विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
४२४ विनय-पत्रिका लगे ॥२॥ हे देव ! पतितोंको पवित्र करनेवाला आपका नाम आपसे विमुख रहनेवालोंके लिए भी अनुकूल हो जाता है (शत्रु भावसे भी रामका नाम लेने- वाले लोग तर जाते हैं) । संसारमें दुस्सह दुःखों और दोषोंका नाश करनेवाला आपके सिवा और कोई नहीं है। आप शीलके समुद्र हैं। आपसे ऊँची-नीची बात कहनेमें भी शोभा है (अर्थात् आप दुःख और दोष मिटानेवाले हैं, सुशील हैं, अतः आपसे भला-बुरा कहना शोभा देता है; क्योंकि ऐसोंसे कहना किस कामका जो दुःख भी दूर न करें और उलटा दिल्लगी भी उड़ावें ? अथवा उन लोगोंसे कहना भी बेकार है, जो भला-बुरा सुनकर सहन न कर सकें। तुलसीके दुःखको दूर करनेवाले तो बस आपके समान आप ही हैं (दूसरा कोई नहीं) ॥३॥ विशेष १—'पाहन'—अहिल्या; ४३ पदके विशेषमें देखिये । २—'पन्नग'—जटायु; २१५ पदके विशेषमें देखिये । ३—'दंडक-पुहुमि······पुनीत भई'—एक बार दुर्भिक्ष पड़नेपर सब ऋषि अपने-अपने आश्रमोंको छोड़कर गौतम ऋषिके आश्रममें जाकर रहने लगे । दुर्भिक्ष मिट जानेपर सब ऋषियोंने गौतम ऋषिसे विदा माँगी । गौतम ऋषिने उनको वहीं रहनेके लिए कहा और अन्यत्र जानेके लिए मना किया । इसपर उन ऋषियोंने मायाकी एक गाय बनाकर गौतम ऋषिके खेतमें खड़ी कर दी । ऋषिके हाँकनेके लिए जानेपर वह गाय वहीं गिरकर मर गयी । इससे सब ऋषियोंने उनपर गो-हत्याका दोष लगाया । इस प्रकार जब वे दोष लगाकर जाने लगे, तब गौतम ऋषि योगबलसे उनकी माया ताड़ गये और क्रुद्ध होकर शाप दे दिया कि तुम लोग जहाँ जाना चाहते हो, वह देश अपवित्र और नष्ट-भ्रष्ट हो जायगा । तभीसे वह दंडक वनके नामसे प्रसिद्ध हुआ । वहाँके हरे- भरे वृक्ष सूख गये और वह प्रदेश वीरान हो गया । भगवान् रामचन्द्रका पदार्पण होनेपर वह उजड़ा हुआ प्रदेश फिर पूर्ववत् हरा-भरा होकर पवित्र हुआ । २५८ ] जानि पहिचानि मैं बिसारे हौं कृपानिधान ! एतो मान ढीठ हौं उलटि देत खोरि हौं।
विनय-पत्रिका ४२५ करत जतन जासों जोरिबेको जोगी जन, तासों क्यों हू जुरी, सो अभागो बैठो तोरि हौं ॥१॥ मोसे दोस-कोसको भुवन-कोस दूसरो न, अपनी समझि सूझि आयो टकटोरि हौं। गाड़ी के स्वान की नाईं, माया मोहकी बड़ाई, छिनहिं तजत, छिन भजत बहोरिहौं ॥२॥ बड़ो साईं-द्रोही न बराबरी मेरी को कोऊ, नाथ की सपथ किये कहत करोरि हौं। दूरि कीजै द्वार तें लबार लालची प्रपंची, सुधा-सो सलिल सूकरी ज्यों गद्होरि हौं ॥३॥ राखिये नीके सुधारि, नीचको डारिये मारि, दुहूँ ओर की विचारि, अब न निहोरि हौं ॥ तुलसी कही है साँची रेख बार-बार खाँची, ढील किये नाम-महिमाकी नाव बोरि हौं ॥४॥ शब्दार्थ-कोस = कोष, खजाना । भुवन-कोस = चौदहो भुवन या तीनों लोक । टकटोरि = टटोलना, ढूँढ़ना । बहोरि = फिर । लवार = झूठा । गद्होरि हौं = मथकर गँदला कर डालूँगा । भावार्थ-हे कृपानिधान ! मैंने जान-पहचानकर आपको भुला दिया है; मुझे इतना अभिमान हो गया है और मैं इतना ढीठ हो गया हूँ कि उलटा आपको दोष देता हूँ (कि आप कृपानिधान होकर भी मुझपर कृपा नहीं कर रहे हैं) । जिससे नाता जोड़नेके लिए योगी लोग यत्न किया करते हैं, उससे यदि थोड़ी-सी प्रीति जुड़ी भी थी, तो मैं अभागा उसे तोड़ बैठा ॥१॥ अपनी सूझ और समझके अनुसार मैं टटोल आया, पर चौदहो भुवन या तीनों लोकमें मुझसा दोषोंका खजाना दूसरा कोई नहीं है। गाड़ीके (पीछे लगे हुए) कुत्तेकी नाईं कभी तो मैं माया-मोहके बड़प्पनको क्षणभरमें ही छोड़ देता हूँ, और फिर क्षणभरमें उसीको भजने लगता हूँ (अर्थात् जैसे गाड़ीके पीछे लगा हुआ कुत्ता कभी तो गाड़ीको छोड़कर दूर निकल जाता है, और कभी उसके साथ हो लेता
४२६ विनय-पत्रिका है, वही दशा मेरी है) ॥२॥ हे नाथ ! मैं आपकी (एक नहीं) करोड़ों शपथ करके कहता हूँ कि मैं बड़ा भारी स्वामि-द्रोही हूँ, मेरी बराबरीका (स्वामि-द्रोही) कोई नहीं है। इसलिए मुझ झूठे, लालची और प्रपंचीको आप अपने द्वारसे दूर कर दीजिये, नहीं तो मैं अमृतके समान जलको सूकरीकी तरह मथकर गँदला कर डालूँगा (आपके पवित्र यशको मलीन बना दूँगा) ॥३॥ दोनों ओरकी बातोंपर विचार करके या तो मुझे अच्छी तरह सुधारकर (अपनी शरणमें) रखिये, और या मुझ नीचको मार डालिये। (यदि आप इन दोनों बातोंमेंसे एक भी न करेंगे, तो) अब मैं आपका निहोरा न करूँगा। तुलसीने बार-बार लकीर खींचकर सच्ची बात कही है। यदि आप ढिलाई करेंगे तो मैं आपके नामकी महिमाका जहाज डुबो दूँगा। भाव यह है कि संसार कहने लगेगा कि तुलसी राम-नाम रटता ही रहा, पर कुछ न हुआ; इसलिए रामनामकी जो बड़ी भारी महिमा ग्रन्थोंमें लिखी हुई है, वह झूठी है ॥४॥ विशेष १—'राखिये・・・・・'निहोरिहौं'—इसमें कविकी हार्दिक झुँझलाहट दिखाई पड़ती है। २—'ढील किये・・・・・बोरिहौं'—शपथपूर्वक मजेदार धमकी है। ऐसी ही धमकी भक्तवर सूरदासजीने भी दी है— आजु हौं एक एक करि टरि हौं। कै हम ही कै तुम ही माधव, अपुन भरोसे लरिहौं ॥ हौं तो पतित अहौं पीढ़िन को, पतित ह्वै निस्तरिहौं । अब हौं उघरि नचन चाहत हौं, तुम्हें बिरद बिनु करिहौं ॥ कत अपनी परतीति नसावत मैं पायो हरि हीरा। सूर पतित तब ही लै उठिहै जब हँसि दैहौ बीरा ॥ [ २५९ ] रावरी सुधारी जो बिगारी बिगरेगी मेरी, कहौं, बलि, बेद की न, लोक कहा कहैगो ?
विनय-पत्रिका ४२७ प्रभुको उदास-भाउ, जनको पाप-प्रभाउ, दुहूँ भाँति दीनबन्धु ! दीन दुख दहैगो ॥१॥ मैं तो दियो छाती पवि, लयो कलिकाल दबि, साँसति सहत, परवस को न सहैगो ? बाँकी विरुदावली बनेगी पाले ही कृपालु ! अन्त मेरो हाल हेरि यों न मन रहैगो ॥२॥ करमी-धरमी साधु-सेवक, बिरत-रत, आपनी भलाई थल कहाँ कौन लहैगो ? तेरे मुँह फेरे मोसे कायर-कपूत-कूर, लटे लटपटनि को कौन परिगहैगो ? ॥३॥ काल पाय फिरत दसा दयालु ! सब ही की, तोहि बिनु मोहि कबहूँ न कोऊ चहैगो । वचन-करम-हिये कहौं राम ! सौंह किये, तुलसी पै नाथके निबाहेई निबहैगो ॥४॥ शब्दार्थ—पवि = वज्र । लटे = थके हुए, गिरे हुए । लटपटनि = लटपटाये हुए । परिगहैगो = ग्रहण करेगा । सौंह = शपथ । भावार्थ—यदि आपकी सुधारी हुई या बनायी हुई बात मेरे बिगाड़नेसे बिगड़ जायगी तो मैं आपकी बलैया लेकर कहता हूँ—वेदोंकी तो नहीं कहता किन्तु भला संसार क्या कहेगा ? (अर्थात् वेद चाहे जो कहें, पर संसार यही कहेगा कि तुलसीने रामजीकी बनायी हुई बातको भी बिगाड़ दिया) हे प्रभो ! यदि आपका उदासीन भाव रहा अथवा सेवकके पापने ही अपना प्रभाव दिखाया, तो हे दीनबन्धो ! दोनों ही प्रकारसे यह गरीब दुःखाग्निसे जलेगा ॥१॥ मैंने तो वज्रका आघात सहनेके लिए छाती खोल दी है, क्योंकि कलिकालने दबा लिया है । मैं कष्ट सह रहा हूँ । (यदि आप कहें कि क्यों कष्ट सह रहा है, तो) भला ऐसा कौन परतन्त्र मनुष्य है जो न सहेगा ? किन्तु हे कृपालु ! आपको अपनी बाँकी बिरदावलीका पालन करना ही पड़ेगा (अर्थात् मुझे उबारना ही पड़ेगा) । क्योंकि अन्तमें मेरा हाल देखकर आपका मन ऐसा न रहेगा (तात्पर्य यह कि
४२८ . विनय-पत्रिका अवश्य पिघल जायगा) ॥२॥ कर्मनिष्ठ, धर्मात्मा, साधु, सेवक, विरक्त और (संसारमें) रत ये सब अपने-अपने सत्कर्मोंके अनुसार कहाँ और कौनसा स्थान प्राप्त न कर सकेंगे ? किन्तु आपके मुँह फेरनेपर मुझ सरीखे कायर, कपूत, क्रूर, लटे हुए और लटपटाये हुए लोगोंको कौन अंगीकार करेगा ? ॥३॥ हे दयालु ! समय पाकर सबकी दशा फिरती है, किन्तु मुझे तो आपके बिना कोई कभी न पूछेगा । हे रामजी ! मैं शपथ खाकर वचन, कर्म और मनसे कहता हूँ कि इस तुलसीकी तो आपहीके निभानेसे निभेगी ॥४॥ [ २६० ] साहिब उदास भये दास खास खीस होत मेरी कहा चली ? हौं बजाय जाय रह्यो हौं । लोक में न ठाउँ ! परलोक को भरोसो कौन ? हौं तो, बलि जाउँ, रामनाम ही ते लह्यो हौं ॥१॥ करम, सुभाउ, काल, काम, कोह, लोभ, मोह, ग्राह अति गहनि गरीबी गाढ़े गह्यो हौं । छोरिबे को महाराज, बाँधिबे को कोटि भट, पाहि प्रभु ! पाहि, तिहुँ ताप-पाप दह्यो हौं ॥२॥ रीझि बूझि सबकी प्रतीति-प्रीति एही द्वार, दूध को जल्ह्यो पियत फूँकि फूँकि मह्यो हौं । रटत-रटत लठ्यो, जाति-पाँति-भाँति घट्यो जूठनि को लालची चहौं न दूध नह्यो हौं ॥३॥ अनत चह्यो न भलो, सुपथ सुचाल चल्यो नीके जिय जानि इहाँ भलो अनचह्यो हौं । तुलसी समुझि समुझायो मन बार-बार, अपनो सो नाथ हू सों कहि निरबह्यो हौं ॥४॥ शब्दार्थ—खीस = बर्बाद । हौं = हूँ । हौं = मैं । गाढ़े = दृढ़तासे । भट = योद्धा । प्रतीति = विश्वास । मह्यो = मट्ठा । अनत = अन्यत्र । भावार्थ—स्वामीके उदासीन होनेसे खास नौकर भी बर्बाद हो जाता है, मेरी
विनय-पत्रिका ४२१ तो गिनती ही क्या ! मैं तो बाजा बजाता हुआ (डंकेकी चोट) नष्ट हुआ जा रहा हूँ। जब इस लोकमें ही (मेरे लिए रहनेकी) जगह नहीं है, तो फिर मैं परलोक- का क्या भरोसा करूँ ? बलि जाऊँ, मैं तो केवल राम-नामकी ही शरणमें हूँ ॥१॥ कर्म, स्वभाव, काल, काम, क्रोध, लोभ और मोहरूपी बड़े-बड़े ग्राहोंने और गरीबीने मुझे दृढ़तासे पकड़ लिया है। हे महाराज ! बाँधनेके लिए तो करोड़ों योद्धा हैं, पर छुड़ानेके लिए केवल आप ही हैं। अतः हे प्रभो ! मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये ! मैं पापके तीनों तापोंसे जल रहा हूँ ॥२॥ लोगोंका रीझना समझकर मेरी प्रतीति और प्रीति इसी द्वारपर है। मैं तो दूधका जला हुआ हूँ, इसीसे मट्ठेको भी फूँक-फूँककर पीता हूँ। मैं रटते-रटते थक गया, जाति-पाँति और चाल-चलन भी नष्ट हो गयी। मैं तो केवल जूठनका लालची हूँ, दूधसे नहाना नहीं चाहता (अर्थात् मैं आपके चरणोंमें पड़े रहना चाहता हूँ, मुझे स्वर्गीय भोगोंकी इच्छा नहीं) ॥३॥ मैंने सुमार्गपर अच्छी चाल चलकर अन्यत्र अपनी भलाई नहीं चाही। यहाँ आपसे तिरस्कृत होनेपर भी मैं अच्छी तरह अपने दिलमें जानता हूँ कि मेरा भला है। इस बातको तुलसीने खूब समझकर अपने मनको बार-बार समझाया है, और वह उसे अपने स्वामीसे (आपसे) भी कहकर पाक हो गया है ॥४॥ [ २६१ ] मेरी न बनै बनाये मेरे कोटि कलप लौं राम ! रावरे बनाये बनै पल पाउ मैं । निपट सयाने हौ कृपानिधान ! कहा कहौं ? लिये बेर बदलि अमोल मनि आउ मैं ॥१॥ मानस मलीन, करतब कलिमल पीन जीह हू न जप्यो नाम, बक्यो राउ-राउ मैं । कुपथ कुचाल चल्यो, भयो न भूले हूँ भलो, बाल-दसा हू न खेल्यो खेलत सुदाउ मैं ॥२॥ देखा-देखी दम्भ तें कि संग तें भई भलाई, प्रगटि जनाई, कियो दुरित-दुराउ मैं ।
४३० विनय-पत्रिका राग रोष द्वेष पोषे, गोगन समेत मन, इनकी भगति कीन्ही इन ही को भाउ मैं ॥३॥ आगिली-पाछिली, अब हूँ की अनुमान ही तें, बूझियत गति, कछु कीन्हों तो न काउ मैं । जग कहै रामकी प्रतीति-प्रीति तुलसी हू, झूठे-साँचे आसरो साहब रघुराउ मैं ॥४॥ शब्दार्थ—आउ = आयु । पीन = पुष्ट । आउ-बाउ = आव-बाव, अनाप-शनाप । दुरित = पाप । दुराउ = छिपाव । गो-गन = इन्द्रियाँ । भावार्थ—हे राम ! मेरे बनानेसे मेरी करोड़ों कल्पतक न बनेगी । किन्तु आपके बनानेसे मेरी पाव (चौथाई) पलमें ही बन जायगी । आप परम चतुर हैं । हे कृपानिधान ! मैं क्या कहूँ ! मैंने तो अनमोल मणिरूपी आयुके बदलेमें (विषयरूप) बेर ले लिये ॥१॥ मेरा मानस मलिन हो गया है और कर्तब कलियुगी पापोंसे पुष्ट हो गया है; जीभने भी रामनामका जप नहीं किया, वह आयँ-बायँ बकती रही । कुमार्गपर कुचालें चलता रहा, भूलकर भी अच्छा काम न बन पड़ा । बचपनमें भी खेलते समय मैंने अच्छा दाव नहीं खेला ॥२॥ किसीकी देखादेखी, दम्भसे, या सत्संगसे यदि कोई अच्छा काम हो गया, तो उसे प्रत्यक्ष रूपसे लोगोंको जनाया और पापोंको छिपा लिया । मैंने राग, द्वेष, क्रोध और इन्द्रियोंके सहित मनका पोषण किया, इन्हींकी भक्ति की और इन्हींका भाव (आदर) किया ॥३॥ मैंने आगेकी (आनेवालेकी), पीछेकी (बीते हुएकी), और अबकी गतिका अनुमान करके समझ लिया कि मुझसे कभी कुछ नहीं बना, (और न बन सकता है) । संसार कहता है 'तुलसी रामका है' और यह तुलसी भी आपपर ही विश्वास और प्रेम रखता है । सच हो या झूठ, हे रघुनाथ स्वामी ! मैं तो आपहीके आसरे हूँ ॥४॥ [ २६२ ] कह्यो न परत, बिनु कहे न रह्यो परत, बड़ो सुख कहत बड़े सों, वलि, दीनता ।
विनय-पत्रिका ४३१ प्रभु की बड़ाई बड़ी, अपनी छोटाई छोटी, प्रभुकी पुनीतता, अपनी पाप-पीनता ॥१॥ दुहूँ ओर समुझि सकुचि सहमत मन, सनमुख होत सुनि स्वामी-समीचीनता । नाथ-गुनगाथ गाये, हाथ जोरि माथ नाये, नीचऊ निवाजे प्रीति-रीति की प्रबीनता ॥२॥ एही दरबार है गरब तें सरब-हानि, लाभ जोग-छेम को गरीबी-मिसकीनता । मोटो दसकन्ध सों न दूबरो बिभीसन सों, बूझि परी रावरे की प्रेम-पराधीनता ॥३॥ यहाँ को सयानप अयानप सहस सम, सूधौ सतभाय कहे मिटति मलीनता । गीध-सिला-सबरी की सुधि सब दिन किये होइगी न साईं सों सनेह-हित-हीनता ॥४॥ सकल कामना देत नाम तेरो कामतरु, सुमिरत होत कलिमल-छल-छीनता । करुनानिधान ? बरदान तुलसी चहत, सीतापत्ति-भक्ति-सुरसरि-नीर-मीनता ॥५॥ शब्दार्थ—समीचीनता = पुराना स्वभाव । प्रबीनता = कुशलता । मिसकीनता (अरबीका शब्द है) = नम्रता । अयानप = अज्ञानपन, मूर्खता । भावार्थ—कहा तो जाता नहीं, और बिना कहे भी रहा नहीं जाता । बलिहारी ! किन्तु बड़ेसे अपनी दीनता कहनेमें बड़ा आनन्द आता है । प्रभुकी बड़ी बड़ाई और अपनी छोटी (हल्की) छोटाई, प्रभुकी पवित्रता और अपने पापोंकी पुष्टता ॥१॥ दोनों ओरकी इन बातोंको समझकर मेरा मन सकुचकर सहम जाता है । किन्तु स्वामीका प्राचीन स्वभाव (दीनदयालुता, पतित-पावनता आदि) सुनकर यह मन सम्मुख होता है । नाथके गुणोंकी गाथा गानेसे, तथा हाथ जोड़कर मस्तक झुकानेसे आप नीचको भी प्रीतिकी रीति के कौशलसे
निहाल कर देते हैं ॥२॥ यही एक दरबार है जहाँ गर्वसे सर्वनाश हो जाता है, एवं गरीबी और नम्रतासे ही योग-क्षेम-(रक्षा) का लाभ होता है। रावणके समान मोटा और विभीषणके समान दुबला कोई नहीं था। किन्तु वहाँ मुझे आपकी प्रेम-पराधीनता समझ पड़ी। (अर्थात् आपने भक्त विभीषणको अपना लिया और रावणको मार डाला) ॥३॥ यहाँ (इस दरबार) का सयानापन हजारों मूर्खताके समान है। यहाँ तो सीधे और सत्य भावसे कहनेसे ही मलिनता दूर होती है। गीध, अहिल्या और शबरीकी सब दिन सुध करते रहनेसे स्वामीके प्रति स्नेहके सम्बन्धमें कमी न होगी ॥४॥ आपका नाम कल्पवृक्षके समान सारी कामनाएँ पूर्ण कर देता है। उसका स्मरण करते ही कलिके पाप और छल क्षीण हो जाते हैं। हे करुणानिधान ! श्री सीतानाथके भक्तिरूपी गंगाजलमें मछली (की तरह निमग्न) होनेके लिए यह तुलसी वरदान चाहता है ॥५॥
विशेष १—'अपनी छोटाई छोटी'—इसमें बड़ा ही सुन्दर भाव है। वियोगी हरिजीने इसका अर्थ किया है, 'अपनी छोटी-सी क्षुद्रता'। किन्तु यहाँ 'तुच्छाति- तुच्छ छोटापन अथवा 'अत्यन्त ओछी', 'बहुत बड़ी क्षुद्रता' यह आशय प्रकट करनेके लिए 'छोटी' शब्द प्रयुक्त हुआ है। यहाँ इसका अर्थ 'जरासी' या 'थोड़ी-सी' नहीं है। २—'गीध'—२१५ पदके विशेषमें देखिये। ३—'सिला'—४३ पदके विशेषमें देखिये। ४—'सबरी'—१०६ पदके विशेषमें देखिये।
[ २६३ ] नाथ नीके कै जानिवी ठीक जन-जीय की। रावरो भरोसो नाह कै सु-प्रेम-नेम लियो, रुचिर रहनि रुचि मति गति तीय की ॥१॥ कुकृत-सुकृत बस सब ही सों संग पन्यो, परखी परायी गति, आपने हूँ कीय की।
विनय-पत्रिका ४३३ मेरे भले को गोसाईं ! पोच को, न सोच-संक, हौं हूँ किये कहौं सौंह साँची सीय-पीय की ॥२॥ ग्यान हू-गिरा के स्वामी, बाहर-अन्तरजामी, यहाँ क्यों दुरैगी बात मुख की औ हीय की ? तुलसी तिहारो, तुम हीं पै तुलसी के हित, राखि कहौं हौं तो जो पै ह्वै हौं माखी घीय की ॥३॥ शब्दार्थ—जानिबी = जान लेना । कुकृत = बुरी करनी । कीय की = किये हुए की । पोच = नीच । भावार्थ—हे नाथ ! आप अपने सेवकके हृदयकी ठीक-ठीक बात अच्छी तरह समझ लीजिये। मेरी बुद्धिने सुन्दर रहन और रुचिवाली (पतिव्रता) स्त्रीकी गति धारण की है; उसने आपके भरोसे आपके साथ पतिका-सा प्रेम करनेका नेम कर लिया है ॥१॥ पाप और पुण्यवश सभीका साथ पड़ा है, अतः अपनी और परायी दोनोंकी गति परख चुका हूँ। हे स्वामिन् ! मुझ नीचको न तो (किसी बातका) सोच है और न मैंने शंका ही की; क्योंकि मेरी भलाई करनेके लिए तो आप हैं ही; यह बात मैं जानकी-वल्लभ श्रीरामजीका शपथ खाकर कहता हूँ ॥२॥ (यह बात मैं बनाकर नहीं कह रहा हूँ; क्योंकि मैं जानता हूँ कि) आप ज्ञान और वाणीके स्वामी हैं, तथा बाहर और भीतरकी बात जाननेवाले हैं; ऐसी दशामें हृदयकी और मुखकी बात आपसे कैसे छिपेगी ? अर्थात् हृदयमें कुछ और हो किन्तु मुखसे और ही कहा जाय, यह बात आपसे छिपी नहीं रह सकती । यह तुलसी आपका है और केवल आप ही तुलसीके हितू हैं; यदि मैं इसमें कुछ बनाकर कहता होऊँगा, तो घीकी मक्खी हो जाऊँगा । अर्थात् जिस प्रकार मक्खी घीमें पड़कर तुरन्त मर जाती है, उसी प्रकार मेरा सर्वनाश हो जायगा ॥३॥ [ २६४ ] मेरो कह्यो सुनि पुनि भावै तोहि करि सो । चारि हू बिलोचन बिलोकु तू तिलोक महँ तेरो तिहुँ काल कहु को है हितू हरि-सो ॥१॥ २८
४३४ विनय-पत्रिका नये-नये नेह अनुभये देह-गेह बसि, परखे प्रपंची प्रेम, परत उघरि सो। सुहृद-समाज दगाबाजीही को सौदा-सूत, जब जाको काज तब मिलै पाँय परि सो ॥२॥ बिबुध सयाने, पहिचाने कैधौं नाहीं नीके, देत एक गुन, लेत कोटि गुन भरि सो। करम-धरम श्रम-फल रघुबर बिनु, राखको सो होम है, ऊसर कैसो बरिसो ॥३॥ आदि-अंत-बीच भलो, भलो करै सब ही को, जाको जस लोक-बेद रह्यो है बगरिसो। सीतापति सारिखो न साहिब सील-निधान, कैसे कल परै सठ ! बैठो सो बिसरि-सो ॥४॥ जीवको जीवन, प्रान प्रानको परम हित प्रीतम, पुनीतकृत नीचन, निदरि सो। तुलसी ! तो को कृपालु जो कियो कोसलपालु, चित्रकूट को चरित्र चेतु चित करि सो ॥५॥ शब्दार्थ—अनुभये = अनुभव किया। उघरि = खुल गया। सौदा-सूत = लेन-देनका व्यवहार। बिबुध = देवता। बगरिसो = फैला-सा, बिखरा हुआ। कल = चैन। भावार्थ—रे मन ! (पहले) मेरी बात सुन ले, फिर तुझे जो अच्छा लगे, सो कर। तू अपने चारों नेत्रों (दो बाह्य चक्षु और दो मनश्चक्षु) से तीनों लोकमें देखकर बतला कि तीनों कालमें भगवान्के समान तेरा हितू कौन है ॥१॥ तूने शरीररूपी घरमें बसकर नये-नये स्नेहका अनुभव किया, कपटभरे प्रेमको परख लिया, उसका सब भेद खुल गया। मित्रोंकी मण्डलीमें दगाबाजीके ही लेन-देन- का व्यवहार है; जब जिसका काम होता है, तब वह पैरोंपर गिरकर मिलता है ॥२॥ देवता भी बड़े चतुर हैं; (कह नहीं सकता कि) तूने उन्हें पहचाना है या नहीं। वे (पहले) करोड़ गुना भरवा लेते हैं, (तब) एक गुना देते हैं। श्रीरघुनाथ- जीके बिना कर्म, धर्म करनेका.फल केवल श्रम ही हाथ लगता है। वह (कर्म,
विनय-पत्रिका ४३५ धर्म) राखमें हवन या ऊसर जमीनपर वर्षा करनेके समान (निष्फल) है ॥३॥ जो (रामजी) आदिमें अन्तमें और मध्यमें अच्छे हैं, जो सभीका भला करते हैं, और जिनका यश लोक और वेदमें फैल-सा रहा है, उन सीतापति रामचन्द्रके समान शील-निधान स्वामी दूसरा कोई नहीं है। रे दुष्ट ! (ऐसे स्वामीको) तू भूला-सा बैठा है; कैसे तुझे चैन पड़ रही है ? ॥४॥ जो (रामजी) जीवोंके जीवन, प्राणोंके प्राण, परम हितकारी, अत्यन्त प्रिय और नीचोंको पवित्र करनेवाले हैं, उनका तू निरादर कर रहा है। हे तुलसी ! कोशलपति कृपालु श्रीरामजीने तेरे लिए चित्र-कूटमें जो लीला रची थी, उसका चित्त देकर स्मरण कर ॥५॥ विशेष १—'चित्रकूटको चरित्र'—एक बार चित्रकूटमें गुसाईंजीको दो घुड़सवार राजकुमार एक मृगका पीछा करते हुए दिखाई पड़े। उस समय गुसाईंजी कुछ ध्यानावस्थित थे। ध्यानमें विघ्न पड़नेकी आशंकासे उन्होंने नेत्र बन्द करके मस्तक झुका लिया। थोड़ी देरके बाद हनुमान्जीने दर्शन देकर उनसे पूछा कि 'राम ओर लक्ष्मणके दर्शन मिले या नहीं ? जो दो राजकुमार घोड़ेपर चढ़कर गये हैं, वह श्रीरामजी ओर लक्ष्मणजी थे।' गुसाईंजी पछताने लगे। बोले— 'लोचन रहे बैरी होय । जानि-बूझि अकाज कीनो गये भू में गोय ॥ अविगत जु तेरी गति न जानी रह्यो जागत सोय । सबै छबि की अवधि में हैं निकसि गे ढिग होय ॥ करमहीन मैं पाय हीरा दियो पलमें खोय । दास तुलसी राम बिछुरे कहौ कैसी होय ॥' इस पदमें उक्त प्रत्यक्ष दर्शनकी ओर ही गोसाईंजीका संकेत है। [ २६५ ] तन सुचि, मन रुचि, मुख कहौँ 'जन हौं सिय-पीको'। केहि अभाग जान्यो नहीं, जो न होइ नाथ सों नातो-नेहु न नीको ॥१॥
४३६ विनय-पत्रिका जल चाहत पावक लहौं, विष होत अमी को । कलि-कुचाल संतनि कही सोइ सही, मोहि कछु फहम न तरनि तमी को ॥२॥ जानि अंध अंजन कहै बन-बाघिनी-घी को । सुनि उपचार बिकार को सुविचार करौं जब, तब बुधि बल हरै हीको ॥३॥ प्रभु सों कहत सकुचात हौं, परौं जनि फिरि फीको । निकट बोलि, बलि, बरजिये, परिहरै ख्याल अब तुलसिदास जड़ जीको ॥४॥ शब्दार्थ—फहम = ज्ञान । तरनि = सूर्य, प्रकाश । तमी = रात्रि, अन्धकार । बरजिये = मना कर दीजिए । जीको = जीव का । भावार्थ—हे प्रभो ! मैं शरीरको पवित्र और मनमें रुचि रखता हूँ; मुखसे भी कहता हूँ कि 'मैं जानकी-वल्लभ श्रीरघुनाथजीका सेवक हूँ'; फिर भी जानता नहीं कि किस दुर्भाग्यसे नाथके साथ मेरा भली-भाँति स्नेह-सम्बन्ध नहीं हो रहा है ॥१॥ चाहता हूँ जल, पाता हूँ आग ! (शान्तिकी जगह त्रिताप मिलता है) । इसी प्रकार मेरे लिए अमृतका भी विष हो जाता है (अर्थात् अमृतरूपी सत्कर्म अभिमानरूपी विष पैदा करता है) । सन्तोंने जो कलिकालकी कुचालें कही हैं, वे सही हैं । मुझे प्रकाश और अन्धकारका कुछ भी ज्ञान नहीं है (अर्थात् मैं ज्ञान और अज्ञानको यथार्थ रूपसे नहीं पहचान सकता) ॥२॥ मुझे अन्धा जानकर (कलि) वनकी सिंहिनीके घीका अंजन लगानेको कहता है । जब मैं यह विकारयुक्त उपचार सुनकर उसपर सुन्दर विचार करता हूँ, तब वह मेरे हृदयके बुद्धिवलको हर लेता है (अज्ञान-वनमें वासनारूपी सिंहिनी रहती है । विषय ही उसका घी है । वह तो पासमें जाते ही खा जायगी, विषयोंमें फँसे हुए जीवको ज्ञानरूपी नेत्र कैसे मिल सकते हैं ?) ॥३॥ हे प्रभो ! मैं आपसे कहनेमें सकुचाता हूँ कि कहीं मैं फिर फीका न पड़ जाऊँ । इसीसे मैं बलैया लेता हूँ,
विनय-पत्रिका ४३७ पास बुलाकर (कलियुग)को मना कर दीजिये ताकि अब वह तुलसी जैसे जड़ जीवका ख्याल छोड़ दे ॥४॥ विशेष १—'तन सुचि' * 'नेह न नीको'—क्योंकि आपने तो गीतामें कहा है— अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः। तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥ 'हे अर्जुन ! जो पुरुष मुझमें अनन्यचित्त होकर नित्य-निरन्तर मुझको स्मरण करता है, उस निरन्तर मुझमें लगे हुए योगीके लिए मैं सुलभ हूँ।' [ २६६ ] ज्यों ज्यों निकट भयो चहौं कृपालु ! त्यों त्यों दूरि पर्यो हौं । तुम चहुँ जुग रस एक राम ! हौं हूँ रावरो, जदपि अघ अवगुननि भर्यो हौं ॥१॥ बीच पाइ एहि नीच बीच ही छरनि छल्यो हौं । हौं सुवरन कुबरन कियो, नृप तें भिखारि करि, सुमति तें कुमति कस्यो हौं ॥२॥ अगनित गिरि-कानन फिर्यो, बिनु आगि जर्यो हौं। चित्रकूट गये हौं लखि कलि की कुचालि सब, अब अपडरनि डर्यो हौं ॥३॥ माथ नाइ नाथ सो कहौं, हाथ जोरि खर्यो हौं । चीन्हो चोर जिय मारि है तुलसी सो कथा सुनि प्रभु सों गुदरि निबर्यो हौं ॥४॥ शब्दार्थ—छरनि = छलों। छल्यो = छला गया। कुवरन = बुरी धातु, लोहा आदि । खर्यो = खड़ा। गुदरि = विनती । भावार्थ—हे कृपालु ! ज्यों-ज्यों मैं आपके निकट होना चाहता हूँ त्यों-त्यों दूर पड़ता जाता हूँ। हे रामजी ! आप चारों युगमें एकरस रहते हैं और मैं भी आपका (अंश) हूँ, यद्यपि मैं पापों और अवगुणोंसे भरा हुआ हूँ ॥१॥ आपसे अलग होते ही इस कलियुगने बीचहीमें मौका पाकर छलोंसे छल लिया (ज्यों ही
४३८ विनय-पत्रिका मेरी जीव संज्ञा पड़ी और मैं भगवच्चरणारविन्दोंसे विमुख हुआ, त्यों ही कलियुग- ने मुझे अपने चंगुलमें फँसा लिया)। इसने मुझ सुवर्णको कुवर्ण कर दिया, राजासे भिखारी कर दिया और अच्छी बुद्धिसे बुरी बुद्धिवाला बना दिया ॥२॥ मैं बिना आगके ही जलता हुआ अगणित पर्वतों और वनोंमें घूमता फिरा, किन्तु चित्रकूटमें जानेपर मैंने इस कलियुगकी सब कुचालोंको देखा; अतः अब मैं अपने ही डरसे डर रहा हूँ ॥३॥ मैं हाथ जोड़कर खड़ा हूँ और सिर झुकाकर स्वामीसे कहता हूँ कि पहचाना हुआ चोर जीवको मार डालता है; इस बातको सुनकर तुलसी अपने स्वामीसे विनती कर चुका (अब आपकी जो इच्छा हो सो कीजिये) ॥४॥ विशेष १—'चीन्हों चोर''''''निबन्यो हों'—जब गुसाईं जी ने चित्रकूटमें ईश्वर- प्राप्तिके लिए बड़ी कड़ी साधना की, तब कलियुग बहुत क्रुद्ध हुआ। किन्तु हनुमान्जीकी कृपासे वह इनका एक बाल भी बाँका न कर सका। हाँ, यह अवश्य था कि गुसाईंजी उसीके डरसे सदा सशंक रहा करते थे। इसीसे उन्होंने भगवान्से यह बात कही है। २६७] पन करि हों हठि आजु तें रामद्वार पर्यो हों। 'तू मेरो' यह बिन कहे उठिहौं न जनम भरि, प्रभु की सौं करि निबन्यो हों ॥१॥ दै दै धक्का जमभट थके, टारे न टल्यो हों। उदर दुसह साँसति सही बहु बार जनमि जग, नरक निदरि निकस्यो हों ॥२॥ हों मचला लै छोड़िहौं, जेहि लागि अर्यो हों। तुम दयालु, बनि है दिये, बलि, बिलंब न कीजिये, जात गलानि गन्यो हों ॥३॥ प्रगट कहत जो सकुचिये, अपराध-भन्यो हों। तौ मनमें अपनाइये, तुलसीहि कृपा करि, कलि बिलोकि हहन्यो हों ॥४॥
विनय-पत्रिका ४३९ शब्दार्थ—जम-भट = यमराजके योद्धा, यमदूत । निदरि = निरादर । मचला = मचल गया हूँ । अन्यो = अड़ा । भावार्थ—हे रामजी ! आजसे मैं जबर्दस्ती करनेकी प्रतिज्ञा करके आपके द्वारपर पड़ा हूँ। प्रभुकी शपथ खाकर कह चुका हूँ कि जबतक आप यह न कहेंगे कि 'तू मेरा है', तबतक मैं न उठूँगा—चाहे मेरी जिन्दगी बीत जाय ॥१॥ (मैं ऐसा हठी हूँ कि) यमदूत धक्के दे-देकर थक गये, पर मैं हटानेसे न हटा (अर्थात् इतने अधिक पाप किये कि अनेक जन्म नरकमें ही बीते)। मैं संसारमें अनेक बार जन्म लेकर पेटका दुस्सह कष्ट सहनेके बाद नरकका निरादर करके वहाँसे निकला हूँ ॥२॥ जिस वस्तुके लिए मैं मचल गया हूँ, और अड़ा हुआ हूँ, उसे लेकर ही छोड़ूँगा । बलिहारी ! आप दयालु हैं, अतः देनेसे ही काम चलेगा, (जब वह वस्तु देनी ही है, तो) देर न कीजिये, क्योंकि मैं ग्लानिसे गला जा रहा हूँ ॥३॥ मैं अपराधोंसे भरा हुआ हूँ, उससे यदि आपको प्रकट रूपसे ('तू मेरा है') कहनेमें संकोच मालूम होता हो, तो आप कृपा करके तुलसीदासको अपने मनमें ही अपना लीजिये, क्योंकि मैं कलियुगको देखकर हहर गया हूँ ॥४॥ विशेष १—'पन करि······राम द्वार पर्यो हौं'—इसी प्रकार महात्मा सूरदास भी द्वारपर खड़े हैं— दीनन दुख हरन देव सन्तन हितकारी । अजामील गीध व्याध इनमें कहौ कौन साध पंछी हू पद पढ़ात गनिकासी तारी ॥ ध्रुवके सिर छत्र देत प्रहलादको उबारि लेत भक्त हेत बांध्यो सेतु लंकपुरी जारी । तंदुल देत रीझि जात सागपात सों अघात गिनत नाहिं जूठ फल खाटे-मीठे खारी ॥ गजको जब ग्राह ग्रस्यो दुसासनने चीर खिंच्यो सभा-बीच कृष्ण-कृष्ण द्रौपदी पुकारी । तुरतै हरि आइ गए बचनन आरूढ़ भये सूरदास द्वारे ठाढ़ो आँधरो भिखारी ॥ [ २६८ ] तुम अपनायो तब जानिहौं, जब मन फिरि परिहै । जेहि सुभाव बिषयनि लग्यो, तेहि सहज नाथ सों नेह छाँड़ि छल करिहै ॥१॥
४४० विनय-पत्रिका सुतकी प्रीति, प्रतीति मीतकी, नृप ज्यों उर डरिहै। अपनो सो स्वारथ स्वामी सों, चहुँ विधि चातक ज्यों एक टेक ते नहिं टरिहै ॥२॥ हरषिहै न अति आदरे, निदरे न जरि मरिहै। हानि लाभ दुख सुख सबै समचित हित अनहित, कलि-कुचालि परिहरिहै ॥३॥ प्रभु-गुन सुनि मन हरषिहै, नीर नयननि ढरिहै। तुलसीदास भयो रामको, विस्वास, प्रेम लखि आनंद उमगि उर भरिहैं ॥४॥ शब्दार्थ-परिहै = पड़ेगा। निदरे = निरादर होनेपर। नीर = जल। ढरिहै = गिरने लगेगा। उर = हृदय। भावार्थ-जब मेरा मन विषयोंकी ओरसे लौट पड़ेगा तथा जिस स्वभावसे विषयोंमें लगा हुआ है, उसी सहज स्वभावसे छल छोड़कर नाथसे स्नेह करेगा, तब मैं समझूँगा कि आपने मुझे अपना लिया ॥१॥ जब मेरा मन रामजीसे पुत्रकी तरह प्रेम करेगा, मित्रकी तरह उनपर विश्वास करेगा, राजाकी तरह उनसे अपने हृदयमें डरेगा तथा चारों ओरसे चातककी भाँति उन्हींसे अपने स्वार्थोंकी सिद्धि समझेगा और अपने एक टेकसे न टलेगा ॥२॥ जब वह अत्यन्त आदर पानेपर हर्षित न होगा, निरादर होनेपर जलकर न मरेगा, हानि-लाभ, दुःख-सुख, हित-अहित सबमें समचित्त रहेगा और कलियुगकी कुचालोंको छोड़ देगा ॥३॥ जब मेरा मन प्रभुके गुणोंको सुनकर हर्षित होने लगेगा तथा नेत्रोंसे प्रेमाश्रुकी धारा बहने लगेगी, तब तुलसीदासको विश्वास होगा कि वह श्रीराम- जीका हो गया और तभी उसका हृदय उस प्रेमको देखते ही आनन्दसे उमड़कर परिपूर्ण होगा ॥४॥ विशेष १-'तुम अपनायो......करिहै'—वास्तवमें ऐसा होनेपर ही ईश्वर-भक्ति पैदा होती है और परमात्म-दर्शन सुलभ होता है—भगवत्कृपा होती है। भगवान्ने गीतामें कहा भी है।—देखिये श्रीमद्भगवद्गीता, अ० ८
विनय-पत्रिका ४४१ २—'हानि लाभ······परिहरिहै'—वास्तवमें सुख-दुःखादिको समान माननेवाले जिस ज्ञानी पुरुषको उसकी पीड़ा नहीं होती, वही ब्रह्मकी स्थितिको प्राप्त करनेमें समर्थ होता है। यही बात भगवान्ने गीतामें कही है। (देखिये श्रीमद्भगवद्गीता २। १४. १५) [ २६१ ] राम कबहुँ प्रिय लागिहौ जैसे नीर मीन को ? सुख जीवन ज्यों जीवको, मनि ज्यों फनिको हित, ज्यों धन लोभ-लीन को ॥१॥ ज्यों सुभाय प्रिय लगति नागरी नागर नवीन को । त्यों मेरे मन लालसा करिये करुनाकर ! पावन प्रेम पीन को ॥२॥ मनसा को दाता कहैं श्रुति प्रभु प्रवीन को । तुलसिदास को भावतो, वलि जाउँ दयानिधि ! दीजै दान दीन को ॥३॥ शब्दार्थ—फनि = सर्प । नागरी = नायिका । नागर = नायक । नवीन = युवक । पीन = पुष्ट । भावतो = मनचाहा । भावार्थ—हे राम ! क्या आप कभी मुझे ऐसे प्रिय लगेंगे, जैसे मछलीको जल, जीवको सुखमय जीवन, सर्पको मणि, लोभमें लीन रहनेवाले (कंजूस) को धन प्यारा लगता है ? ॥१॥ अथवा जैसे स्वभावसे ही युवक नायकको नायिका प्रिय लगती है, वैसे ही हे करुणाकर ! मेरे मनमें (अपने प्रति) पवित्र और पुष्ट प्रेमकी लालसा उत्पन्न कीजिये ॥२॥ वेदोंका कथन है कि चतुर परमात्मा मनो- वाञ्छाके देनेवाले हैं। अतः हे दयानिधे ! मैं आपकी बलैया लेता हूँ, इस दीन तुलसीदासको उसका चाहा दान दीजिये (ऐसी कृपा कीजिये, जिसमें उसे आप अत्यन्त प्यारे लगें) ॥३॥ विशेष १—'प्रबीन'—यहाँपर प्रभुके लिए प्रबीन कहनेका यह भाव है कि
४४२ विनय-पत्रिका परमात्मा घट-घटकी बात जाननेवाले हैं, कहनेकी आवश्यकता नहीं पड़ती। यहाँ 'प्रवीन' शब्द बड़ा ही सार्थक प्रयुक्त हुआ है। २—इस पदमें गुसांईंजीने बड़े ही उच्चकोटिके प्रेमकी आकांक्षा प्रकट की है। उदाहरण भी खूब चुन-चुनकर दिये गये हैं। कविने पीछे भी एक पदमें ऐसी ही आकांक्षा प्रकट की है। वहाँपर रामचरितमानसका नीचे लिखा दोहा भी लिखा जा चुका है— 'कामिहि नारि पियारि जिमि, लोभीके उर दाम। तिमि रघुनाथ निरन्तर, प्रिय लागहु मोहि राम॥' कितनी ऊँची भावना है ! कैसी अनूठी सूझ है ! वाह ! इस टक्करका दोहा रामचरितमानसमें ढूँढ़नेसे नहीं मिल सकता। [ २७० ] कबहुँ कृपा करि रघुवीर ! मोहू चितैहौ। भलो-बुरो जन आपनो, जिय जानि दयानिधि ! अवगुन अमित बितैहौ ॥१॥ जनम जनम हौं मन जित्यो, अब मोहि जितैहौ। हौं सनाथ हैहौं सही तुम हू अनाथपति, जो लघुताहि न भितैहौ ॥२॥ बिनय करौं अपभयहु तें, तुम्ह परम हितै हौ। तुलसिदास कासों कहै, तुमही सब मेरे, प्रभु गुरु, मातु-पितै हौ ॥३॥ शब्दार्थ—भितैहौं = डरेंगे। अपभयहु = अकारण भयसे। भावार्थ—हे रघुबीर ! क्या आप कभी कृपा करके मेरी ओर भी देखेंगे ? हे दयानिधि ! क्या आप अपने मनमें मुझे भला-बुरा सेवक समझकर मेरे अपार दोषोंका अन्त कर देंगे ? ॥१॥ जन्म-जन्मसे (अनेक जन्मोंसे) यह मन मुझे जीतता आया है (मुझपर अपना अधिकार जमाता आया है); किन्तु अबकी बार क्या आप मुझे जितावेंगे (अर्थात् मैं अपने मनपर विजय पा सकूँगा ? यदि आप इतनी कृपा करेंगे, तो) मैं तो सनाथ हो ही जाऊँगा, आप भी सही-सही 'अनाथपति'
विनय-पत्रिका ४४३ हो जायँगे—हाँ, यदि आप मेरी क्षुद्रतासे न डरेंगे तो। (अर्थात् यदि आप मेरी तुच्छतासे न डरकर मुझे अपना लेंगे तो आपका 'अनाथपति' नाम सार्थक और सही हो जायगा) ॥२॥ (वैसे डरनेका कोई कारण नहीं है, क्योंकि) आप परम हितू हैं, इसीसे मैं अकारण भयसे आपसे विनती कर रहा हूँ। यह तुलसीदास और किससे कहने जाय ? क्योंकि मेरे तो प्रभु, गुरु, माता, पिता आदि सब कुछ केवल आप ही हैं ॥३॥ विशेष १—इस पदमें कविका अत्यन्त दीनता-पूर्ण और बड़ा ही कारुणिक कथन है। [ २७१ ] जैसो हौं तैसो राम रावरो जन, जनि परिहरिये । कृपासिंधु, कोसलधनी ! सरनागत-पालक, ढरनि आपनी ढरिये ॥ १ ॥ हौं तौ बिगरायल और को, बिगरो न बिगरिये । तुम सुधारि आये सदा सब की सब ही बिधि, अब मेरियो सुधरिये ॥२॥ जग हँसिहैं मेरे संग्रहे, कत इहि डर डरिये । कपि-केवट कीन्हे सखा जेहि सील, सरल चित, तेहि सुभाउ अनुसरिये ॥३॥ अपराधी तउ आपनो, तुलसी न बिसरिये । टूटियो बाँह गरे परै, फूटेहु विलोचन, पीर होत हित करिये ॥४॥ शब्दार्थ—ढरनि = बहाव, रीति । ढरिये = ढलिये, चलिये । भावार्थ—हे रामजी ! मैं जैसा हूँ, तैसा आपका हूँ, मुझ सेवकको न छोड़िये। हे कृपा-सागर कोशलनाथ ! आप शरणागतोंका पालन करनेवाले हैं, अतः आप अपनी ही ढारपर ढलिये (अर्थात् अपने बानेके अनुसार मुझ शरणा- गतका पालन कीजिये) ॥१॥ मैं तो औरों (माया, मोहादि या इन्द्रियादि) का बिगाड़ा हुआ हूँ, अतः अब आप इस बिगड़े हुएको न बिगाड़िये—नाराज न