भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 450

विनय-पत्रिका ४३९ शब्दार्थ—जम-भट = यमराजके योद्धा, यमदूत । निदरि = निरादर । मचला = मचल गया हूँ । अन्यो = अड़ा । भावार्थ—हे रामजी ! आजसे मैं जबर्दस्ती करनेकी प्रतिज्ञा करके आपके द्वारपर पड़ा हूँ। प्रभुकी शपथ खाकर कह चुका हूँ कि जबतक आप यह न कहेंगे कि 'तू मेरा है', तबतक मैं न उठूँगा—चाहे मेरी जिन्दगी बीत जाय ॥१॥ (मैं ऐसा हठी हूँ कि) यमदूत धक्के दे-देकर थक गये, पर मैं हटानेसे न हटा (अर्थात् इतने अधिक पाप किये कि अनेक जन्म नरकमें ही बीते)। मैं संसारमें अनेक बार जन्म लेकर पेटका दुस्सह कष्ट सहनेके बाद नरकका निरादर करके वहाँसे निकला हूँ ॥२॥ जिस वस्तुके लिए मैं मचल गया हूँ, और अड़ा हुआ हूँ, उसे लेकर ही छोड़ूँगा । बलिहारी ! आप दयालु हैं, अतः देनेसे ही काम चलेगा, (जब वह वस्तु देनी ही है, तो) देर न कीजिये, क्योंकि मैं ग्लानिसे गला जा रहा हूँ ॥३॥ मैं अपराधोंसे भरा हुआ हूँ, उससे यदि आपको प्रकट रूपसे ('तू मेरा है') कहनेमें संकोच मालूम होता हो, तो आप कृपा करके तुलसीदासको अपने मनमें ही अपना लीजिये, क्योंकि मैं कलियुगको देखकर हहर गया हूँ ॥४॥ विशेष १—'पन करि······राम द्वार पर्यो हौं'—इसी प्रकार महात्मा सूरदास भी द्वारपर खड़े हैं— दीनन दुख हरन देव सन्तन हितकारी । अजामील गीध व्याध इनमें कहौ कौन साध पंछी हू पद पढ़ात गनिकासी तारी ॥ ध्रुवके सिर छत्र देत प्रहलादको उबारि लेत भक्त हेत बांध्यो सेतु लंकपुरी जारी । तंदुल देत रीझि जात सागपात सों अघात गिनत नाहिं जूठ फल खाटे-मीठे खारी ॥ गजको जब ग्राह ग्रस्यो दुसासनने चीर खिंच्यो सभा-बीच कृष्ण-कृष्ण द्रौपदी पुकारी । तुरतै हरि आइ गए बचनन आरूढ़ भये सूरदास द्वारे ठाढ़ो आँधरो भिखारी ॥ [ २६८ ] तुम अपनायो तब जानिहौं, जब मन फिरि परिहै । जेहि सुभाव बिषयनि लग्यो, तेहि सहज नाथ सों नेह छाँड़ि छल करिहै ॥१॥