विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२४ विनय-पत्रिका लगे ॥२॥ हे देव ! पतितोंको पवित्र करनेवाला आपका नाम आपसे विमुख रहनेवालोंके लिए भी अनुकूल हो जाता है (शत्रु भावसे भी रामका नाम लेने- वाले लोग तर जाते हैं) । संसारमें दुस्सह दुःखों और दोषोंका नाश करनेवाला आपके सिवा और कोई नहीं है। आप शीलके समुद्र हैं। आपसे ऊँची-नीची बात कहनेमें भी शोभा है (अर्थात् आप दुःख और दोष मिटानेवाले हैं, सुशील हैं, अतः आपसे भला-बुरा कहना शोभा देता है; क्योंकि ऐसोंसे कहना किस कामका जो दुःख भी दूर न करें और उलटा दिल्लगी भी उड़ावें ? अथवा उन लोगोंसे कहना भी बेकार है, जो भला-बुरा सुनकर सहन न कर सकें। तुलसीके दुःखको दूर करनेवाले तो बस आपके समान आप ही हैं (दूसरा कोई नहीं) ॥३॥ विशेष १—'पाहन'—अहिल्या; ४३ पदके विशेषमें देखिये । २—'पन्नग'—जटायु; २१५ पदके विशेषमें देखिये । ३—'दंडक-पुहुमि······पुनीत भई'—एक बार दुर्भिक्ष पड़नेपर सब ऋषि अपने-अपने आश्रमोंको छोड़कर गौतम ऋषिके आश्रममें जाकर रहने लगे । दुर्भिक्ष मिट जानेपर सब ऋषियोंने गौतम ऋषिसे विदा माँगी । गौतम ऋषिने उनको वहीं रहनेके लिए कहा और अन्यत्र जानेके लिए मना किया । इसपर उन ऋषियोंने मायाकी एक गाय बनाकर गौतम ऋषिके खेतमें खड़ी कर दी । ऋषिके हाँकनेके लिए जानेपर वह गाय वहीं गिरकर मर गयी । इससे सब ऋषियोंने उनपर गो-हत्याका दोष लगाया । इस प्रकार जब वे दोष लगाकर जाने लगे, तब गौतम ऋषि योगबलसे उनकी माया ताड़ गये और क्रुद्ध होकर शाप दे दिया कि तुम लोग जहाँ जाना चाहते हो, वह देश अपवित्र और नष्ट-भ्रष्ट हो जायगा । तभीसे वह दंडक वनके नामसे प्रसिद्ध हुआ । वहाँके हरे- भरे वृक्ष सूख गये और वह प्रदेश वीरान हो गया । भगवान् रामचन्द्रका पदार्पण होनेपर वह उजड़ा हुआ प्रदेश फिर पूर्ववत् हरा-भरा होकर पवित्र हुआ । २५८ ] जानि पहिचानि मैं बिसारे हौं कृपानिधान ! एतो मान ढीठ हौं उलटि देत खोरि हौं।