विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४० विनय-पत्रिका 'राम-पद-प्रेम' ही माँगा है—मोक्ष नहीं। इससे सिद्ध होता है कि ग्रन्थकारको 'महाफलु'का अर्थ 'राम-पद-प्रेम' ही अभिप्रेत है। हनुमत्-स्तुति राग धनाश्री [ २५ ] जयति-अंजनी-गर्भ-अंभोधि-संभूत-बिधु, विबुध-कुल कैरवानन्दकारी। केसरी-चारु-लोचन-चकोरक-सुखद, लोकगन सोक-संतापहारी ॥१॥ जयति जय बालकपि केलि-कौतुक उदित चंडकर-मंडल-ग्रास-कर्त्ता। राहु-रवि-सक्र पवि-गर्व-खर्बीकरन सरन भयहरन जय भुवन-भर्त्ता॥२॥ जयति रनधीर, रघुबीर-हित, देवमनि, रुद्र-अवतार, संसार-पाता। विप्र-सुर-सिद्ध-मुनि-आशिषाकारवपु, विमलगुन, बुद्धि-वारिधि-विधाता ३ जयति सुग्रीव सिच्छादि रच्छन-निपुन, वालि-बल-सालि-बध-मुख्यहेतू। जलधि-लंघन सिंह सिंहिका-मद-मथन, रजनिचर-नगर-उत्पात-केतू॥४॥ जयति भूतनन्दिनी-सोच-मोचन विपिन-दलन घननादवस विगत संका। लूम लीला अनल-ज्वालमाला-कुलित, होलिकाकरन लंकेस-लंका॥५॥ जयति सौमित्रि-रघुनंदनानंदकर, ऋच्छ-कपि कटक-संघट-विधायी। बद्ध-वारिधि-सेतु, अमर-मंगल हेतु, भानुकुल-केतु-रनविजयदायी ॥६॥ जयति जय वज्र तनु दसन नख मुख विकट, चंड-भुजदंड तरु-सैल-पानी। समर-तैलिक-यंत्र तिल-तमीचर-निकर, पेरि डारे सुभट घालि घानी ॥७॥ जयति दसकंठ-घटकरन-वारिद-नाद-कदन-कारन, कालनेमि-हंता। अघट घटना-सुघट सुघट-विघटन विकट,भूमि-पाताल-जल-गगन-गंता॥८ जयति विस्व-विख्यात चानैत-विरुदावली, विदुष वरनत वेद विमल वानी। दास तुलसी-त्रास-समन सीतारमन, संग सोभित राम-राजधानी ॥९॥ शब्दार्थ—विबुध = देवता । कैरवानन्दकारी = कुमुदिनीको विकसित करनेवाले । चंड- कर = प्रचण्ड किरणवाले सूर्य । ग्रासकर्त्ता = निगल जानेवाले । सक्र = इन्द्र । पवि = वज्र ।