विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४३४ विनय-पत्रिका नये-नये नेह अनुभये देह-गेह बसि, परखे प्रपंची प्रेम, परत उघरि सो। सुहृद-समाज दगाबाजीही को सौदा-सूत, जब जाको काज तब मिलै पाँय परि सो ॥२॥ बिबुध सयाने, पहिचाने कैधौं नाहीं नीके, देत एक गुन, लेत कोटि गुन भरि सो। करम-धरम श्रम-फल रघुबर बिनु, राखको सो होम है, ऊसर कैसो बरिसो ॥३॥ आदि-अंत-बीच भलो, भलो करै सब ही को, जाको जस लोक-बेद रह्यो है बगरिसो। सीतापति सारिखो न साहिब सील-निधान, कैसे कल परै सठ ! बैठो सो बिसरि-सो ॥४॥ जीवको जीवन, प्रान प्रानको परम हित प्रीतम, पुनीतकृत नीचन, निदरि सो। तुलसी ! तो को कृपालु जो कियो कोसलपालु, चित्रकूट को चरित्र चेतु चित करि सो ॥५॥ शब्दार्थ—अनुभये = अनुभव किया। उघरि = खुल गया। सौदा-सूत = लेन-देनका व्यवहार। बिबुध = देवता। बगरिसो = फैला-सा, बिखरा हुआ। कल = चैन। भावार्थ—रे मन ! (पहले) मेरी बात सुन ले, फिर तुझे जो अच्छा लगे, सो कर। तू अपने चारों नेत्रों (दो बाह्य चक्षु और दो मनश्चक्षु) से तीनों लोकमें देखकर बतला कि तीनों कालमें भगवान्के समान तेरा हितू कौन है ॥१॥ तूने शरीररूपी घरमें बसकर नये-नये स्नेहका अनुभव किया, कपटभरे प्रेमको परख लिया, उसका सब भेद खुल गया। मित्रोंकी मण्डलीमें दगाबाजीके ही लेन-देन- का व्यवहार है; जब जिसका काम होता है, तब वह पैरोंपर गिरकर मिलता है ॥२॥ देवता भी बड़े चतुर हैं; (कह नहीं सकता कि) तूने उन्हें पहचाना है या नहीं। वे (पहले) करोड़ गुना भरवा लेते हैं, (तब) एक गुना देते हैं। श्रीरघुनाथ- जीके बिना कर्म, धर्म करनेका.फल केवल श्रम ही हाथ लगता है। वह (कर्म,