भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

पृष्ठ 44, कुल 475 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 44

विनय-पत्रिका ३३ लोलदिनेस = लोलार्क कुण्ड। त्रलोचन = काशीमें एक तीर्थका नाम। मणिकर्णिका = एक स्थानका नाम है। लालति = प्यार करती है। सची = इन्द्राणी। माधव = बिन्दुमाधव। गव्य = पंचगव्य; गोबर, गोमूत्र, गोदधि, गोदुग्ध और गोघृतका मिश्रण। चारितु = चारा। प्रपंच = संसार। सुपासी = समीपवासी या कल्याण। भावार्थ—कलियुगमें काशीपुरी कामधेनुके समान है। शरीरकी अवधितक काशीरूपी कामधेनुका सेवन करना चाहिये। यह शोक, सन्ताप, पाप और रोगका नाश करनेवाली तथा कल्याणोंकी खान है ॥१॥ काशीके चारों ओरकी मर्यादा अर्थात् चौहद्दी ही कामधेनुके श्रेष्ठ चरण हैं; देवलोक-वासी उन चरणोंकी सेवा करते हैं। यहाँके सब तीर्थस्थान ही इसके पवित्र अंग हैं, और अविनाशी अगणित शिवलिंग ही रोम हैं ॥२॥ अंतर्गृही इसके रहनेके लिए बढ़िया घर है, अर्थ-धर्म-काम-मोक्ष—ये चारों फल ही चार थन हैं, और वेदपर विश्वास रखने- वाले लोग ही बछड़े हैं (अर्थात् जिस प्रकार बछड़ेसे गाय पेन्हाकर दूध देती है, उसी प्रकार वेद-वचनमें जो विश्वास है, उस विश्वासरूपी बछरूस यह गाय ईश्वर- प्राप्तिरूप दूध देतो है)। वरुणा नदी ही मानों ललरी होकर सुशोभित हो रही है और असी नदी पूँछके रूपमें विराजमान है ॥३॥ दण्डपाणि और भैरव इसके दो सींग हैं। यह कामधेनु अपने इन दोनों सींगोंसे पापमें रुचि रखनेवाले दुष्टों- को भयभीत करती रहती है। लोलार्क कुण्ड और त्रिलोचन (एक तीर्थ) ये दो नेत्र हैं कर्णघंटा नामका स्थान इसके गलेमें बँधा हुआ घंटारूप है ॥४॥ मणिकर्णिका नामका स्थान चन्द्रमाके समान सुन्दर मुख है और गंगाजीसे जो सुख प्राप्त हो रहा है, वही इसकी शोभा है। स्वार्थ और परमार्थसे परिपूर्ण पंचकोसीकी परिक्रमा ही महिमा है ॥५॥ कृपालुचित्त विश्वनाथजी इसका पालन करनेवाले हैं और पार्वती-जैसी देवी इसका सदैव लालन करती रहती हैं। अष्टसिद्धियाँ, इन्द्राणी और सरस्वती इसकी पूजा करती हैं और लक्ष्मी-सरीखी तीनों लोककी स्वामिनी इसका रुख देखती रहती हैं ॥६॥ पंचाक्षरी मन्त्र ही इसका पंचप्राण है, भगवान् बिन्दुमाधव आनन्द हैं और पंचनदी (पंचगंगा) पंचगव्यरूप हैं। संसारको विकसित करनेवाले रामनामके दोनों अक्षर ब्रह्म और जीवके समान हैं ॥७॥ यहाँ सुकर्म और कुकर्म करके जितने प्राणी मरते हैं, उनका वह शुभ-अशुभ कर्मरूपी घास ही इसका चारा है—उसीको यह चरा ३