भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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विनय-पत्रिका ४३३ मेरे भले को गोसाईं ! पोच को, न सोच-संक, हौं हूँ किये कहौं सौंह साँची सीय-पीय की ॥२॥ ग्यान हू-गिरा के स्वामी, बाहर-अन्तरजामी, यहाँ क्यों दुरैगी बात मुख की औ हीय की ? तुलसी तिहारो, तुम हीं पै तुलसी के हित, राखि कहौं हौं तो जो पै ह्वै हौं माखी घीय की ॥३॥ शब्दार्थ—जानिबी = जान लेना । कुकृत = बुरी करनी । कीय की = किये हुए की । पोच = नीच । भावार्थ—हे नाथ ! आप अपने सेवकके हृदयकी ठीक-ठीक बात अच्छी तरह समझ लीजिये। मेरी बुद्धिने सुन्दर रहन और रुचिवाली (पतिव्रता) स्त्रीकी गति धारण की है; उसने आपके भरोसे आपके साथ पतिका-सा प्रेम करनेका नेम कर लिया है ॥१॥ पाप और पुण्यवश सभीका साथ पड़ा है, अतः अपनी और परायी दोनोंकी गति परख चुका हूँ। हे स्वामिन् ! मुझ नीचको न तो (किसी बातका) सोच है और न मैंने शंका ही की; क्योंकि मेरी भलाई करनेके लिए तो आप हैं ही; यह बात मैं जानकी-वल्लभ श्रीरामजीका शपथ खाकर कहता हूँ ॥२॥ (यह बात मैं बनाकर नहीं कह रहा हूँ; क्योंकि मैं जानता हूँ कि) आप ज्ञान और वाणीके स्वामी हैं, तथा बाहर और भीतरकी बात जाननेवाले हैं; ऐसी दशामें हृदयकी और मुखकी बात आपसे कैसे छिपेगी ? अर्थात् हृदयमें कुछ और हो किन्तु मुखसे और ही कहा जाय, यह बात आपसे छिपी नहीं रह सकती । यह तुलसी आपका है और केवल आप ही तुलसीके हितू हैं; यदि मैं इसमें कुछ बनाकर कहता होऊँगा, तो घीकी मक्खी हो जाऊँगा । अर्थात् जिस प्रकार मक्खी घीमें पड़कर तुरन्त मर जाती है, उसी प्रकार मेरा सर्वनाश हो जायगा ॥३॥ [ २६४ ] मेरो कह्यो सुनि पुनि भावै तोहि करि सो । चारि हू बिलोचन बिलोकु तू तिलोक महँ तेरो तिहुँ काल कहु को है हितू हरि-सो ॥१॥ २८