विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ४२३ विशेष १—'नाथकी महिमा'—राम-नामकी महिमा इतनी अधिक है— नाम्नां सहस्रं दिव्यानां स्मरणे यत् फलं लभेत् । तत्फलं लभते नूनं रामोच्चारणमात्रतः ॥ —ब्रह्मवैवर्त । [ २५७ ] दीनबन्धु ! दूरि किये दीन को न दूसरी सरन । आपको भले हैं सब, आपने को कोऊ कहूँ, सब को भलो है राम ! रावरो चरन ॥१॥ पाहन, पसु, पतंग, कोल, भील, निसिचर काँच ते कृपानिधान किये सुबरन । दंडक-पुहुमि पाय परसि पुनीत भई, उकठे बिटप लागे फूलन-फरन ॥२॥ पतित-पावन नाम बाम हू दाहिनो, देव ! दुनी न दुसह-दुख-दूषन-दरन । सीलसिंधु तोसों ऊँची-नीचियौ कहत सोभा, तो सो तुहीं तुलसी को आरति-हरन ॥३॥ शब्दार्थ—पतंग = पक्षी । पुहुमि = पृथिवी । उकठे = सूखे हुए । बिटप = वृक्ष । आरति = दुःख । हरन = हरनेवाले । भावार्थ—हे दीनबन्धु ! यदि आपने इस दीनको दूर कर दिया तो फिर इसे दूसरी शरण न मिलेगी । क्योंकि यों तो आप-आपके सभी अच्छे हैं, पर अपने भक्तोंके लिए विरले ही लोग अच्छे हैं। किन्तु हे रामजी ! आपके चरण सबके लिए अच्छे हैं, अर्थात् भक्तोंके लिए तो अच्छे हैं ही, अभक्तोंके लिए भी अच्छे हैं। क्योंकि चरणोंके प्रतापसे ही बालि तर गया था ॥१॥ हे कृपानिधान ! आपने पाषाणी (अहिल्या), पशु (रीछ, बन्दर), पक्षी (जटायु), कोल-भील तथा राक्षसोंको काँचसे सुवर्ण बना दिया । दंडक वनकी भूमि आपके चरणोंका स्पर्श होते ही पुनीत हो गयी और वहाँके उकठे हुए पेड़-(हरे-भरे होकर) फूलने-फलने