत्रिका ३७९ बाल्मीकि-अजामिलके कछु हुतो न साधन सामो। उलटे-पलटे नाम-महातम गुंजनि जितो ललामो ॥४॥ राम तें अधिक नाम-करतब, जेहि किये नगर-गत गामो। भये बजाइ दाहिने जो जपि तुलसिदास से वामो ॥५॥ शब्दार्थ—परिनामो = अन्त। सरोरुह = कमल। जामो = जम उठा, उगा। भामो = स्त्री। सामो = सामान। गुंजनि = घुँघचियाँ। ललामो = रत्न, माणिक। भावार्थ—जिसे रामजी भी रामनामकी अपेक्षा अधिक प्रिय नहीं हैं, उसका इस कठिन कलिकालमें भी आदि, मध्य और अन्त अच्छा है ॥१॥ नामकी महिमा समझकर काम, क्रोध, लोभ, मोह और मद सकुच जाते हैं। राम-नामके जपमें रत रहनेवाले सज्जनोंपर कड़ी धूप भी छाया कर देती है ॥२॥ यदि कोई कहे कि राम-नामके प्रभावसे पत्थरपर कमल उगा है, तो वह भी ठीक है। क्योंकि उसी नामके सुनने और स्मरण करनेसे भीलनी शबरी सुकृतशीला और भाग्यवती हो गयी थी ॥३॥ वाल्मीकि और अजामिलके पास तो साधनका कोई भी सामान नहीं था। किन्तु नामके माहात्म्यसे उलट-पुलटमें ही घुँघचियोंने रत्नको जीत लिया ॥४॥ नामकी प्रभुता श्रीरामजीसे अधिक है, क्योंकि उसने गाँवको शहर बना दिया (अर्थात् मूर्खको चतुर बना दिया); या देहातमें रहनेवाले उजड़े हुएको शहरमें लाकर प्रतिष्ठित कर दिया और जिसे जपकर तुलसीदासके समान विमुख प्राणी भी डंकेकी चोट सम्मुख हो गये ॥५॥ विशेष १—'उलटे पलटे'—यहाँ 'उलटे' शब्द महर्षि वाल्मीकिके लिए और 'पलटे' शब्द अजामिलके लिए लिखा जान पड़ता है। यानी वाल्मीकि तो उलटा नाम जपकर तर गये और अजामिल पुत्रके बहाने 'नारायण' नाम उच्चारण करके मुक्त हो गया। किन्तु उलटे नामकी कथा प्राचीन ग्रन्थोंमें नहीं पायी जाती। संस्कृतके अनुसार 'मरा' शब्दका कुछ अर्थ भी नहीं होता। वैसे 'मरा' शब्द यदि वार-बार कहा जाय तो उसकी ध्वनि 'राम'में बदल जाती है। 'उलटा नाम जपत जग जाना। वाल्मीकि भे ब्रह्म समाना।' इसमें कविका यह आशय जान पड़ता है कि 'अहिंसा परमो धर्मः' या जीवोंकी रक्षा करना तो सीधा