भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 42

विनय-पत्रिका ३१ २—'महिमा की अवधि करसि'- वास्तवमें गङ्गाजीकी महिमा अपार है। देखिये यमराज भी हैरान हो रहा है:— गङ्गके चरित्र लखि भाषै जमराज इमि ऐरे चित्रगुप्त मेरे हुकुममें कान दे। कहै पदमाकर ये नरकनि मूँदि करि मूँदि दरवाजनको तजि यह ध्यान दे॥ देखु यह देवनदी कीन्हे सब देव याते दूतन बुलायकै विदाके वेगि पान दे। फारि डारु फरद न राखु रोजनामा कहुँ खाता खति जान दे बहीको बहि जान दे॥ यमुना-स्तुति राग बिलावल ( २१ ) जमुना ज्यों ज्यों लागी बाढ़न । त्यों त्यों सुकृत-सुभट कलि-भूपहिं, निदरि लगे बहु काढन ॥१॥ ज्यों ज्यों जल मलीन त्यों त्यों जमगन मुख मलीन है आड़न । तुलसिदास जगदघ जवास ज्यों अनघ मेघ लागे डाढ़न ॥२॥ शब्दार्थ—सुकृत = पुण्य । सुभट = अच्छे योद्धा । निदरि = अपमान करके । आड़ = भाड़ । जगदघ = (जगत्+अघ) संसारका पाप । जवास = जवासा या हिंगुआ । अनघ = (अन्+अघ) पाप-रहित । डाढ़न = जलाने लगे । भावार्थ—वर्षाकालमें यमुनाजी ज्यों-ज्यों बढ़ने लगीं, त्यों-त्यों पुण्यरूपी योद्धा कलिकालरूपी राजाका अत्यन्त निरादर करते हुए उसे निकालने लगे ॥१॥ बाढ़के कारण ज्यों-ज्यों यमुनाजीका जल मैला होने लगा, त्यो-त्यों यमदूतोंका मुख भी मलिन होने लगा; अन्तमें उन्हें किसीकी भी आड़ न रही । तुलसीदास कहते हैं कि जैसे पुण्यरूपी मेघ संसारके पापरूपी हिंगुएको जलाने लगे ॥२॥ विशेष १—'जमगन मुख मलीन' पर ग्वाल कविने कहा है:— भाषै चित्रगुप्त सुनि लीजै अर्ज यमराज कीजिये हुकुम अब मूँदें नर्क द्वारे को । अधम अभागे औ कृतघ्नी क्रूर कलहिन करत कन्हैया कर्न-कुंडल समारे को ॥