विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्राणघातिनी कृत्या आदि देवियोंका हनन करनेवाले हो । तुम शाकिनी, डाकिनी, पूतना, प्रेत, बैताल, भूत और प्रमथ आदिके समूहको जीतनेवाले हो ॥७॥ तुम्हारी जय हो ! तुम वेदान्त शास्त्रके ज्ञाता, अनेक विद्याओंमें पारंगत, चारों वेद (ऋक्, यजु, साम, अथर्वण) और वेदांग (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष) के जानकार तथा ब्रह्म-निरूपण करनेवाले हो। हे विभो ! तुम ज्ञान-विज्ञान और वैराग्यभाजन हो। शुकदेव और नारद आदि तुम्हारे निर्मल गुणोंका गान करते हैं ॥८॥ तुम्हारी जय हो। तुम काल (क्षण, दिन, मास, वर्ष आदि), गुण (सत्त्व, रज, तम), कर्म (कायिक, वाचिक, मान- सिक अथवा संचित, प्रारब्ध, और क्रियमाण, या शुभ और अशुभ अथवा कर्म, अकर्म और विकर्म) तथा मायाको दूर करनेवाले हो। तुम्हारा ज्ञान और व्रत अचल है। तुम सत्यमें रत रहते और धर्मपर चलते हो। सिद्ध, देव-समूह तथा बड़े-बड़े योगी तुम्हारी सदा सेवा किया करते हैं। हे भव-भयरूपी निशाका नाश करनेके लिए सूर्यरूप हनुमानजी ! तुलसीदास तुम्हें प्रणाम करता है ॥९॥ विशेष १—'विभीषण-वरद'—लंका-दहनके समय विभीषणने अपनी दुःख-गाथा श्रीहनुमानजीको सुनायी थी, उसे सुनकर हनुमानजीने विभीषणको आशीर्वाद- रूप वरदान देते हुए कहा था कि परम कृपालु श्रीरामचन्द्रजी तुम्हारा दुःख अवश्य दूर करेंगे । २—'माया'—क्या है, इसे गोस्वामीजीके ही शब्दोंमें देखिये:— मैं अरु मोर तोर तैं माया। जेहि बस कीन्हें जीव निकाया ॥ गो गोचर जहँ लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई ॥ (रामचरितमानस) ( २७ ) जयति मंगलागार संसार-भारापहर, बानराकार विग्रह पुरारी । राम रोषानल-ज्वालमाला-मिष ध्वांतचर-सलभ-संहारकारी ॥१॥ जयति मरुदंजनामोद-मंदिर, नतग्रीव सुग्रीव-दुःखैक-बंधो। जातुधानोद्धत-क्रुद्ध-कालाग्निहर, सिद्ध-सुर-सज्जनानंद-सिंधो ॥२॥