भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 49

३८ विनय-पत्रिका जहँ जनमे जग-जनक जगतपति, विधि-हरि-हर परिहरि प्रपंच छल । सकृत प्रबेस करत जेहि आश्रम, बिगत-विषाद भये पारथ नलु ॥३॥ न करु विलम्ब विचारु चारुमति, बरष पाछिले सम अगिले पलु । मंत्र सो जाइ जपहि जो जपि भे, अजर अमर हर अचइ हलाहलु ॥४॥ रामनाम-जप-जाग करत नित, मज्जत पय पावन पीवत जलु । करिहैं राम भावतो मन को, सुख-साधन, अनयास महाफलु ॥५॥ कामद मनि कामता-कलप तरु, सो जुग-जुग जागत जगतीतलू । तुलसी तोहि बिसेषि बूझिये, एक प्रतीति-प्रीति एकै वलु ॥६॥ शब्दार्थ - भवभंग = संसार-बन्धनसे छुटकारा। सकृत = एक बार। पारथ = पृथाके पुत्र युधिष्ठिर आदि। नलु = राजा नल। अचई = पीकर। कामद = सब इच्छाएँ पूरी करनेवाला। जगतीतलू = पृथ्वीतलपर। भावार्थ - हे चित्त, अब तू चेतकर चित्रकूटको चल। कलिने कुपित होकर कल्याण-मार्गों (ज्ञान, भक्ति, वैराग्यादि) का लोप कर दिया है। इससे मोह, माया और पापोंकी वृद्धि विशेषरूपसे शोभा पा रही है ॥१॥ चल, रे चित्त, तू श्रीरामजीके चरणोंसे अंकित भूमिको देख; श्रीरघुनाथजीके विहार-स्थल वनका अवलोकन कर। वहाँ कपट, पाखंड और दम्भके समूहका नाश करनेवाले तथा संसार-बन्धनसे मुक्त करनेके कारणस्वरूप पर्वतके शिखरोंको देख ॥२॥ जहाँ जगत्पिता जगदीश्वर ब्रह्मा, विष्णु और महेशने छल-प्रपंच छोड़कर जन्म लिया है, जिस आश्रममें एक बार प्रवेश करते ही युधिष्ठिरादि पाण्डवों तथा राजा नलका दुःख दूर हो गया था ॥३॥ वहाँ चलनेमें देर न कर और अच्छी बुद्धिसे विचार तो कर कि शेष आयुका प्रत्येक पल बीती हुई आयुके वर्षके समान है। वहाँ जाकर तू उस मन्त्रको जप जिसे जपकर शंकरजी हलाहल विष पीनेपर भी अजर और अमर हो गये ॥४॥ यदि तू वहाँ नित्यप्रति रामनामका जपरूपी यज्ञ करता रहेगा, तपस्विनी नदीके पवित्र जलमें स्नान करता रहेगा तथा उसका जल पीता रहेगा, तो श्रीरामजी तेरी मनोवाञ्छा पूरी कर देंगे और इस सुखमय साधनसे तुझे अनायास ही महाफल (अपने चरणोंमें भक्ति) प्रदान करेंगे ॥५॥ चित्रकूटमें कामतानाथ पर्वत ही सब इच्छाएँ पूरी करनेवाला कल्पवृक्ष और चिन्तामणि है; वह युग-युगसे पृथ्वीतलपर प्रकाशमान है। यों तो चित्रकूटका प्रभाव प्रत्येक