भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

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पृष्ठ 48

विनय-पत्रिका ३७ यदि तू श्रीरामजीके चरणोंमें प्रेम चाहता है, तो उपाधि-रहित नेमसे चित्रकूट पर्वतका सेवन कर । विशेष १—'बारी' शब्दका प्रयोग बिहार, संयुक्तप्रान्त और अवधमें बगीचेके अर्थमें ही किया जाता है। यथा 'बारी बगीचा' 'खेती-बारी'। वास्तवमें यह शब्द ऐसे बगीचोंके लिए आता है, जिनमें श्रेणी-बद्ध वृक्ष क्यारियोंमें नहीं लगे रहते; अथवा कुछ वृक्ष श्रेणीबद्ध लगे हुए होते हैं, और कुछ यत्र-तत्र लगे रहते हैं। ऐसे बगीचेको भी 'बारी' ही कहते हैं। 'वियोगी हरि' ने 'बारी' शब्दका अर्थ किया है, 'खेतों या वृक्षोंके चारों तरफ लगाये हुए कांटेदार पेड़, जिनसे पशु आदिसे उनकी रक्षा रहती है।' यह अर्थ करनेमें आपने बुन्देलखंडी भाषा- की शरण ली है। २—'थप्यो थिर प्रभाव'—श्रीरामजीके निवाससे चित्रकूटकी महिमा बहुत बढ़ गयी, इसीसे वाल्मीकिजीने श्रीरामजीसे चित्रकूटमें रहनेकी प्रार्थना की थी। यथा:— 'चलहु सफल सुभ सबकर करहू। राम देहु गौरव गिरिवरहू ॥' जहाँ-जहाँ श्रीरामजीका चरण पड़ा, वह भूमि धन्य हो गयी। जैसे:— 'धन्य भूमि वन पंथ पहारा। जहँ-जहँ नाथ पाउँ तुम्ह धारा ॥' ३—'मंदाकिनि-मालिनि...बात' सब टीकाकारोंने इसका अर्थ बड़ा ही विचित्र किया है। मालिनके ही जलसे चित्रकूट वृक्षका सिंचन कराया है। वियोगी हरिजी भला कब चूकने लगे ? इन्होंने तो ऐसा अर्थ लिखा है जिससे कोई बात ही स्पष्ट नहीं होती । राग कान्हरा [ २४ ] अब चित चेति चित्रकूटहिं चलु । कोपित कलि, लोपित मंगल मगु, विलसत बढ़त मोह-माया-मलु ॥१॥ भूमि बिलोकु राम-पद अंकित, बन बिलोकु रघुबर-विहार-थलु । सैल-सृंग भवभंग-हेतु लखु, दलन कपट-पाखंड-दंभ-दलु ॥२॥