विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४३६ विनय-पत्रिका जल चाहत पावक लहौं, विष होत अमी को । कलि-कुचाल संतनि कही सोइ सही, मोहि कछु फहम न तरनि तमी को ॥२॥ जानि अंध अंजन कहै बन-बाघिनी-घी को । सुनि उपचार बिकार को सुविचार करौं जब, तब बुधि बल हरै हीको ॥३॥ प्रभु सों कहत सकुचात हौं, परौं जनि फिरि फीको । निकट बोलि, बलि, बरजिये, परिहरै ख्याल अब तुलसिदास जड़ जीको ॥४॥ शब्दार्थ—फहम = ज्ञान । तरनि = सूर्य, प्रकाश । तमी = रात्रि, अन्धकार । बरजिये = मना कर दीजिए । जीको = जीव का । भावार्थ—हे प्रभो ! मैं शरीरको पवित्र और मनमें रुचि रखता हूँ; मुखसे भी कहता हूँ कि 'मैं जानकी-वल्लभ श्रीरघुनाथजीका सेवक हूँ'; फिर भी जानता नहीं कि किस दुर्भाग्यसे नाथके साथ मेरा भली-भाँति स्नेह-सम्बन्ध नहीं हो रहा है ॥१॥ चाहता हूँ जल, पाता हूँ आग ! (शान्तिकी जगह त्रिताप मिलता है) । इसी प्रकार मेरे लिए अमृतका भी विष हो जाता है (अर्थात् अमृतरूपी सत्कर्म अभिमानरूपी विष पैदा करता है) । सन्तोंने जो कलिकालकी कुचालें कही हैं, वे सही हैं । मुझे प्रकाश और अन्धकारका कुछ भी ज्ञान नहीं है (अर्थात् मैं ज्ञान और अज्ञानको यथार्थ रूपसे नहीं पहचान सकता) ॥२॥ मुझे अन्धा जानकर (कलि) वनकी सिंहिनीके घीका अंजन लगानेको कहता है । जब मैं यह विकारयुक्त उपचार सुनकर उसपर सुन्दर विचार करता हूँ, तब वह मेरे हृदयके बुद्धिवलको हर लेता है (अज्ञान-वनमें वासनारूपी सिंहिनी रहती है । विषय ही उसका घी है । वह तो पासमें जाते ही खा जायगी, विषयोंमें फँसे हुए जीवको ज्ञानरूपी नेत्र कैसे मिल सकते हैं ?) ॥३॥ हे प्रभो ! मैं आपसे कहनेमें सकुचाता हूँ कि कहीं मैं फिर फीका न पड़ जाऊँ । इसीसे मैं बलैया लेता हूँ,