विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८ विनय-पत्रिका जयति रुद्राग्रनी, विश्व-विद्याग्रनी, विश्व विख्यात-भट चक्रवर्ती। सामगाताग्रनी कामजेताग्रनी, रामहित, रामसेवकसुवर्ती ॥३॥ जयति संग्राम-जय, रामसंदेसहर, कौसला-कुसल-कल्यानभाषी। राम-विरहार्क-संतप्त-भरतादि, नरनारि शीतल करन कल्पसाखी ॥४॥ जयति सिंहासनासीन सीतारमन, निरखि निर्भर हरष नृत्यकारी। राम संभ्राज सोभा-सहित सर्वदा तुलसिमानस रामपुर-बिहारी ॥५॥ शब्दार्थ—मिष = बहानेसे। ध्वांतचर = राक्षस। सलभ = पतङ्ग, पतिंगे। मरुदंजना- मोद (मरुत+अंजन+आमोद) पवन और अंजनीको प्रमुदित करनेवाले। नतग्रीव = गर्दन झुकाये हुए। भट = योद्धा। चक्रवर्ती = सम्राट्। सामगाताग्रनी = सामवेदका गान करने- वालोंमें श्रेष्ठ। संदेसहर = संदेशिया या संदेशा कहनेवाला। विरहार्क = विरहरूपी सूर्य। निर्भर = पूर्ण, अत्यन्त। संभ्राज = सुशोभित। भावार्थ—हे मंगलके गृह तथा संसारका भार हरनेवाले हनुमानजी, तुम्हारी जय हो ! तुम्हारे शरीरका आकार बन्दरकी तरह है, पर हो तुम साक्षात् विश्व- स्वरूप। तुम श्रीरामजीके क्रोधरूपी अग्निकी ज्वालमालाके बहाने निशाचर-रूपी पतंगोंका संहार करनेवाले हो ॥१॥ हे पवन और अंजनीके आमोद-मन्दिर ! तुम्हारी जय हो ! नीची गर्दन किये हुए सुग्रीवके दुःखके तुम अद्वितीय साथी थे। तुम उद्धत राक्षसोंके क्रुद्ध कालाग्निका नाश करनेवाले तथा सिद्धों, देवताओं और सज्जनोंके लिए आनन्दके समुद्र हो ॥२॥ तुम्हारी जय हो ! तुम एकादश रुद्रमें अग्रणी, समस्त संसारकी विद्यामें अग्रगण्य तथा संसार-प्रसिद्ध योद्धाओंके चक्रवर्ती राजा (सम्राट्) हो। तुम सामवेदका गान करनेवालोंमें अग्रणी हो, कामदेवको जीतनेवालोंमें सबसे पहले गिने जाने योग्य हो। तुम श्रीरामजीके हितकारी और रामभक्तोंकी रक्षा करनेवाले हो ॥३॥ तुम्हारी जय हो ! तुम समरमें विजय-लाभ करनेवाले, श्रीरामजीका सन्देशा (जानकीके पास) ले जाने- वाले, अयोध्याकी कुशल और कल्याण (भरतजी तथा अयोध्यापुर-वासियोंसे) कहनेवाले हो। तुम रामचन्द्रके विरह-रूपी सूर्यसे सन्तप्त भरत आदि स्त्री-पुरुषोंको शीतल करनेके लिए कल्पवृक्ष हो ॥४॥ हे राज्यसिंहासनपर सुशोभित जानकीनाथ श्रीरामजीको देखकर अत्यन्त हर्षके साथ नृत्य करनेवाले ! तुम्हारी जय हो ! हे