विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 60, कुल 475 में से
संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ४९ रामकी पुरी अयोध्यामें विहार करनेवाले हनुमानजी ! तुम रामचन्द्रकी शोभाके सहित (समाज-सहित) इस तुलसीदासके अन्तःकरणमें सदा विराजमान रहो । विशेष १—'रुद्र'—एकादश रुद्रके नाम ये हैं:—अज, एकपात्, अहिब्रध्न, पिनाकी, अपराजित, त्र्यम्बक, महेश्वर, वृषाकपि, शम्भु, हरण, ईश्वर । २—'रामभक्तानुवर्त्ती—इसका एक अर्थ यह भी हो सकता है कि हनुमान- जी राम-भक्तोंकी अधीनतामें रहनेवाले हैं; अर्थात् वह अपनेको रामभक्तोंके हाथमें बिका हुआ समझते हैं। ( २८ ) जयति वात-संजात, विख्यात विक्रम, बृहद्- बाहु, बलविपुल, वालधि बिसाला । जातरूपाचलाकार विग्रह, लसल्लोम विद्युल्लता ज्वालमाला ॥१॥ जयति बालार्क वर-वदन, पिंगल-नयन, कपिस-कर्कस-जटाजूटधारी । विकट भृकुटी, बज्र दसन नख, बैरि-मद- मत्त-कुंजर-पुंज-कुंजरारी ॥२॥ जयति भीमार्जुन-ग्याल सूदन-गर्व- हर, धनंजय-रथ-त्राण-केतू । भीष्म द्रोण-कर्णादि-पालित, काल- हक सुयोधन-चमू-निधन-हेतू ॥३॥ जयति गतराजदातार, हन्तार संसार-संकट, दनुज-दर्पहारी । ईति अति भीति-ग्रह-प्रेत-चौरानल- व्याधि-बाधा-शमन-घोरमारी ॥४॥ ४