भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 449

४३८ विनय-पत्रिका मेरी जीव संज्ञा पड़ी और मैं भगवच्चरणारविन्दोंसे विमुख हुआ, त्यों ही कलियुग- ने मुझे अपने चंगुलमें फँसा लिया)। इसने मुझ सुवर्णको कुवर्ण कर दिया, राजासे भिखारी कर दिया और अच्छी बुद्धिसे बुरी बुद्धिवाला बना दिया ॥२॥ मैं बिना आगके ही जलता हुआ अगणित पर्वतों और वनोंमें घूमता फिरा, किन्तु चित्रकूटमें जानेपर मैंने इस कलियुगकी सब कुचालोंको देखा; अतः अब मैं अपने ही डरसे डर रहा हूँ ॥३॥ मैं हाथ जोड़कर खड़ा हूँ और सिर झुकाकर स्वामीसे कहता हूँ कि पहचाना हुआ चोर जीवको मार डालता है; इस बातको सुनकर तुलसी अपने स्वामीसे विनती कर चुका (अब आपकी जो इच्छा हो सो कीजिये) ॥४॥ विशेष १—'चीन्हों चोर''''''निबन्यो हों'—जब गुसाईं जी ने चित्रकूटमें ईश्वर- प्राप्तिके लिए बड़ी कड़ी साधना की, तब कलियुग बहुत क्रुद्ध हुआ। किन्तु हनुमान्जीकी कृपासे वह इनका एक बाल भी बाँका न कर सका। हाँ, यह अवश्य था कि गुसाईंजी उसीके डरसे सदा सशंक रहा करते थे। इसीसे उन्होंने भगवान्से यह बात कही है। २६७] पन करि हों हठि आजु तें रामद्वार पर्यो हों। 'तू मेरो' यह बिन कहे उठिहौं न जनम भरि, प्रभु की सौं करि निबन्यो हों ॥१॥ दै दै धक्का जमभट थके, टारे न टल्यो हों। उदर दुसह साँसति सही बहु बार जनमि जग, नरक निदरि निकस्यो हों ॥२॥ हों मचला लै छोड़िहौं, जेहि लागि अर्यो हों। तुम दयालु, बनि है दिये, बलि, बिलंब न कीजिये, जात गलानि गन्यो हों ॥३॥ प्रगट कहत जो सकुचिये, अपराध-भन्यो हों। तौ मनमें अपनाइये, तुलसीहि कृपा करि, कलि बिलोकि हहन्यो हों ॥४॥