विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५० विनय-पत्रिका जयति निगमागम व्याकरण करन लिपि, काव्य कौतुक-कला-कोटि-सिंधो । साम-गायक, भक्त-कामदायक, वामदेव, श्रीराम-प्रिय-प्रेम-बंधो ॥५॥ जयति घर्मांसु-संदग्ध-संपाति, नवपच्छ-लोचन-दिव्य-देहदाता । कालकलि-पाप संताप-संकुल सदा, प्रनत तुलसीदास तात-माता ॥६॥ शब्दार्थ- वात = पवन । संजात = उत्पन्न। बालधि = पूँछ। जातरूपाचलाकार = (जातरूप+अचल+अकार) सुवर्णके पर्वत (सुमेरु) का आकार। लसल्लोम (लसत्+ लोम) रोम सुशोभित है। पिंगल = पीला । कपिस = भूरा । जूट = जूड़ा। ब्यालसूदन = गरुड़। धनंजय = अर्जुन । ईति = खेतीकी छ बाधाएँ-अतिवृष्टि, अनावृष्टि, टिड्डी, चूहे, पक्षी और राजाका आक्रमण। घोरमारी = महामारीकी बीमारी। घर्मांसु (घर्म+अंशु) प्रखर किरनवाले। नवपच्छ = नया पंख। तात = पिता। भावार्थ- हे पवन-कुमार ! तुम्हारी जय हो ! तुम्हारा पराक्रम विख्यात है, भुजाएँ विशाल हैं, बल असीम है और पूँछ बड़ी लम्बी है। तुम्हारा शरीर सुमेरु पर्वतके आकारका है, उसपर विद्युल्लताकी ज्वालमालाके समान रोम सुशोभित हो रहे हैं ॥१॥ जय हो ! तुम्हारा श्रेष्ठमुख प्रभातकालीन सूर्यके समान है, नेत्र पीले हैं और तुम भूरे रंगका कठोर जटाजूट धारण किये रहते हो । तुम्हारी भौंहें टेढ़ी हैं, दाँत और नख वज्रके समान हैं। तुम शत्रुरूपी मदमत्त हाथियोंके लिए सिंहके समान हो ॥२॥ तुम्हारी जय हो ! तुम भीम, अर्जुन और गरुड़के गर्वको चूर्ण करनेवाले तथा अर्जुनके रथकी पताकापर बैठकर उसकी रक्षा करने- वाले हो । तुम भीष्म, द्रोणाचार्य और कर्ण आदिसे रक्षित, कालकी दृष्टिके समान दुर्योधनकी सेनाका संहार करनेके मुख्य कारण हो ॥३॥ जय हो ! तुम सुग्रीवके गये हुए राज्यको दिलानेवाले, सांसारिक संकटोंका नाश करनेवाले और दानवों- के दर्पको कुचल डालनेवाले हो । ईति, अत्यन्त डर, ग्रह, प्रेत, चोर, आग तथा रोगकी बाधाओं एवं महामारीका नाश करनेवाले हो ॥४॥ तुम्हारी जय हो ! तुम वेद, शास्त्र और व्याकरणको लिपिबद्ध करनेवाले (अथवा उनपर भाष्य लिखने-