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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

विनय-पत्रिका ३३ लोलदिनेस = लोलार्क कुण्ड। त्रलोचन = काशीमें एक तीर्थका नाम। मणिकर्णिका = एक स्थानका नाम है। लालति = प्यार करती है। सची = इन्द्राणी। माधव = बिन्दुमाधव। गव्य = पंचगव्य; गोबर, गोमूत्र, गोदधि, गोदुग्ध और गोघृतका मिश्रण। चारितु = चारा। प्रपंच = संसार। सुपासी = समीपवासी या कल्याण। भावार्थ—कलियुगमें काशीपुरी कामधेनुके समान है। शरीरकी अवधितक काशीरूपी कामधेनुका सेवन करना चाहिये। यह शोक, सन्ताप, पाप और रोगका नाश करनेवाली तथा कल्याणोंकी खान है ॥१॥ काशीके चारों ओरकी मर्यादा अर्थात् चौहद्दी ही कामधेनुके श्रेष्ठ चरण हैं; देवलोक-वासी उन चरणोंकी सेवा करते हैं। यहाँके सब तीर्थस्थान ही इसके पवित्र अंग हैं, और अविनाशी अगणित शिवलिंग ही रोम हैं ॥२॥ अंतर्गृही इसके रहनेके लिए बढ़िया घर है, अर्थ-धर्म-काम-मोक्ष—ये चारों फल ही चार थन हैं, और वेदपर विश्वास रखने- वाले लोग ही बछड़े हैं (अर्थात् जिस प्रकार बछड़ेसे गाय पेन्हाकर दूध देती है, उसी प्रकार वेद-वचनमें जो विश्वास है, उस विश्वासरूपी बछरूस यह गाय ईश्वर- प्राप्तिरूप दूध देतो है)। वरुणा नदी ही मानों ललरी होकर सुशोभित हो रही है और असी नदी पूँछके रूपमें विराजमान है ॥३॥ दण्डपाणि और भैरव इसके दो सींग हैं। यह कामधेनु अपने इन दोनों सींगोंसे पापमें रुचि रखनेवाले दुष्टों- को भयभीत करती रहती है। लोलार्क कुण्ड और त्रिलोचन (एक तीर्थ) ये दो नेत्र हैं कर्णघंटा नामका स्थान इसके गलेमें बँधा हुआ घंटारूप है ॥४॥ मणिकर्णिका नामका स्थान चन्द्रमाके समान सुन्दर मुख है और गंगाजीसे जो सुख प्राप्त हो रहा है, वही इसकी शोभा है। स्वार्थ और परमार्थसे परिपूर्ण पंचकोसीकी परिक्रमा ही महिमा है ॥५॥ कृपालुचित्त विश्वनाथजी इसका पालन करनेवाले हैं और पार्वती-जैसी देवी इसका सदैव लालन करती रहती हैं। अष्टसिद्धियाँ, इन्द्राणी और सरस्वती इसकी पूजा करती हैं और लक्ष्मी-सरीखी तीनों लोककी स्वामिनी इसका रुख देखती रहती हैं ॥६॥ पंचाक्षरी मन्त्र ही इसका पंचप्राण है, भगवान् बिन्दुमाधव आनन्द हैं और पंचनदी (पंचगंगा) पंचगव्यरूप हैं। संसारको विकसित करनेवाले रामनामके दोनों अक्षर ब्रह्म और जीवके समान हैं ॥७॥ यहाँ सुकर्म और कुकर्म करके जितने प्राणी मरते हैं, उनका वह शुभ-अशुभ कर्मरूपी घास ही इसका चारा है—उसीको यह चरा ३

३४ विनय-पत्रिका करती है । उस चारेको खाकर यह कामधेनु मोक्ष-रूपी पवित्र दूध देती है । उसे वे मरनेवाले प्राणी पीते हैं । वह मोक्षरूपी दूध इतना दुर्लभ है कि उसके लिए संसारमें उदासीन महात्मागण झींखते हैं ॥८॥ पुराणोंका कथन है कि भगवान् बिन्दुमाधवने अपने हाथोंसे इसकी रचना की है, उनकी यह कारीगरी कलारूप है । तुलसीदास कहते हैं कि यदि तू अपना कल्याण चाहता है तो काशीमें रहकर श्रीरामजीका नाम जप ॥९॥ विशेष १—'अंतर्गृही'—पद्मपुराणमें काशीके चार विभाग किये गये हैं । काशी, वाराणसी, अविमुक्त और अन्तर्गृही । मध्यमेश्वर और देहली विनायकके बीच मण्डलाकार भूमिको काशी कहा गया है । यहाँ मृत्यु होनेसे सालोक्य (शिवलोक) मुक्ति प्राप्त होती है । उत्तरमें वरुणा, दक्षिणमें असी नदी, पूरबमें गङ्गाजी और पश्चिममें पाशपाणि गणेशके बीचकी भूमिको वाराणसी कहते हैं । यहाँ मृत्यु होनेसे सारूप्य मुक्ति होती है । विश्वनाथजीके चारों ओर दो सौ धन्वा (एकधन्वा = ४ हाथ) का दायरा अविमुक्त कहलाता है । यहाँकी मृत्युसे साम्निध्य (सामीप्य) मुक्ति प्राप्त होती है । पश्चिम गोकर्णेश, पूरब गङ्गा, उत्तर भारभूत और दक्षिण ब्रह्मेश, इसके बीचकी भूमिको शिवजीका अन्तर्गृह माना गया है । यहाँकी मृत्युसे साक्षात् कैवल्य अर्थात् शिवस्वरूपकी प्राप्ति होती है । गोस्वामीजीने यहाँ उसी अन्तर्गृहीका उल्लेख किया है । २—'करनघंट'—काशीमें एक शिव-भक्त ब्राह्मण था । वह शिवजीके सिवा दूसरे किसी भी देवताका नाम नहीं सुनना चाहता था । इसीसे उसने अपने दोनों कानोंमें घंटे लटका रखे थे ताकि उसे किसी दूसरेका नाम सुनाई न पड़े । यदि कोई मनुष्य उसके सामने किसी दूसरेका नाम लेता तो वह घंटा बजाते हुए दूर भाग जाता । इसीसे उसका नाम 'करनघंट' पड़ गया था । जिस स्थानपर वह रहता था, वह स्थान काशीमें आज भी कर्णघंटाके नामसे प्रसिद्ध है । ३—'पंचाच्छरी'—'नमः शिवाय' यही पंचाक्षरी मन्त्र है । १—'प्राण'—पाँच हैं:—प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान ।

विनय-पत्रिका ३५ ५—'गव्य'—पंचगव्यमें गायका दूध, दही, घी, गोबर और गोमूत्र—ये पाँच वस्तुएँ हैं। ६—इस पदमें रूपकालंकारका लक्षण यह है:— उपमेयरु उपमान को इक करि कहत जु रूप । सो रूपक द्वै भाँति को, मिलि अभेद तद्रूप ॥ (पद्माभरण) अर्थात् उपमेय और उपमानको एक करके कहनेको रूपक (रूपं स्वभावे; मनोहर कृतौ) कहते हैं। इसके अभेद और तद्रूप दो भेद हैं। इनमें प्रत्येकके तीन-तीन (१ अधिक, २ न्यून, ३ सम) उपभेद हैं। अभेदके उदाहरण अभेद अधिक—नव बिधु विमल तात जस तोरा । रघुबर किंकर कुमुद चकोरा ॥ (रा० च० मा०) अभेद न्यून—अति खल जे विषयी बक कागा। अभेद सम—तुव मुख पंकज विमल यह, धरत सुवास भछेह । तद्रूपके उदाहरण तद्रूप अभेद—विष वारुनी बंधुप्रिय तेही । कहिय रमा सम किमि वैदेही ॥ तद्रूप न्यून—राममात्र लघु नाम हमारा। परसु सहित बढ़ नाम तुम्हारा ॥ तद्रूप सम—लषन उतरु आहुति सरिस, भृगुपति कोप कृसानु । सूचना—जहाँ उपमेयको उपमान मानकर उपमानसे ही उसकी तुलना की जाती है, उसे तद्रूप रूपक और जहाँ उपमेयको उपमान मानकर उसकी तुलना उपमानसे नहीं की जाती, उसे अभेद रूपक अलङ्कार कहते हैं । चित्रकूट-स्तुति राग बसन्त ( २३ ) सब सोच-विमोचन चित्रकूट। कलिहरन, करन कल्यान कूट ॥१॥ सुचि अवनि सुहावनि आलबाल। कानन विचित्र, बारी बिसाल ॥२॥

३६ विनय-पत्रिका मंदाकिनि-मालिनि सदा सींच। बर बारि, विषम नर नारि नीच ॥३॥ साखा सुस्रृंग, भूरूह-सुपात। निरझर मधुवर, मृदु, मलय बात ॥४॥ सुक पिक, मधुकर मुनिवर-विहारु। साधन प्रसून, फल चारि चारु ॥५॥ भव-घोर घाम-हर सुखद छाँह। थप्यो थिर प्रभाव जानकी-नाहु ॥६॥ साधक-सुपथिक बड़े भाग पाइ। पावत अनेक अभिमत अघाइ ॥७॥ रस एक, रहित-गुन-करम-काल। सिय राम लखन पालक कृपाल ॥८॥ तुलसी जो रामपद चहिय प्रेम। सेइय गिरि करि निरुपाधि नेम ॥९॥ शब्दार्थ-बूट = हरा वृक्ष। बारी = बगीचा। भूरुह = पेड़। मलय = चन्दन। बात = हवा। नाहु = स्वामी। अघाइ = तृप्त होना या पूर्ण होना। भावार्थ—सब शोकोंसे छुड़ानेवाला चित्रकूट (पर्वत) कलिका नाश करने- वाला और कल्याण करनेवाला हरा वृक्ष है ॥१॥ वहाँकी पवित्र भूमि उस वृक्षके लिए सुहावना थाल्हा है। बगीचोंमें अपूर्व वृक्ष हुआ करते हैं। चित्रकूटके चारों ओर जो विचित्र वन है, वही बड़ा बगीचा है ॥२॥ जिस प्रकार मालिन जल-सिंचनके समय किसी खास वृक्षके प्रति पक्षपात नहीं करती और न तो किसीकी उपेक्षा, उसी प्रकार मन्दाकिनी नदी रूपी मालिन अपने श्रेष्ठ जलसे, वहाँ निवास करनेवाले सभी अच्छे-बुरे (ऊँच-नीच) नर-नारियोंका हमेशा समान भावसे पोषण करती है ॥३॥ चित्रकूट पर्वतके सुन्दर शिखर ही उस वृक्षकी शाखाएँ हैं और उसके ऊपरके वृक्ष ही उत्तम पत्ते हैं। झरनोंसे झरनेवाला श्रेष्ठ और मीठा जल ही मृदु मलय वायु है, और हवा ही उसकी कोमलता है ॥४॥ वहाँ बिहार करनेवाले मुनीश्वर ही तोता, कोयल और भौंरे हैं। उन मुनीश्वरोंकी नाना प्रकारकी साधनाएँ ही उस वृक्षके पुष्प हैं और अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष— ये ही चार सुन्दर फल हैं ॥५॥ उस वृक्षकी सुखदायिनी छाया संसारकी जन्ममृत्यु- रूपी कड़ी धूपको हरनेवाली है। जानकी-वल्लभ श्रीरामने वहाँ निवास करके उसके प्रभावको और भी स्थायी कर दिया है ॥६॥ साधकरूपी उत्तम बटोही बड़े भाग्यसे उसे प्राप्त करते हैं और पाते ही उनकी नाना प्रकारकी आकांक्षाएँ पूर्ण हो जाती हैं ॥७॥ वह गुण, कर्म और कालसे रहित एवं एकरस रहनेवाला है। कृपालु सीता, राम और लक्ष्मण उनके रक्षक हैं। तुलसीदास कहते हैं कि

विनय-पत्रिका ३७ यदि तू श्रीरामजीके चरणोंमें प्रेम चाहता है, तो उपाधि-रहित नेमसे चित्रकूट पर्वतका सेवन कर । विशेष १—'बारी' शब्दका प्रयोग बिहार, संयुक्तप्रान्त और अवधमें बगीचेके अर्थमें ही किया जाता है। यथा 'बारी बगीचा' 'खेती-बारी'। वास्तवमें यह शब्द ऐसे बगीचोंके लिए आता है, जिनमें श्रेणी-बद्ध वृक्ष क्यारियोंमें नहीं लगे रहते; अथवा कुछ वृक्ष श्रेणीबद्ध लगे हुए होते हैं, और कुछ यत्र-तत्र लगे रहते हैं। ऐसे बगीचेको भी 'बारी' ही कहते हैं। 'वियोगी हरि' ने 'बारी' शब्दका अर्थ किया है, 'खेतों या वृक्षोंके चारों तरफ लगाये हुए कांटेदार पेड़, जिनसे पशु आदिसे उनकी रक्षा रहती है।' यह अर्थ करनेमें आपने बुन्देलखंडी भाषा- की शरण ली है। २—'थप्यो थिर प्रभाव'—श्रीरामजीके निवाससे चित्रकूटकी महिमा बहुत बढ़ गयी, इसीसे वाल्मीकिजीने श्रीरामजीसे चित्रकूटमें रहनेकी प्रार्थना की थी। यथा:— 'चलहु सफल सुभ सबकर करहू। राम देहु गौरव गिरिवरहू ॥' जहाँ-जहाँ श्रीरामजीका चरण पड़ा, वह भूमि धन्य हो गयी। जैसे:— 'धन्य भूमि वन पंथ पहारा। जहँ-जहँ नाथ पाउँ तुम्ह धारा ॥' ३—'मंदाकिनि-मालिनि...बात' सब टीकाकारोंने इसका अर्थ बड़ा ही विचित्र किया है। मालिनके ही जलसे चित्रकूट वृक्षका सिंचन कराया है। वियोगी हरिजी भला कब चूकने लगे ? इन्होंने तो ऐसा अर्थ लिखा है जिससे कोई बात ही स्पष्ट नहीं होती । राग कान्हरा [ २४ ] अब चित चेति चित्रकूटहिं चलु । कोपित कलि, लोपित मंगल मगु, विलसत बढ़त मोह-माया-मलु ॥१॥ भूमि बिलोकु राम-पद अंकित, बन बिलोकु रघुबर-विहार-थलु । सैल-सृंग भवभंग-हेतु लखु, दलन कपट-पाखंड-दंभ-दलु ॥२॥

३८ विनय-पत्रिका जहँ जनमे जग-जनक जगतपति, विधि-हरि-हर परिहरि प्रपंच छल । सकृत प्रबेस करत जेहि आश्रम, बिगत-विषाद भये पारथ नलु ॥३॥ न करु विलम्ब विचारु चारुमति, बरष पाछिले सम अगिले पलु । मंत्र सो जाइ जपहि जो जपि भे, अजर अमर हर अचइ हलाहलु ॥४॥ रामनाम-जप-जाग करत नित, मज्जत पय पावन पीवत जलु । करिहैं राम भावतो मन को, सुख-साधन, अनयास महाफलु ॥५॥ कामद मनि कामता-कलप तरु, सो जुग-जुग जागत जगतीतलू । तुलसी तोहि बिसेषि बूझिये, एक प्रतीति-प्रीति एकै वलु ॥६॥ शब्दार्थ - भवभंग = संसार-बन्धनसे छुटकारा। सकृत = एक बार। पारथ = पृथाके पुत्र युधिष्ठिर आदि। नलु = राजा नल। अचई = पीकर। कामद = सब इच्छाएँ पूरी करनेवाला। जगतीतलू = पृथ्वीतलपर। भावार्थ - हे चित्त, अब तू चेतकर चित्रकूटको चल। कलिने कुपित होकर कल्याण-मार्गों (ज्ञान, भक्ति, वैराग्यादि) का लोप कर दिया है। इससे मोह, माया और पापोंकी वृद्धि विशेषरूपसे शोभा पा रही है ॥१॥ चल, रे चित्त, तू श्रीरामजीके चरणोंसे अंकित भूमिको देख; श्रीरघुनाथजीके विहार-स्थल वनका अवलोकन कर। वहाँ कपट, पाखंड और दम्भके समूहका नाश करनेवाले तथा संसार-बन्धनसे मुक्त करनेके कारणस्वरूप पर्वतके शिखरोंको देख ॥२॥ जहाँ जगत्पिता जगदीश्वर ब्रह्मा, विष्णु और महेशने छल-प्रपंच छोड़कर जन्म लिया है, जिस आश्रममें एक बार प्रवेश करते ही युधिष्ठिरादि पाण्डवों तथा राजा नलका दुःख दूर हो गया था ॥३॥ वहाँ चलनेमें देर न कर और अच्छी बुद्धिसे विचार तो कर कि शेष आयुका प्रत्येक पल बीती हुई आयुके वर्षके समान है। वहाँ जाकर तू उस मन्त्रको जप जिसे जपकर शंकरजी हलाहल विष पीनेपर भी अजर और अमर हो गये ॥४॥ यदि तू वहाँ नित्यप्रति रामनामका जपरूपी यज्ञ करता रहेगा, तपस्विनी नदीके पवित्र जलमें स्नान करता रहेगा तथा उसका जल पीता रहेगा, तो श्रीरामजी तेरी मनोवाञ्छा पूरी कर देंगे और इस सुखमय साधनसे तुझे अनायास ही महाफल (अपने चरणोंमें भक्ति) प्रदान करेंगे ॥५॥ चित्रकूटमें कामतानाथ पर्वत ही सब इच्छाएँ पूरी करनेवाला कल्पवृक्ष और चिन्तामणि है; वह युग-युगसे पृथ्वीतलपर प्रकाशमान है। यों तो चित्रकूटका प्रभाव प्रत्येक

विनय-पत्रिका ३९ मनुष्यको जानना चाहिए, पर हे तुलसीदास, तुझे विशेषरूपसे समझना चाहिए; क्योंकि तुझे उस एकहीका विश्वास, प्रेम और भरोसा है ॥६॥ विशेष १—'जहँ जनमे हरिहर'—चित्रकूटमें महर्षि अत्रि और उनकी पतिव्रता धर्मपत्नी अनुसूया देवीने पुत्र-कामनासे घोर तपस्या की। ब्रह्मा, विष्णु और महादेवजीने प्रसन्न होकर उनसे वर माँगनेको कहा। अनुसूयाने यह वर माँगा कि मेरे गर्भसे तुम्हारे समान पुत्र उत्पन्न हों। तीनों देवता 'तथास्तु' कहकर अन्तर्द्धान हो गये। उसके बाद ब्रह्माने चन्द्रमाके रूपमें, विष्णुने दत्तात्रेयके रूपमें और शिवने दुर्वासाके रूपमें अनुसूयाके गर्भसे जन्म लिया। २—'परिहरि प्रपंच छल'—का आशय यह है कि ब्रह्मा, विष्णु और शिवने अपना-अपना निर्दिष्ट कार्य (उत्पत्ति, पालन और संहार) छोड़कर निष्छल भावसे जन्म लिया। ३—'पारथ नलु'—जुएमें हारकर राजा नल और युधिष्ठिरादि पाण्डव वन-वन भटकते हुए चित्रकूटमें पहुँचे थे। उन लोगोंने कामतानाथकी पूजा की थी और अपनी मनोभिलाषा पूर्ण करनेके लिए प्रार्थना की थी। उस समय पाण्डवोंने यह संकल्प किया था कि यदि हम लोग युद्धमें दुर्योधनको हरा देंगे तो फिर आकर कामतानाथगिरिका पूजन करेंगे। परिणाम यह हुआ कि राजा नल और धर्मराज युधिष्ठिरकी मनोभिलाषा पूरी हो गयी। यह कथा चित्रकूट- माहात्म्यमें विस्तारपूर्वक है। ४—'महाफलु'—का अर्थ है 'राम-पद-प्रेम'। क्योंकि अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष—ये चारों फल हैं। यदि यहाँ इसका अर्थ केवल मोक्ष किया जाय, जैसा कि अधिकांश टीकाकारोंने किया है—तो भी ठीक नहीं। क्योंकि गोस्वामीजी मोक्षके भूखे नहीं थे। भक्त तो कभी 'राम-पद-प्रेम' के सिवा दूसरी वस्तु चाहता ही नहीं। देखिये भरतजी क्या कहते हैं:— 'अरथ न धरम न काम रुचि, गति न चहउँ निरवान। जनम जनम रति रामपद, यह वरदानु न आन ॥' इसके सिवा गोस्वामीजीने जिन-जिन देवताओंकी स्तुति की है, सबसे

४० विनय-पत्रिका 'राम-पद-प्रेम' ही माँगा है—मोक्ष नहीं। इससे सिद्ध होता है कि ग्रन्थकारको 'महाफलु'का अर्थ 'राम-पद-प्रेम' ही अभिप्रेत है। हनुमत्-स्तुति राग धनाश्री [ २५ ] जयति-अंजनी-गर्भ-अंभोधि-संभूत-बिधु, विबुध-कुल कैरवानन्दकारी। केसरी-चारु-लोचन-चकोरक-सुखद, लोकगन सोक-संतापहारी ॥१॥ जयति जय बालकपि केलि-कौतुक उदित चंडकर-मंडल-ग्रास-कर्त्ता। राहु-रवि-सक्र पवि-गर्व-खर्बीकरन सरन भयहरन जय भुवन-भर्त्ता॥२॥ जयति रनधीर, रघुबीर-हित, देवमनि, रुद्र-अवतार, संसार-पाता। विप्र-सुर-सिद्ध-मुनि-आशिषाकारवपु, विमलगुन, बुद्धि-वारिधि-विधाता ३ जयति सुग्रीव सिच्छादि रच्छन-निपुन, वालि-बल-सालि-बध-मुख्यहेतू। जलधि-लंघन सिंह सिंहिका-मद-मथन, रजनिचर-नगर-उत्पात-केतू॥४॥ जयति भूतनन्दिनी-सोच-मोचन विपिन-दलन घननादवस विगत संका। लूम लीला अनल-ज्वालमाला-कुलित, होलिकाकरन लंकेस-लंका॥५॥ जयति सौमित्रि-रघुनंदनानंदकर, ऋच्छ-कपि कटक-संघट-विधायी। बद्ध-वारिधि-सेतु, अमर-मंगल हेतु, भानुकुल-केतु-रनविजयदायी ॥६॥ जयति जय वज्र तनु दसन नख मुख विकट, चंड-भुजदंड तरु-सैल-पानी। समर-तैलिक-यंत्र तिल-तमीचर-निकर, पेरि डारे सुभट घालि घानी ॥७॥ जयति दसकंठ-घटकरन-वारिद-नाद-कदन-कारन, कालनेमि-हंता। अघट घटना-सुघट सुघट-विघटन विकट,भूमि-पाताल-जल-गगन-गंता॥८ जयति विस्व-विख्यात चानैत-विरुदावली, विदुष वरनत वेद विमल वानी। दास तुलसी-त्रास-समन सीतारमन, संग सोभित राम-राजधानी ॥९॥ शब्दार्थ—विबुध = देवता । कैरवानन्दकारी = कुमुदिनीको विकसित करनेवाले । चंड- कर = प्रचण्ड किरणवाले सूर्य । ग्रासकर्त्ता = निगल जानेवाले । सक्र = इन्द्र । पवि = वज्र ।

विनय-पत्रिका ४१ खवींकरन = तोड़नेवाले। पाता = रक्षक। वपु = शरीर। भूनन्दिनी = जानकीजी। आकुलित = आर्त्त। विधायी = विधानकर्त्ता। तैलिक यन्त्र = कोल्हू। तमीचर = राक्षस। घालि = डालकर। घटकरन = कुम्भकर्ण। कदन = नाश। सुघट विघटन = सम्भवको असम्भव करने- वाले। विख्यात = प्रसिद्ध। विदुष = पण्डित। भावार्थ—हे हनुमानजी, तुम्हारी जय हो। तुम अंजनीके गर्भरूपी समुद्रसे उत्पन्न होकर चन्द्रमाके समान देवकुलरूपी कुमुदको विकसित करनेवाले हो। तुम अपने पिताके शरीरके सुन्दर नेत्ररूपी चकोरोंको सुख देनेवाले और समस्त लोकोंका शोक-सन्ताप हरनेवाले हो ॥१॥ तुम्हारी जय हो, जय हो। तुमने बचपनमें उदयकालीन प्रचण्ड रवि-मण्डलको लाल खिलौना समझकर निगल लिया था। उस समय तुमने राहु, सूर्य, इन्द्र और उनके वज्रका गर्व तोड़ दिया था। हे शरणागतोंका भय हरनेवाले! हे चौदहो भुवनके स्वामी! तुम्हारी जय हो ॥२॥ हे युद्धक्षेत्रमें धैर्य धारण करनेवाले महावीरजी, तुम्हारी जय हो! तुम श्रीरामजीके हितार्थ देव-शिरोमणि रुद्रके अवतार हो और संसारके रक्षक हो। तुम्हारा शरीर ब्राह्मण, देवता, सिद्ध और मुनियोंके आशीर्वादका साकार रूप है। तुम निर्मल गुण और बुद्धिसागर तथा विधाता हो ॥३॥ हे उचित शिक्षा आदिसे सुग्रीवकी रक्षा करनेमें चतुर हनुमानजी, तुम्हारी जय हो। तुम महापरा- क्रमी बालिके मरवानेके मुख्य कारण हो। तुम समुद्र लाँघते समय सिंहिका नाम- की राक्षसीका मद-मर्दन करनेवाले सिंह हो। निशाचरोंकी लंकापुरीमें उत्पात करनेके लिए केतु हो ॥४॥ हे जानकीजीकी चिन्ताओंको दूर करनेवाले, अशोक वनको उजाड़नेकी नीयतसे निःशंक होकर अपनेको मेघनादके ब्रह्मास्त्रमें बँधवाने- वाले, तुम्हारी जय हो। तुमने अपनी पूँछकी लीला द्वारा आगकी ज्वालमालासे आर्त्त रावणकी लंकापुरीमें होली-दहन-सा मचा दिया था ॥५॥ हे राम और लक्ष्मणको आनन्दित करनेवाले, तुम्हारी जय हो! तुम रीछ और बन्दरोंकी सेना संघटित करनेके विधायक होकर समुद्रपर पुल बाँधनेवाले हो, देवताओंका कल्याण करनेवाले हो और सूर्यकुल-केतु (ध्वजा) श्रीरामजीको संग्राममें विजय-लाभ कराने- वाले हो ॥६॥ तुम्हारी जय हो, जय हो। तुम्हारा शरीर, दाँत, नख और विकट मुँह वज्रके समान हैं। तुम्हारे भुजदंड बड़े प्रचंड हैं। तुम वृक्षों और पर्वतोंको हाथोंसे उठानेवाले हो। तुमने समर-रूपी तेल पेरनेके कोल्हूमें राक्षस-समूह और

४२ विनय-पत्रिका बड़े-बड़े योद्धारूपी तिलोंकी घानी डालकर पेर डाला है ॥७॥ हे रावण, कुम्भकर्ण और मेघनादके नाशके कारण, तथा कालनेमि राक्षसको मारनेवाले, तुम्हारी जय हो। तुम असम्भवको सम्भव और सम्भवको असम्भव कर दिखाने- में बड़े ही विकराल हो। तुम पृथ्वी, पाताल, जल और आकाशमें गमन करने- वाले हो ॥८॥ हे जगतप्रसिद्ध वाणैत, तुम्हारी जय हो। पण्डित और वेद विमल वाणीसे तुम्हारी गुणावलीका वर्णन करते हैं। तुम तुलसीदासके भयको नाश करनेवाले श्रीसीतारमणके साथ अयोध्यापुरीमें सदा शोभायमान रहते हो ॥९॥ विशेष १—'जयति अंजनी गर्भ-अंभोधि···' में रूपक अलङ्कार है। २—'केसरी'-नामक वानरकी स्त्रीका नाम अंजनी था। एक दिन अंजनी शृङ्गार किये खड़ी थी। इतनेमें पवनदेव वहाँ आये और उसके रूपलावण्यपर मुग्ध हो गये। उन्हींके वीर्यसे अंजनीके गर्भसे हनुमानजीका जन्म हुआ। इसीसे इन्हें 'केसरी-नन्दन' भी कहते हैं ? यहाँ उसी केसरीका नाम आया है। ३—'ग्रासकर्ता'—अमावस्याका दिन था और प्रातःकालका समय। हनुमान- जीको बहुत भूख लगी थी। वह उगते हुए सूर्यको लाल फल जानकर उनकी ओर लपके और देखते-देखते पकड़कर निगल गये। उस दिन ग्रहण भी था। सूर्यको न देखकर राहु बहुत निराश हुआ और इन्द्रके पास पहुँचकर बोला, आज मैं क्या खाऊँगा ? सूर्यको किसी दूसरेने ही खा डाला। यह सुनते ही इन्द्र दौड़े। उन दोनोंको आते देखकर हनुमानजीने उनको भी निगलनेके लिए हाथ बढ़ाया। इतनेमें इन्द्रने उनपर वज्र चलाया, पर वज्र उनकी ठुड्डीमें लगा। इससे वह मूर्च्छित हो गये और वज्र भी टूट गया। तभीसे महावीरजीका नाम हनुमान पड़ा। यह कथा वाल्मीकीय रामायणके उत्तरकाण्डमें लिखी है। ४—'राहु रवि···खर्बीकरन'—जिस समय राहु देवराज इन्द्रके साथ आ रहा था, उस समय हनुमानजी उसको काला फल समझकर उसकी ओर लपके थे। इससे राहु भयभीत होकर भाग गया था। सूर्यको वह पहले ही निगल चुके थे। उनका प्रभाव देखकर इन्द्र भी डर गये थे। जो वज्र पहाड़ोंको

तोड़ डालता, उससे महावीरजीकी केवल दाढ़ी मात्र जरा-सी टेढ़ी हो गयी, इससे वज्रका भी गर्व चूर हो गया। ५—'रुद्र अवतार'—शिवजीने श्रीरामजीसे दासभावसे सेवा करनेके लिए वर माँगा था। तदनुसार ही समय पाकर वे हनुमानके रूपमें श्रीरामजीके सेवक बने। इसीसे हनुमानजी एकादश रुद्र माने जाते हैं। ६—'आशिषाकार वपु'—जिस समय इन्द्रके वज्रसे हनुमानजी मूर्च्छित हो गये थे, उस समय उनके पिता पवनने कुपित होकर अपनी गति बन्द कर दी थी। इससे विश्व-ब्रह्माण्ड थर्रा उठा। इन्द्रादिक देवताओंके प्रार्थना करनेपर ब्रह्मा बहुत-से देवताओं और मुनियोंको साथ लेकर वायुके पास गये और महा- वीरके मस्तकपर हाथ फेरा। उनकी कृपासे महावीरकी मूर्च्छा दूर हो गयी। उसके बाद देवताओं और मुनियोंने हनुमानजीको आशीर्वाद दिया। इसीसे उन्हें 'आशिषाकार वपु' कहा गया है। यह कथा भी वाल्मीकीय-रामायणके उत्तरकाण्डमें है। ७—'बालि...बधमुख्यहेतू'—जब भगवान् सीताको ढूँढ़ते हुए ऋष्यमूक पर्वतके पास पहुँचे तो पहले हनुमानजी उनसे मिले और उनको ले जाकर सुग्रीवसे मैत्री करायी। वह मैत्री बालि-वधका कारण हुई। ८—'सिंहिका-मद-मथन'—सिंहिका राक्षसी समुद्रमें रहती थी और आकाशमार्गसे जानेवाले जीवोंकी परछाईं जलमें देखकर उन्हें पकड़कर खा जाती थी। उसने हनुमानजीको भी पकड़कर निगलना चाहा। किन्तु हनुमानजीने एक मुक्का मारकर उसका प्राण लिया। ९—'दसकंठ...कारन'—यदि हनुमानजी महारानी जानकीजीकी खबर श्रीरामजीको न सुनाते तो रावणादिका बध न होता। इसीसे रावणादिके बधके कारण कहे गये हैं। दूसरी बात यह भी है कि युद्धके समय जब रावण विजय प्राप्त करनेके लिए यज्ञका अनुष्ठान करने लगा, तो विभीषणने रामचन्द्रकी सेनामें इसकी सूचना दी। कहा कि यदि रावण इस अनुष्ठानमें सफल हो जायगा तो उसपर विजय पाना अत्यन्त कठिन हो जायगा। इसलिए उसके यज्ञको विध्वंस करना चाहिए। इस कामका भार हनुमान्‌जीने अपने ऊपर लिया और थोड़ी-सी सेना साथ ले जाकर उस यज्ञको विध्वंस कर दिया। पश्चात् रावण युद्ध-क्षेत्रमें

४४ विनय-पत्रिका आकर मारा गया। इस प्रकार हनुमानजी उसकी मृत्युके कारण बने। रणमें कुम्भकर्णको बलहीन करनेके भी मूल कारण हनुमानजी ही थे।—लक्ष्मणजीको शक्तिबाणसे मूर्च्छित देखकर हनुमानजी संजीवनी बूटी लानेके लिए धौलागिरि- को ही उठा लाये थे। उस बूटीके द्वारा मूच्र्छा दूर होनेपर लक्ष्मणजीने दूसरे ही दिन मेघनादको मारा था। इससे वह मेघनादके भी वधके कारण माने जाते हैं। १०—'कालनेमिहंता'—यह रावणके पक्षका बड़ा ही मायावी राक्षस था। जब हनुमानजी लक्ष्मणजीके लिए संजीवनी लाने गये थे तो इसने मार्गमें साधुका वेष धारण करके उन्हें छलनेका विचार किया। हनुमानजीको उसकी माया मालूम हो गयी और तुरन्त ही उन्होंने उसकी जान ले ली, इसीसे वह कालनेमिहंता कहलाते हैं। ११—'अघट घटना...विघटन'—समुद्रको लाँघना असम्भव है, किन्तु हनुमानजीने उसे सम्भव कर दिखाया था। पूँछकी आगसे हनुमानजीके भस्म हो जानेकी पूरी सम्भावना थी, पर उन्होंने उस सम्भव कार्यको असम्भव कर दिया और उस आगसे लंकापुरीको जलाकर असम्भवको सम्भव भी कर दिया। ( २६ ) जयति मर्कटाधीस, मृगराज-बिक्रम, महादेव, मुद-मंगलालय, कपाली। मोद-मद-कोह-कामादि-खल-संकुला, घोर संसार-निसि किरनमाली ॥१॥ जयति लसदंजनाऽदितिज, कपि-केसरी- कश्यप-प्रभव, जगदार्त्तिहर्त्ता। लोक-लोकप-कोक कोकनद-सोकहर, हंस हनुमान कल्यान कर्त्ता ॥२॥ जयति सुविसाल-विकराल विग्रह, वज्रसार सर्वांग भुजदंड भारी। कुलिसनख, दसनवर लसत, बालधि वृहद, बैरि-सस्त्रास्त्रधर कुधरधारी ॥३॥

विनय-पत्रिका ४५ जयति जानकी-सोच-संताप मोचन, राम-लछमनानंद-वारिज-विकासी । कीस-कौतुक-केलि लूम-लंका-दहन, दलन कानन तरुन तेजरासी ॥४॥ जयति पाथोधि-पाषान-जलजानकर, जातुधान-प्रचुर-हर्ष-हाता । दुष्ट रावन-कुंभकरन-पाकारिजित- मर्मभित्, कर्म-परिपाक-दाता ॥५॥ जयति भुवनैकभूपन, विभीषन-वरद, विहित कृत राम-संग्राम साका । पुष्पकारूढ़ सौमित्रि-सीता-सहित, भानु-कुल-भानु-कीरति-पताका ॥६॥ जयति पर-जंत्रमंत्राभिचार-ग्रसन, कारमन-कूट-कृत्यादि-हंता । साकिनी-डाकिनी-पूतना-प्रेत- बैताल-भूत-प्रमथ-जूथ-जंता ॥७॥ जयति वेदांतविद विविध-विद्या-विसद, वेद-वेदांगविद ब्रह्मवादी । ज्ञान-विज्ञान-वैराग्य-भाजन विभो, विमल गुन गनसि सुक नारदादी ॥८॥ जयति काल-गुन-कर्म-माया-मथन, निश्चल ग्यान व्रत-सत्यरत, धर्मचारी । सिद्ध-सुरवृंद-जोगींद्र सेवित सदा, दास तुलसी प्रनत भय-तमारी ॥९॥

शब्दार्थ-मर्कटाधीश = बन्दरोंके राजा । मृगराज = सिंह । कपाली = शिवजी । कोह = क्रोध । किरनमाली = सूर्य । लसदंजनऽदितिज = (लसत् + अंजना + अदिति + ज) अंजनी- रूपी अदितिसे जायमान होकर सुशोभित । कोक = चकवा । कोकनद = कमल । हंस = सूर्य । बालधि = पूँछ । कुधर = पहाड़ । पयोधि = समुद्र । जातुधान = राक्षस । हाता = हन्ता ।

४६ विनय-पत्रिका पाकारिजित = पाक नामक दैत्यके शत्रु इन्द्रको जीतनेवाला मेघनाद। मर्मभित् = मर्म स्थानको भेदनेवाला। परिपाक = फल। वरद = वर देनेवाले। साका = यश। अभिचार = मोहन-उच्चाटन आदि प्रयोग तथा जादू-टोना। कारमन = किसीको जंत्र-मंत्र द्वारा मार डालनेके लिए प्रयोग। कृत्यादि = प्राणनाशिनी देवी आदि। जंता = जीतनेवाले। विभो = समर्थ। तमारी = सूर्य। भावार्थ—हे बन्दरोंके राजा हनुमानजी, तुम्हारी जय हो। तुम सिंहके समान पराक्रमी, देवताओंमें श्रेष्ठ, आनन्द और कल्याणके स्थान तथा कपाल- धारी शिवके अवतार हो। मोह, मद, क्रोध, काम आदि दुष्टोंसे परिपूर्ण घोर संसाररूपी रात्रिके लिए तुम सूर्य हो ॥१॥ हे अंजनीरूपी अदिति (देव-माता) से उत्पन्न होकर सुशोभित होनेवाले, तुम्हारी जय हो। तुम्हारा जन्म बन्दर केशरीरूपी कश्यप प्रजापतिसे हुआ है। तुम संसारके दुःखोंको हरनेवाले हो। हे कल्याणकारी हनुमानजी ! तुम लोक और लोकपालरूपी चकवा तथा कमल- का शोक हरनेवाले सूर्य हो ॥२॥ तुम्हारी जय हो। तुम्हारा शरीर बड़ा विशाल और विकराल है; तुम्हारे भारी भुजदण्ड और सर्वांगकी रचना वज्रके सार पदार्थसे हुई है। वज्रके समान तुम्हारे सुन्दर नख और दाँत सुशोभित हो रहे हैं। तुम्हारी पूँछ बहुत लम्बी है; तुम शत्रुओंका संहार करनेके लिए अस्त्र-शस्त्र धारण किये रहते हो; तुम पर्वतको भी हाथमें लिये रहते हो ॥३॥ हे सीताजीकी चिन्ताओं और दुःखोंको हरनेवाले, तुम्हारी जय हो। तुम राम-लक्ष्मणके आनन्दरूपी कमलको प्रफुल्लित करनेवाले हो। तुम बन्दर स्वभावसे हँसी-खेलमें ही अपनी पूँछसे लंका-दहन करने तथा अशोक-वनको बर्बाद करनेके लिए मध्याह्नकालीन सूर्य हो ॥४॥ तुम्हारी जय हो ! तुम समुद्रपर पत्थरका जहाज (पुल) तैयार करके राक्षसोंके बड़े भारी हर्षके हंता हो। तुम दुष्ट रावण, कुम्भकर्ण और मेघनादके मर्मस्थानोंको भेदकर उन्हें उनके कर्मोंका फल देनेवाले हो ॥५॥ हे त्रिभुवनके अपूर्व भूषण ! तुम्हारी जय हो ! तुम विभीषणको वर देनेवाले और संग्राममें श्रीरामजीके साथ यशःपूर्ण कार्य करनेवाले हो। तुम पुष्पक विमानपर बैठे हुए लक्ष्मण और सीताके सहित सूर्यवंशके सूर्य श्रीरामचन्द्रकी कीर्ति-पताका हो ॥६॥ तुम्हारी जय हो ! तुम दूसरोंके द्वारा किये गये यन्त्र-मन्त्र अभिचार (मोहन-उच्चा- टन) प्रयोगोंको ग्रसनेवाले तथा किसीको मार डालनेके लिए गुप्त प्रयोगों तथा

प्राणघातिनी कृत्या आदि देवियोंका हनन करनेवाले हो । तुम शाकिनी, डाकिनी, पूतना, प्रेत, बैताल, भूत और प्रमथ आदिके समूहको जीतनेवाले हो ॥७॥ तुम्हारी जय हो ! तुम वेदान्त शास्त्रके ज्ञाता, अनेक विद्याओंमें पारंगत, चारों वेद (ऋक्, यजु, साम, अथर्वण) और वेदांग (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष) के जानकार तथा ब्रह्म-निरूपण करनेवाले हो। हे विभो ! तुम ज्ञान-विज्ञान और वैराग्यभाजन हो। शुकदेव और नारद आदि तुम्हारे निर्मल गुणोंका गान करते हैं ॥८॥ तुम्हारी जय हो। तुम काल (क्षण, दिन, मास, वर्ष आदि), गुण (सत्त्व, रज, तम), कर्म (कायिक, वाचिक, मान- सिक अथवा संचित, प्रारब्ध, और क्रियमाण, या शुभ और अशुभ अथवा कर्म, अकर्म और विकर्म) तथा मायाको दूर करनेवाले हो। तुम्हारा ज्ञान और व्रत अचल है। तुम सत्यमें रत रहते और धर्मपर चलते हो। सिद्ध, देव-समूह तथा बड़े-बड़े योगी तुम्हारी सदा सेवा किया करते हैं। हे भव-भयरूपी निशाका नाश करनेके लिए सूर्यरूप हनुमानजी ! तुलसीदास तुम्हें प्रणाम करता है ॥९॥ विशेष १—'विभीषण-वरद'—लंका-दहनके समय विभीषणने अपनी दुःख-गाथा श्रीहनुमानजीको सुनायी थी, उसे सुनकर हनुमानजीने विभीषणको आशीर्वाद- रूप वरदान देते हुए कहा था कि परम कृपालु श्रीरामचन्द्रजी तुम्हारा दुःख अवश्य दूर करेंगे । २—'माया'—क्या है, इसे गोस्वामीजीके ही शब्दोंमें देखिये:— मैं अरु मोर तोर तैं माया। जेहि बस कीन्हें जीव निकाया ॥ गो गोचर जहँ लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई ॥ (रामचरितमानस) ( २७ ) जयति मंगलागार संसार-भारापहर, बानराकार विग्रह पुरारी । राम रोषानल-ज्वालमाला-मिष ध्वांतचर-सलभ-संहारकारी ॥१॥ जयति मरुदंजनामोद-मंदिर, नतग्रीव सुग्रीव-दुःखैक-बंधो। जातुधानोद्धत-क्रुद्ध-कालाग्निहर, सिद्ध-सुर-सज्जनानंद-सिंधो ॥२॥

४८ विनय-पत्रिका जयति रुद्राग्रनी, विश्व-विद्याग्रनी, विश्व विख्यात-भट चक्रवर्ती। सामगाताग्रनी कामजेताग्रनी, रामहित, रामसेवकसुवर्ती ॥३॥ जयति संग्राम-जय, रामसंदेसहर, कौसला-कुसल-कल्यानभाषी। राम-विरहार्क-संतप्त-भरतादि, नरनारि शीतल करन कल्पसाखी ॥४॥ जयति सिंहासनासीन सीतारमन, निरखि निर्भर हरष नृत्यकारी। राम संभ्राज सोभा-सहित सर्वदा तुलसिमानस रामपुर-बिहारी ॥५॥ शब्दार्थ—मिष = बहानेसे। ध्वांतचर = राक्षस। सलभ = पतङ्ग, पतिंगे। मरुदंजना- मोद (मरुत+अंजन+आमोद) पवन और अंजनीको प्रमुदित करनेवाले। नतग्रीव = गर्दन झुकाये हुए। भट = योद्धा। चक्रवर्ती = सम्राट्। सामगाताग्रनी = सामवेदका गान करने- वालोंमें श्रेष्ठ। संदेसहर = संदेशिया या संदेशा कहनेवाला। विरहार्क = विरहरूपी सूर्य। निर्भर = पूर्ण, अत्यन्त। संभ्राज = सुशोभित। भावार्थ—हे मंगलके गृह तथा संसारका भार हरनेवाले हनुमानजी, तुम्हारी जय हो ! तुम्हारे शरीरका आकार बन्दरकी तरह है, पर हो तुम साक्षात् विश्व- स्वरूप। तुम श्रीरामजीके क्रोधरूपी अग्निकी ज्वालमालाके बहाने निशाचर-रूपी पतंगोंका संहार करनेवाले हो ॥१॥ हे पवन और अंजनीके आमोद-मन्दिर ! तुम्हारी जय हो ! नीची गर्दन किये हुए सुग्रीवके दुःखके तुम अद्वितीय साथी थे। तुम उद्धत राक्षसोंके क्रुद्ध कालाग्निका नाश करनेवाले तथा सिद्धों, देवताओं और सज्जनोंके लिए आनन्दके समुद्र हो ॥२॥ तुम्हारी जय हो ! तुम एकादश रुद्रमें अग्रणी, समस्त संसारकी विद्यामें अग्रगण्य तथा संसार-प्रसिद्ध योद्धाओंके चक्रवर्ती राजा (सम्राट्) हो। तुम सामवेदका गान करनेवालोंमें अग्रणी हो, कामदेवको जीतनेवालोंमें सबसे पहले गिने जाने योग्य हो। तुम श्रीरामजीके हितकारी और रामभक्तोंकी रक्षा करनेवाले हो ॥३॥ तुम्हारी जय हो ! तुम समरमें विजय-लाभ करनेवाले, श्रीरामजीका सन्देशा (जानकीके पास) ले जाने- वाले, अयोध्याकी कुशल और कल्याण (भरतजी तथा अयोध्यापुर-वासियोंसे) कहनेवाले हो। तुम रामचन्द्रके विरह-रूपी सूर्यसे सन्तप्त भरत आदि स्त्री-पुरुषोंको शीतल करनेके लिए कल्पवृक्ष हो ॥४॥ हे राज्यसिंहासनपर सुशोभित जानकीनाथ श्रीरामजीको देखकर अत्यन्त हर्षके साथ नृत्य करनेवाले ! तुम्हारी जय हो ! हे

विनय-पत्रिका ४९ रामकी पुरी अयोध्यामें विहार करनेवाले हनुमानजी ! तुम रामचन्द्रकी शोभाके सहित (समाज-सहित) इस तुलसीदासके अन्तःकरणमें सदा विराजमान रहो । विशेष १—'रुद्र'—एकादश रुद्रके नाम ये हैं:—अज, एकपात्, अहिब्रध्न, पिनाकी, अपराजित, त्र्यम्बक, महेश्वर, वृषाकपि, शम्भु, हरण, ईश्वर । २—'रामभक्तानुवर्त्ती—इसका एक अर्थ यह भी हो सकता है कि हनुमान- जी राम-भक्तोंकी अधीनतामें रहनेवाले हैं; अर्थात् वह अपनेको रामभक्तोंके हाथमें बिका हुआ समझते हैं। ( २८ ) जयति वात-संजात, विख्यात विक्रम, बृहद्- बाहु, बलविपुल, वालधि बिसाला । जातरूपाचलाकार विग्रह, लसल्लोम विद्युल्लता ज्वालमाला ॥१॥ जयति बालार्क वर-वदन, पिंगल-नयन, कपिस-कर्कस-जटाजूटधारी । विकट भृकुटी, बज्र दसन नख, बैरि-मद- मत्त-कुंजर-पुंज-कुंजरारी ॥२॥ जयति भीमार्जुन-ग्याल सूदन-गर्व- हर, धनंजय-रथ-त्राण-केतू । भीष्म द्रोण-कर्णादि-पालित, काल- हक सुयोधन-चमू-निधन-हेतू ॥३॥ जयति गतराजदातार, हन्तार संसार-संकट, दनुज-दर्पहारी । ईति अति भीति-ग्रह-प्रेत-चौरानल- व्याधि-बाधा-शमन-घोरमारी ॥४॥ ४

२. देवी, गंगा, यमुना व काशी-चित्रकूट स्तुति

५० विनय-पत्रिका जयति निगमागम व्याकरण करन लिपि, काव्य कौतुक-कला-कोटि-सिंधो । साम-गायक, भक्त-कामदायक, वामदेव, श्रीराम-प्रिय-प्रेम-बंधो ॥५॥ जयति घर्मांसु-संदग्ध-संपाति, नवपच्छ-लोचन-दिव्य-देहदाता । कालकलि-पाप संताप-संकुल सदा, प्रनत तुलसीदास तात-माता ॥६॥ शब्दार्थ- वात = पवन । संजात = उत्पन्न। बालधि = पूँछ। जातरूपाचलाकार = (जातरूप+अचल+अकार) सुवर्णके पर्वत (सुमेरु) का आकार। लसल्लोम (लसत्+ लोम) रोम सुशोभित है। पिंगल = पीला । कपिस = भूरा । जूट = जूड़ा। ब्यालसूदन = गरुड़। धनंजय = अर्जुन । ईति = खेतीकी छ बाधाएँ-अतिवृष्टि, अनावृष्टि, टिड्डी, चूहे, पक्षी और राजाका आक्रमण। घोरमारी = महामारीकी बीमारी। घर्मांसु (घर्म+अंशु) प्रखर किरनवाले। नवपच्छ = नया पंख। तात = पिता। भावार्थ- हे पवन-कुमार ! तुम्हारी जय हो ! तुम्हारा पराक्रम विख्यात है, भुजाएँ विशाल हैं, बल असीम है और पूँछ बड़ी लम्बी है। तुम्हारा शरीर सुमेरु पर्वतके आकारका है, उसपर विद्युल्लताकी ज्वालमालाके समान रोम सुशोभित हो रहे हैं ॥१॥ जय हो ! तुम्हारा श्रेष्ठमुख प्रभातकालीन सूर्यके समान है, नेत्र पीले हैं और तुम भूरे रंगका कठोर जटाजूट धारण किये रहते हो । तुम्हारी भौंहें टेढ़ी हैं, दाँत और नख वज्रके समान हैं। तुम शत्रुरूपी मदमत्त हाथियोंके लिए सिंहके समान हो ॥२॥ तुम्हारी जय हो ! तुम भीम, अर्जुन और गरुड़के गर्वको चूर्ण करनेवाले तथा अर्जुनके रथकी पताकापर बैठकर उसकी रक्षा करने- वाले हो । तुम भीष्म, द्रोणाचार्य और कर्ण आदिसे रक्षित, कालकी दृष्टिके समान दुर्योधनकी सेनाका संहार करनेके मुख्य कारण हो ॥३॥ जय हो ! तुम सुग्रीवके गये हुए राज्यको दिलानेवाले, सांसारिक संकटोंका नाश करनेवाले और दानवों- के दर्पको कुचल डालनेवाले हो । ईति, अत्यन्त डर, ग्रह, प्रेत, चोर, आग तथा रोगकी बाधाओं एवं महामारीका नाश करनेवाले हो ॥४॥ तुम्हारी जय हो ! तुम वेद, शास्त्र और व्याकरणको लिपिबद्ध करनेवाले (अथवा उनपर भाष्य लिखने-

विनय-पत्रिका ५१ वाले) तथा काव्यके दस अंगों एवं करोड़ों कलाओंके समुद्र हो । तुम सामवेदका गान करनेवाले तथा भक्तोंकी कामना पूरी करनेवाले शिवरूप हो और रामजीके प्रिय प्रेमी बन्धु हो ॥५॥ तुम्हारी जय हो ! तुम सूर्यकी प्रखर किरणोंसे जले हुए सम्पाति नामक गीधको नवीन पर (पंखे) नेत्र और दिव्य शरीर देनेवाले हो । कलिकालके पाप-सन्तापोंसे सदा परिपूर्ण यह तुलसीदास तुम्हें प्रणाम करता है; क्योंकि पिता-माता तुम्हीं हो ! ॥६॥ विशेष १—'जटाजूटधारी'—हनुमान्जी भगवान् शिवजीके अवतार हैं, इसीसे उन्हें जटाजूटधारी कहा गया है । अन्यथा वानर रूपके लिए जटाजूटधारी कहना असंगत होता । २—'भीमार्जुन-ब्यालसूदन गर्वहर'—महाभारतमें कथा है कि पाण्डवोंके वनवासकालमें एक दिन भीम अपने बलके मदमें मस्त कहीं जाँ रहे थे । रास्तेमें उन्हें एक बन्दर मिला । भीमने उससे रास्ता छोड़नेके लिए कहा । बन्दरने कहा,—मैं बूढ़ा हूँ, उठने बैठनेमें कष्ट होता है, तुम्हीं मेरी पूँछ हटाकर चले जाओ । भीमसेनने क्रुद्ध होकर उसे घसीटकर रास्तेसे दूर कर देना चाहा । पर पूरी शक्ति लगानेपर भी उस बन्दरकी पूँछ नहीं हिली । इससे भीमको मन ही मन बहुत लज्जित होना पड़ा । पीछे जब उन्हें यह मालूम हुआ कि यह बन्दर हनुमान् है, तो उन्होंने उन्हें नम्रतापूर्वक प्रणाम किया । इसी प्रकार एक बार भीमने हनुमान्जीसे कहा कि आपने जिस रूपसे राम-रावण युद्धमें भाग लिया था, उस रूपका मुझे दर्शन दें । हनुमानने कहा,—मेरा वह रूप बड़ा ही विकराल है, अतः तुम उसे देखकर डर जाओगे । यह सुनकर भीमने गर्वके साथ फिर आग्रह किया । तुरन्त ही हनुमानजीने वह रूप धारण कर लिया । भयके कारण भीमसेनकी आँखें बन्द हो गयीं । वह थर-थर काँपने लगे । दो बार हनुमानजीकी महिमा देखकर उनका गर्व मिट गया ओर वह हाथ जोड़कर उनके चरणोंपर गिर पड़े । इसो प्रकार एक बार अर्जुनका गर्व भी चूर हुआ था । महाभारत-युद्धमें जब अर्जुन महापराक्रमी कर्णके रथपर बाण चलाते, तब उसका रथ बहुत दूर

चला जाता था, किन्तु कर्णके बाणसे अर्जुनका रथ कई अंगुलमात्र हटकर रह जाता था। इसपर सारथी रूपमें बैठे हुए भगवान् श्रीकृष्ण हर बार कहा करते, धन्य हो कर्ण ! भगवान्‌का यह वचन अर्जुनके लिए असह्य हो उठा। उन्होंने सोचा कि मेरे बाणसे कर्णका रथ इतनी दूर चला जानेपर भी श्रीकृष्णने मुझे एक बार भी शाबासी नहीं दी, किन्तु उनके बाणसे मेरा रथ कुछ अंगुल खिसकनेपर ही यह हर बार उसकी प्रशंसा करते हैं। अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुनका यह भाव समझ गये। उन्होंने हनुमानजीसे ध्वजा छोड़कर हट जानेके लिए इशारा किया। हनुमानजीके हटते ही कर्णके बाणसे अर्जुनका रथ बहुत दूर जा गिरा। अर्जुनने व्याकुल होकर भगवान्‌से इसका कारण पूछा। भगवान्‌ने कहा,-हनुमानजीके पराक्रमसे तुम्हारा रथ स्थिर रहता है, इस समय वह ध्वजाके ऊपरसे हट गये हैं। कुशल थी कि मैं बैठा हुआ था; नहीं तो तुम्हारा रथ न-जानें कहाँ जाकर गिरता। भगवान्‌की बात सुनकर अर्जुनका अभिमान दूर हो गया। स्कन्दपुराणमें लिखा है कि एक बार विष्णु भगवान्‌ने हनुमानजीको बुलाने- के लिए गरुड़से कहा। हनुमानने गरुड़से कहा,-आप चलें, मैं थोड़ी देरके बाद यहाँसे चलूँगा। गरुड़ने साथ ही चलनेके लिए कहा। हनुमानने कहा,- पीछे चलनेपर भी मैं आपसे पहले वहाँ पहुँच जाऊँगा। गरुड़को यह बात बहुत बुरी लगी, क्योंकि उन्हें अपनी तीव्र गतिका बड़ा गर्व था। वह शीघ्र पहुँचनेके लिए बड़ी तेजीसे चले। उन्होंने भगवान्‌के पास पहुँचकर देखा :-हनुमानजी विराजमान हैं। यह देखकर वह बहुत लज्जित हुए। ३-'करनलिपि'-हनुमानजीने सूर्य भगवान्‌से विद्याध्ययन किया था। इन्होंने वेदों और शास्त्रोंपर भाष्य, पिंगलकी टीका तथा वेदांगोंपर भी कई ग्रंथ लिखे थे। हनुमन्नाटक, हनुमत् ज्योतिष आदि कई ग्रंथ आज भी संस्कृत साहित्यमें उपलब्ध हैं।—चित्रकाव्यके आदि आविष्कारक भी यही थे। ४-'सम्पाति'-यह गीधराज जटायुका छोटा भाई था। एक दिन दोनों भाई होड़ लगाकर सूर्यको छूनेके लिए आकाशमें उड़े। जटायु बुद्धिमान् था, इसलिए वह सूर्यमण्डलके समीप जाकर उनका तेज न सह सकनेके कारण लौट आया—; परन्तु अभिमानी सम्पाति आगे ही बढ़ता गया। परिणाम यह