विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ५१ वाले) तथा काव्यके दस अंगों एवं करोड़ों कलाओंके समुद्र हो । तुम सामवेदका गान करनेवाले तथा भक्तोंकी कामना पूरी करनेवाले शिवरूप हो और रामजीके प्रिय प्रेमी बन्धु हो ॥५॥ तुम्हारी जय हो ! तुम सूर्यकी प्रखर किरणोंसे जले हुए सम्पाति नामक गीधको नवीन पर (पंखे) नेत्र और दिव्य शरीर देनेवाले हो । कलिकालके पाप-सन्तापोंसे सदा परिपूर्ण यह तुलसीदास तुम्हें प्रणाम करता है; क्योंकि पिता-माता तुम्हीं हो ! ॥६॥ विशेष १—'जटाजूटधारी'—हनुमान्जी भगवान् शिवजीके अवतार हैं, इसीसे उन्हें जटाजूटधारी कहा गया है । अन्यथा वानर रूपके लिए जटाजूटधारी कहना असंगत होता । २—'भीमार्जुन-ब्यालसूदन गर्वहर'—महाभारतमें कथा है कि पाण्डवोंके वनवासकालमें एक दिन भीम अपने बलके मदमें मस्त कहीं जाँ रहे थे । रास्तेमें उन्हें एक बन्दर मिला । भीमने उससे रास्ता छोड़नेके लिए कहा । बन्दरने कहा,—मैं बूढ़ा हूँ, उठने बैठनेमें कष्ट होता है, तुम्हीं मेरी पूँछ हटाकर चले जाओ । भीमसेनने क्रुद्ध होकर उसे घसीटकर रास्तेसे दूर कर देना चाहा । पर पूरी शक्ति लगानेपर भी उस बन्दरकी पूँछ नहीं हिली । इससे भीमको मन ही मन बहुत लज्जित होना पड़ा । पीछे जब उन्हें यह मालूम हुआ कि यह बन्दर हनुमान् है, तो उन्होंने उन्हें नम्रतापूर्वक प्रणाम किया । इसी प्रकार एक बार भीमने हनुमान्जीसे कहा कि आपने जिस रूपसे राम-रावण युद्धमें भाग लिया था, उस रूपका मुझे दर्शन दें । हनुमानने कहा,—मेरा वह रूप बड़ा ही विकराल है, अतः तुम उसे देखकर डर जाओगे । यह सुनकर भीमने गर्वके साथ फिर आग्रह किया । तुरन्त ही हनुमानजीने वह रूप धारण कर लिया । भयके कारण भीमसेनकी आँखें बन्द हो गयीं । वह थर-थर काँपने लगे । दो बार हनुमानजीकी महिमा देखकर उनका गर्व मिट गया ओर वह हाथ जोड़कर उनके चरणोंपर गिर पड़े । इसो प्रकार एक बार अर्जुनका गर्व भी चूर हुआ था । महाभारत-युद्धमें जब अर्जुन महापराक्रमी कर्णके रथपर बाण चलाते, तब उसका रथ बहुत दूर