विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 443, कुल 475 में से
संदर्भ में पढ़ेंनिहाल कर देते हैं ॥२॥ यही एक दरबार है जहाँ गर्वसे सर्वनाश हो जाता है, एवं गरीबी और नम्रतासे ही योग-क्षेम-(रक्षा) का लाभ होता है। रावणके समान मोटा और विभीषणके समान दुबला कोई नहीं था। किन्तु वहाँ मुझे आपकी प्रेम-पराधीनता समझ पड़ी। (अर्थात् आपने भक्त विभीषणको अपना लिया और रावणको मार डाला) ॥३॥ यहाँ (इस दरबार) का सयानापन हजारों मूर्खताके समान है। यहाँ तो सीधे और सत्य भावसे कहनेसे ही मलिनता दूर होती है। गीध, अहिल्या और शबरीकी सब दिन सुध करते रहनेसे स्वामीके प्रति स्नेहके सम्बन्धमें कमी न होगी ॥४॥ आपका नाम कल्पवृक्षके समान सारी कामनाएँ पूर्ण कर देता है। उसका स्मरण करते ही कलिके पाप और छल क्षीण हो जाते हैं। हे करुणानिधान ! श्री सीतानाथके भक्तिरूपी गंगाजलमें मछली (की तरह निमग्न) होनेके लिए यह तुलसी वरदान चाहता है ॥५॥
विशेष १—'अपनी छोटाई छोटी'—इसमें बड़ा ही सुन्दर भाव है। वियोगी हरिजीने इसका अर्थ किया है, 'अपनी छोटी-सी क्षुद्रता'। किन्तु यहाँ 'तुच्छाति- तुच्छ छोटापन अथवा 'अत्यन्त ओछी', 'बहुत बड़ी क्षुद्रता' यह आशय प्रकट करनेके लिए 'छोटी' शब्द प्रयुक्त हुआ है। यहाँ इसका अर्थ 'जरासी' या 'थोड़ी-सी' नहीं है। २—'गीध'—२१५ पदके विशेषमें देखिये। ३—'सिला'—४३ पदके विशेषमें देखिये। ४—'सबरी'—१०६ पदके विशेषमें देखिये।
[ २६३ ] नाथ नीके कै जानिवी ठीक जन-जीय की। रावरो भरोसो नाह कै सु-प्रेम-नेम लियो, रुचिर रहनि रुचि मति गति तीय की ॥१॥ कुकृत-सुकृत बस सब ही सों संग पन्यो, परखी परायी गति, आपने हूँ कीय की।