भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 45

३४ विनय-पत्रिका करती है । उस चारेको खाकर यह कामधेनु मोक्ष-रूपी पवित्र दूध देती है । उसे वे मरनेवाले प्राणी पीते हैं । वह मोक्षरूपी दूध इतना दुर्लभ है कि उसके लिए संसारमें उदासीन महात्मागण झींखते हैं ॥८॥ पुराणोंका कथन है कि भगवान् बिन्दुमाधवने अपने हाथोंसे इसकी रचना की है, उनकी यह कारीगरी कलारूप है । तुलसीदास कहते हैं कि यदि तू अपना कल्याण चाहता है तो काशीमें रहकर श्रीरामजीका नाम जप ॥९॥ विशेष १—'अंतर्गृही'—पद्मपुराणमें काशीके चार विभाग किये गये हैं । काशी, वाराणसी, अविमुक्त और अन्तर्गृही । मध्यमेश्वर और देहली विनायकके बीच मण्डलाकार भूमिको काशी कहा गया है । यहाँ मृत्यु होनेसे सालोक्य (शिवलोक) मुक्ति प्राप्त होती है । उत्तरमें वरुणा, दक्षिणमें असी नदी, पूरबमें गङ्गाजी और पश्चिममें पाशपाणि गणेशके बीचकी भूमिको वाराणसी कहते हैं । यहाँ मृत्यु होनेसे सारूप्य मुक्ति होती है । विश्वनाथजीके चारों ओर दो सौ धन्वा (एकधन्वा = ४ हाथ) का दायरा अविमुक्त कहलाता है । यहाँकी मृत्युसे साम्निध्य (सामीप्य) मुक्ति प्राप्त होती है । पश्चिम गोकर्णेश, पूरब गङ्गा, उत्तर भारभूत और दक्षिण ब्रह्मेश, इसके बीचकी भूमिको शिवजीका अन्तर्गृह माना गया है । यहाँकी मृत्युसे साक्षात् कैवल्य अर्थात् शिवस्वरूपकी प्राप्ति होती है । गोस्वामीजीने यहाँ उसी अन्तर्गृहीका उल्लेख किया है । २—'करनघंट'—काशीमें एक शिव-भक्त ब्राह्मण था । वह शिवजीके सिवा दूसरे किसी भी देवताका नाम नहीं सुनना चाहता था । इसीसे उसने अपने दोनों कानोंमें घंटे लटका रखे थे ताकि उसे किसी दूसरेका नाम सुनाई न पड़े । यदि कोई मनुष्य उसके सामने किसी दूसरेका नाम लेता तो वह घंटा बजाते हुए दूर भाग जाता । इसीसे उसका नाम 'करनघंट' पड़ गया था । जिस स्थानपर वह रहता था, वह स्थान काशीमें आज भी कर्णघंटाके नामसे प्रसिद्ध है । ३—'पंचाच्छरी'—'नमः शिवाय' यही पंचाक्षरी मन्त्र है । १—'प्राण'—पाँच हैं:—प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान ।