भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 448

विनय-पत्रिका ४३७ पास बुलाकर (कलियुग)को मना कर दीजिये ताकि अब वह तुलसी जैसे जड़ जीवका ख्याल छोड़ दे ॥४॥ विशेष १—'तन सुचि' * 'नेह न नीको'—क्योंकि आपने तो गीतामें कहा है— अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः। तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥ 'हे अर्जुन ! जो पुरुष मुझमें अनन्यचित्त होकर नित्य-निरन्तर मुझको स्मरण करता है, उस निरन्तर मुझमें लगे हुए योगीके लिए मैं सुलभ हूँ।' [ २६६ ] ज्यों ज्यों निकट भयो चहौं कृपालु ! त्यों त्यों दूरि पर्यो हौं । तुम चहुँ जुग रस एक राम ! हौं हूँ रावरो, जदपि अघ अवगुननि भर्यो हौं ॥१॥ बीच पाइ एहि नीच बीच ही छरनि छल्यो हौं । हौं सुवरन कुबरन कियो, नृप तें भिखारि करि, सुमति तें कुमति कस्यो हौं ॥२॥ अगनित गिरि-कानन फिर्यो, बिनु आगि जर्यो हौं। चित्रकूट गये हौं लखि कलि की कुचालि सब, अब अपडरनि डर्यो हौं ॥३॥ माथ नाइ नाथ सो कहौं, हाथ जोरि खर्यो हौं । चीन्हो चोर जिय मारि है तुलसी सो कथा सुनि प्रभु सों गुदरि निबर्यो हौं ॥४॥ शब्दार्थ—छरनि = छलों। छल्यो = छला गया। कुवरन = बुरी धातु, लोहा आदि । खर्यो = खड़ा। गुदरि = विनती । भावार्थ—हे कृपालु ! ज्यों-ज्यों मैं आपके निकट होना चाहता हूँ त्यों-त्यों दूर पड़ता जाता हूँ। हे रामजी ! आप चारों युगमें एकरस रहते हैं और मैं भी आपका (अंश) हूँ, यद्यपि मैं पापों और अवगुणोंसे भरा हुआ हूँ ॥१॥ आपसे अलग होते ही इस कलियुगने बीचहीमें मौका पाकर छलोंसे छल लिया (ज्यों ही