विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतोड़ डालता, उससे महावीरजीकी केवल दाढ़ी मात्र जरा-सी टेढ़ी हो गयी, इससे वज्रका भी गर्व चूर हो गया। ५—'रुद्र अवतार'—शिवजीने श्रीरामजीसे दासभावसे सेवा करनेके लिए वर माँगा था। तदनुसार ही समय पाकर वे हनुमानके रूपमें श्रीरामजीके सेवक बने। इसीसे हनुमानजी एकादश रुद्र माने जाते हैं। ६—'आशिषाकार वपु'—जिस समय इन्द्रके वज्रसे हनुमानजी मूर्च्छित हो गये थे, उस समय उनके पिता पवनने कुपित होकर अपनी गति बन्द कर दी थी। इससे विश्व-ब्रह्माण्ड थर्रा उठा। इन्द्रादिक देवताओंके प्रार्थना करनेपर ब्रह्मा बहुत-से देवताओं और मुनियोंको साथ लेकर वायुके पास गये और महा- वीरके मस्तकपर हाथ फेरा। उनकी कृपासे महावीरकी मूर्च्छा दूर हो गयी। उसके बाद देवताओं और मुनियोंने हनुमानजीको आशीर्वाद दिया। इसीसे उन्हें 'आशिषाकार वपु' कहा गया है। यह कथा भी वाल्मीकीय-रामायणके उत्तरकाण्डमें है। ७—'बालि...बधमुख्यहेतू'—जब भगवान् सीताको ढूँढ़ते हुए ऋष्यमूक पर्वतके पास पहुँचे तो पहले हनुमानजी उनसे मिले और उनको ले जाकर सुग्रीवसे मैत्री करायी। वह मैत्री बालि-वधका कारण हुई। ८—'सिंहिका-मद-मथन'—सिंहिका राक्षसी समुद्रमें रहती थी और आकाशमार्गसे जानेवाले जीवोंकी परछाईं जलमें देखकर उन्हें पकड़कर खा जाती थी। उसने हनुमानजीको भी पकड़कर निगलना चाहा। किन्तु हनुमानजीने एक मुक्का मारकर उसका प्राण लिया। ९—'दसकंठ...कारन'—यदि हनुमानजी महारानी जानकीजीकी खबर श्रीरामजीको न सुनाते तो रावणादिका बध न होता। इसीसे रावणादिके बधके कारण कहे गये हैं। दूसरी बात यह भी है कि युद्धके समय जब रावण विजय प्राप्त करनेके लिए यज्ञका अनुष्ठान करने लगा, तो विभीषणने रामचन्द्रकी सेनामें इसकी सूचना दी। कहा कि यदि रावण इस अनुष्ठानमें सफल हो जायगा तो उसपर विजय पाना अत्यन्त कठिन हो जायगा। इसलिए उसके यज्ञको विध्वंस करना चाहिए। इस कामका भार हनुमान्जीने अपने ऊपर लिया और थोड़ी-सी सेना साथ ले जाकर उस यज्ञको विध्वंस कर दिया। पश्चात् रावण युद्ध-क्षेत्रमें