भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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३२ विनय-पत्रिका ग्वाल कवि अधिक अनीतें विपरीतें भईं दीजिये तुराय वेगि कुलपकिवारे कों । हम ना लिखेंगे वही गमना जु खैहैं हम जमुना बिगारें देत कागज हमारे को ॥ काशी-स्तुति राग भैरव (२२) सेइय सहित सनेह देह-भरि, कामधेनु कलि कासी। समनि सोक-संताप-पाप-रुज, सकल सुमंगल-रासी ॥१॥ मरजादा चहुँ ओर चरन वर, सेवत सुरपुर-वासी। तीरथ सब सुभ अंग रोम सिवलिंग अमित अविनासी ॥२॥ अंतरऐन ऐन भल, थन फल, बच्छ वेद-विस्वासी। गलकंबल बरुना विभाति जनु, लूम लसति सरिताऽसी ॥३॥ दंडपानि भैरव विषाण, मलरुचि-खलगन-भयदा-सी। लोलदिनेस त्रिलोचन लोचन, करनघंट घंटा-सी ॥४॥ मनिकर्निका बदन-ससि सुन्दर, सुरसरि-सुख सुखरा-सी। स्वारथ परमारथ परिपूरन, पंचकोसि महिमा-सी ॥५॥ विस्वनाथ पालक कृपालु चित, लालति नित गिरिजा-सी। सिद्धि, सची, सारद पूजहिं, मन जोगवति रहति रमा-सी॥६॥ पंचाच्छरी प्रान, मुद माधव, गव्य सुपंचनदा-सी। ब्रह्म-जीव-सम रामनाम जुग, आखर बिस्व-विकासी ॥७॥ चारितु चरति करम कुकरम करि, मरत जीवगन घासी। लहत परम पद पय पावन, जेहि चहत प्रपंच-उदासी ॥८॥ कहत पुरान रची केसव निज कर-करतूति कला-सी। तुलसी बसि हरपुरी राम जपु, जो भयो चहै सुपासी ॥९॥ शब्दार्थ—अन्तर अयन = अन्तरगृही। बच्छ = बछड़ा। गलकंबल = गायके गलेमें लटकती हुई खाल, यानी लुलरी। विभाति = शोभित। लूम = पूँछ। विषाण = सींग।