विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२ विनय-पत्रिका बड़े-बड़े योद्धारूपी तिलोंकी घानी डालकर पेर डाला है ॥७॥ हे रावण, कुम्भकर्ण और मेघनादके नाशके कारण, तथा कालनेमि राक्षसको मारनेवाले, तुम्हारी जय हो। तुम असम्भवको सम्भव और सम्भवको असम्भव कर दिखाने- में बड़े ही विकराल हो। तुम पृथ्वी, पाताल, जल और आकाशमें गमन करने- वाले हो ॥८॥ हे जगतप्रसिद्ध वाणैत, तुम्हारी जय हो। पण्डित और वेद विमल वाणीसे तुम्हारी गुणावलीका वर्णन करते हैं। तुम तुलसीदासके भयको नाश करनेवाले श्रीसीतारमणके साथ अयोध्यापुरीमें सदा शोभायमान रहते हो ॥९॥ विशेष १—'जयति अंजनी गर्भ-अंभोधि···' में रूपक अलङ्कार है। २—'केसरी'-नामक वानरकी स्त्रीका नाम अंजनी था। एक दिन अंजनी शृङ्गार किये खड़ी थी। इतनेमें पवनदेव वहाँ आये और उसके रूपलावण्यपर मुग्ध हो गये। उन्हींके वीर्यसे अंजनीके गर्भसे हनुमानजीका जन्म हुआ। इसीसे इन्हें 'केसरी-नन्दन' भी कहते हैं ? यहाँ उसी केसरीका नाम आया है। ३—'ग्रासकर्ता'—अमावस्याका दिन था और प्रातःकालका समय। हनुमान- जीको बहुत भूख लगी थी। वह उगते हुए सूर्यको लाल फल जानकर उनकी ओर लपके और देखते-देखते पकड़कर निगल गये। उस दिन ग्रहण भी था। सूर्यको न देखकर राहु बहुत निराश हुआ और इन्द्रके पास पहुँचकर बोला, आज मैं क्या खाऊँगा ? सूर्यको किसी दूसरेने ही खा डाला। यह सुनते ही इन्द्र दौड़े। उन दोनोंको आते देखकर हनुमानजीने उनको भी निगलनेके लिए हाथ बढ़ाया। इतनेमें इन्द्रने उनपर वज्र चलाया, पर वज्र उनकी ठुड्डीमें लगा। इससे वह मूर्च्छित हो गये और वज्र भी टूट गया। तभीसे महावीरजीका नाम हनुमान पड़ा। यह कथा वाल्मीकीय रामायणके उत्तरकाण्डमें लिखी है। ४—'राहु रवि···खर्बीकरन'—जिस समय राहु देवराज इन्द्रके साथ आ रहा था, उस समय हनुमानजी उसको काला फल समझकर उसकी ओर लपके थे। इससे राहु भयभीत होकर भाग गया था। सूर्यको वह पहले ही निगल चुके थे। उनका प्रभाव देखकर इन्द्र भी डर गये थे। जो वज्र पहाड़ोंको